कई तरीकों से शिकार करता है स्टैपी ईगल
प¨रदो की दुनिया: स्टैपी ईगल परिवार: एसीपीट्रिडी जाति: एक्यूला प्रजाति: निपालैन्सीस लेख संकलन
प¨रदो की दुनिया: स्टैपी ईगल
परिवार: एसीपीट्रिडी
जाति: एक्यूला
प्रजाति: निपालैन्सीस
लेख संकलन: सुंदर सांभरिया, ईडेन गार्डन रेवाड़ी।
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बाज की यह प्रजाति एक प्रवासी पक्षी है, जो सर्दियों के मौसम में भारत के अलग-अलग हिस्सों में यूरोप, कजाकिस्तान, मंगोलिया व चीन आदि देशों से आते है। भारत में ये गैर प्रजनन समय में आते है। ये पक्षी मुख्यत घास के मैदानों, अर्ध मरूभूमि, धान के खेत व खुले जंगलों में रहना पसंद करते है। यह एक बड़ा शिकारी पक्षी है। ये गहरे भूरे रंग के होते हैं। इसके उड़ने वाले पंख व पूंछ के पंखों पर सफेद रंग की धारी होती है। इसके पांव पर पंख होते हैं। इनके शरीर के आकार के हिसाब से इनका सिर छोटा होता है। इसकी चोंच का ऊपरी हिस्सा पीला होता है और इसके पंजे बड़े तथा पीले रंग के होते है।
खाने के बाद हो जाता है सुस्त
बाज की यह प्रजाति ताजा मरे हुए जानवरों को खाती है। इसके साथ-साथ ये चूहे व घास के मैदानों में पाये जाने वाले खरगोश को अपना शिकार बनाते है। यह एक अवसरवादी शिकारी पक्षी है, जो शिकार के लिए कई प्रकार की तकनीक का प्रयोग करते है। ये पक्षी शिकार को ऊपर उड़ते हुए अचानक अपने मजबूत व नुकीले पंजों से वार कर उठा लेते हैं। बहुत बार ये अपने शिकार का इंतजार उसके बिल या मांद के सामने करते है। जैसे ही शिकार बाहर आता है ये उसको तुरंत पकड़ लेते हैं।
यह भी देखा जा सकता है कि यह अन्य शिकारी पक्षियों से उड़ते हुए उनका शिकार छीन लेते है। बाज की यह प्रजाति घंटों तक जमीन पर या किसी पेड़ पर एक छोटे समूह में बसेरा करते हैं। ये काफी सुस्त पक्षी हैं, जो शिकार के बाद घंटो तक एक ही जगह पर बैठे रहते है।
41 वर्ष तक जीता है यह पक्षी
इस पक्षी के प्रजनन का समय अप्रैल से अगस्त तक होता है। ये घोंसले जमीन पर, चट्टानों के ऊपर या पुरानी खंडहर पड़ी इमारतों पर बनाते है। ये काफी बड़े आकार का घोंसला बनाते है। इसका घोंसला आमतौर पर तिनकों से बना होता है। घोंसला लगभग एक मीटर चौड़ा होता है। इनके घोंसले ज्यादातर घास के मैदानों के आस-पास होते है। जहां से ये आसानी से चूहे या खरगोश आदि को अपना शिकार बना सके। मादा एक से तीन अंडे देती है। नर व मादा दोनों मिल कर चूजों को पालते है। इस पक्षी की आयु लगभग 41 वर्ष तक होती है।
कजाकिस्तान के राष्ट्रीय ध्वज में है यह पक्षी
बाज की यह प्रजाति संकटग्रस्त है, जो विलुप्त होने के कगार पर है। दुनिया भर में वर्ष 1990 से इसकी संख्या में भारी कमी आई है। इन पक्षियों की संख्या कम होने का एक प्रमुख कारण यह भी रहा है कि ये मरे हुए पशुओं को भी खाते है। गिद्धों की तरह इनकी किडनी पर भी डाईक्लोविन दवा का प्रभाव देखा गया है। इसके साथ-साथ स्थानीय रेंज में इनकी संख्या कम होने का मुख्य कारण घास के मैदानों को धीरे-धीरे खेतों में बदलना है। घास के मैदानों में इनके शिकार की अनुकूल संख्या होती है, लेकिन खेती में बदलाव के बाद इसका शिकार खत्म हो रहा है जो सीधे तौर पर इसकी संख्या को घटा रहा है। बिजली की लाइनें तथा खेती में प्रयुक्त होने वाले कीटनाशक भी इसकी मौत का कारण बन रहे है। कजाकिस्तान में इसे काफी महत्व दिया जाता है। यही कारण है कि इसे कजाकिस्तान के राष्ट्रीय ध्वज में रखा गया है।
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