प्रोस्टेट कैंसर पर प्रहार
प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित पुरुषों के लिए खुशखबरी है। इस रोग से ग्रस्त व्यक्ति अब पारंपरिक सर्जरी और रेडियोथेरेपी के झझट से छुटकारा पा लेंगे। यह सब हाई इंटेंसिटी फोकस्ड अल्ट्रासाउंड (एचआईएफयू) के जरिए संभव है।

प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित पुरुषों के लिए खुशखबरी है। इस रोग से ग्रस्त व्यक्ति अब पारंपरिक सर्जरी और रेडियोथेरेपी के झझट से छुटकारा पा लेंगे। यह सब हाई इंटेंसिटी फोकस्ड अल्ट्रासाउंड (एचआईएफयू) के जरिए संभव है। फिलहाल यह तकनीक प्रोस्टेट कैंसर से ग्रस्त रोगियों का इलाज करने में सबसे अधिक कारगर है, क्योंकि इसके साइड इफेक्ट भी नहीं हैं
कैसे होता है इलाज
इस विधि से इलाज करवाने के लिए सबसे पहले प्रोस्टेट कैंसर से ग्रस्त व्यक्ति का एमआरआई परीक्षण कराया जाता है। फिर अल्ट्रासाउंड तरगों से बढ़ी हुई कैंसरग्रस्त प्रोस्टेट ग्रंथि को गर्म कर खत्म कर दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में सामान्यत: सिर्फ एक दिन का वक्त लगता है। इस प्रकार मरीज को अस्पताल में ठहराने की जरूरत नहीं होती, लेकिन अगर ग्रंथि अनुमान से अधिक बढ़ी है तो दो दिन भी लग सकता है।
कारण
इस बीमारी के ठोस कारण का अभी तक पता नहीं चल सका है, लेकिन बढती उम्र, आनुवाशिक और हार्मोन से सबधित कारणों को प्रोस्टेट कैंसर की मुख्य वजह माना जाता है। वहीं औद्योगिक कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों में भी प्रोस्टेट कैंसर के होने की आशका बनी रहती है। बढ़ती उम्र के साथ ही इस बीमारी के बढ़ने की आशका प्रबल हो जाती है।
लक्षण
- बार-बार पेशाब आना।
- पेशाब करते समय जोर लगाना।
- पेशाब देर से होना या फिर रुक-रुक कर होना।
- पेशाब कर लेने के बाद भी बूँद बूँद टपकना।
- पेशाब धीरे-धीरे होना और पेशाब में रुकावट होना।
- हड्डियों में दर्द या अकड़न होना। कैंसर की गभीर अवस्था में कमर के निचले भाग या पेल्विस बोंस में दर्द होना।
कैसे चलता है पता
पीएसए रक्त जाच के द्वारा प्रोस्टेट कैंसर का पता लगाया जा सकता है। अगर पीएसए का स्तर अधिक है तो प्रोस्टेट कैंसर की आशका बढ़ जाती है। शुरुआती दौर में रोग का पता करने के लिए यह जाच बेहद कारगर है। अगर किसी व्यक्ति की प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ी हुई है या फिर वह कठोर हो चुकी है, तो इस स्थिति में चिकित्सक बॉयोप्सी की सलाह देते हैं। बॉयोप्सी के अतर्गत प्रोस्टेट ग्रंथि से टिश्यू निकालकर इसकी जाच करने के लिए प्रयोगशाला में भेजा जाता है।
बचाव
शाकाहारी भोजन और कम वसायुक्त खाद्य पदार्थ ग्रहण करने से प्रोस्टेट कैंसर की आशकाएं कम हो सकती हैं।
कुछ तथ्य
- 40 साल से कम उम्र में प्रोस्टेट कैंसर बमुश्किल ही होता है।
- 60 साल की उम्र पार करने के बाद पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर की आशकाएं बढ़ जाती हैं।
- उन पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर की आशका ज्यादा होती है, जिनके परिवार के सदस्य इस रोग से ग्रस्त हो चुके हों।
आसान हुआ बढ़ी हुई प्रोस्टेट का इलाज
प्रोस्टेट सिर्फ पुरुषों में पायी जाने वाली वह ग्रंथि है, जो कई छोटी-छोटी ग्रंथियों से मिलकर बनी होती है। यह ग्रंथि पेशाब के मार्ग को घेरे रहती है। उम्र बढ़ने के साथ प्रोस्टेट ग्रंथि के ऊतकों में गैर-नुकसानदेह ग्रंथिकाएं विकसित हो जाती है। इस कारण धीरे-धीरे ग्रंथि के आकार में वृद्धि होने लगती है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब प्रोस्टेट का आकार इतना अधिक बढ़ जाता है जिससे मूत्रमार्ग पर दबाव पड़ने लगता है। इस समस्या के कारण पेशाब का बहाव पतला और पहले की अपेक्षा कमजोर पड़ जाता है। अक्सर पेशाब करने के बाद भी ऐसा महसूस होता है कि पूरा पेशाब बाहर नहीं आ रहा है और पीड़ित व्यक्ति को बार-बार पेशाब करने की इच्छा होती है। दबाव पड़ने से पेशाब के साथ रक्त भी निकल सकता है।
नवीनतम तकनीक
बढ़ी हुई प्रोस्टेट ग्रंथि के उपचार के लिए एक नवीनतम सर्जरी विकसित की गयी है, जिससे ओपेन सर्जरी की तुलना में बेहतर परिणाम हासिल हो रहे हैं। इस तकनीक को प्रोस्टेटिक आर्टरी इबोलाइजेशन (पीएई) कहा जाता है।
इंबोलाइजेशन का आशय है कि जहा पर प्रोस्टेट ग्रंथि की धमनी (आर्टरी) विकारग्रस्त होती है, उसे एक खास दवा (पीवीए) के द्वारा बद कर दिया जाता है।
इबोलाइजेशन की इस प्रक्रिया को लोकल एनेस्थीसिया के अंतर्गत अमल में लाया जाता है। यह प्रकिया एंजियोग्राफी की ही तरह होती है। इसमें फीमोरल आर्टरी के द्वारा एक पतला कैथेटर(एक तरह का ट्यूब) प्रोस्टेटिक आर्टरी तक ले जाया जाता है। इस प्रक्रिया की समाप्ति के 6 से 8 घटे के बाद रोगी अपने कमरे में चहलकदमी शुरू कर सकता है।
इस सर्जरी से लाभ
पीएई का इस्तेमाल किसी भी आकार या साइज की बढ़ी हुई प्रोस्टेट के इलाज में किया जा सकता है। इस तकनीक का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता। अधिकतर रोगी इस प्रक्रिया के बाद बहुत कम या फिर बिल्कुल भी दर्द महसूस नहीं करते। पीएई की वजह से सेक्स जीवन भी किसी भी तरह से प्रभावित नहीं होता। यही नहीं, इस प्रक्रिया के अंतर्गत रक्त चढ़ाने (ब्लड ट्रासफ्यूजन) की भी जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि इसमें रक्तस्राव नगण्य होता है। शरीर पर दाग भी नहीं पड़ते और रोगीतेजी से स्वास्थ्य लाभ करता है। पीएई की सफलता दर लगभग 98 फीसदी है।
डॉ. प्रदीप मुले इटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट, फोर्टिस हॉस्पिटल, नई दिल्ली
डॉ.विनीत मल्होत्रा यूरोलॉजिस्ट
नोवा हॉस्पिटल, नई दिल्ली
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