जोगिया द्वारे-द्वारे: महेश कुमार वैद्य
राजनीति में न कोई किसी का स्थायी दोस्त होता है और न दुश्मन। वक्त और हालात के अनुसार दुश्मनी-दोस्ती बदलती रहती है। अब माडल टाउन के फौजी नेता (कैप्टन अजय सिंह) को ही ले लीजिए। कुछ महीनों पूर्व तक कैप्टन के मुख से पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा के लिए कड़वे बोल निकलते थे मगर अब उनकी बोली में मिठास घुलने लगी है। हालांकि अभी चासनी जैसी मिठास नहीं है मगर फौजी के विधायक बेटे चिरंजीव राव हुड्डा परिवार के साथ कदमताल करने लगे हैं। राजनीति का मर्म समझने वालों की मानें तो विरोधियों को रोकने और खुद आगे बढ़ने के लिए हुड्डा परिवार के लिए ही नहीं कैप्टन परिवार के लिए भी यह दोस्ती जरूरी है।

दोस्ती में बदलती रहती है राजनीतिक दुश्मनी राजनीति में न कोई किसी का स्थायी दोस्त होता है और न दुश्मन। वक्त और हालात के अनुसार दुश्मनी-दोस्ती बदलती रहती है। अब माडल टाउन के फौजी नेता (कैप्टन अजय सिंह) को ही ले लीजिए। कुछ महीनों पूर्व तक कैप्टन के मुख से पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा के लिए कड़वे बोल निकलते थे, मगर अब उनकी बोली में मिठास घुलने लगी है। हालांकि अभी चासनी जैसी मिठास नहीं है, मगर फौजी के विधायक बेटे चिरंजीव राव, हुड्डा परिवार के साथ कदमताल करने लगे हैं। राजनीति का मर्म समझने वालों की मानें तो विरोधियों को रोकने और खुद आगे बढ़ने के लिए हुड्डा परिवार के लिए ही नहीं कैप्टन परिवार के लिए भी यह दोस्ती जरूरी है। लोग बेशक कहें कि राजनीति गुड्डा-गुड्डी का खेल नहीं, मगर बोली में बदलाव तो राजनीति की चतुर खिलाड़ी गुड्डी (कैप्टन अजय सिंह की पत्नी शकुंतला देवी का उपनाम) के खेल का ही परिणाम है।
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कभी सपने भी होते हैं सच उम्मीद पर दुनिया कायम है। महेंद्रगढ़ जिले के दो विधायकों को भी लंबे समय से वेकेंसी का इंतजार है। मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार से पूर्व जिस तरह कई मंत्रियों के विकेट गिरे, वैसी ही उम्मीद हरियाणा में की जा रही है। खबरों में सबसे अधिक निशाने पर राव इंद्रजीत के खास सिपहसालार राज्यमंत्री ओमप्रकाश यादव हैं। उनकी विदाई की खबरें लंबे समय से चल रही हैं। राव के अभयदान देने के बाद कुछ दिन विराम लगा था, मगर मोदी मंत्रिमंडल से हुई कुछ धाकड़ चेहरों की विदाई के बाद ओमप्रकाश की कुर्सी जाने की बातें फिर शुरू हो गई हैं। इन विदाई की चर्चाओं से सबसे अधिक खुशी नांगल चौधरी के विधायक राव अभय सिंह के समर्थकों को मिलती है, मगर अटेली विधायक सीताराम और कोसली विधायक लक्ष्मण सिंह के शुभचितक भी सपने देखने में पीछे नहीं हैं। वैसे इसमें बुराई भी नहीं है। कभी-कभी सपने भी सच होते हैं।
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थम दिल्ली मै काम के करो सो योजना और सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन के बाद अब राव इंद्रजीत को एक नया महकमा मिल गया है। नाम है-कारपोरेट। राव समर्थकों की परेशानी यह है कि उनके पास आम लोगों से सीधे जुड़ाव वाला कोई मंत्रालय नहीं है। लोग गाहे-बगाहे राव समर्थकों पर चुटकी लेते हुए ठेठ देहाती में यह पूछ ही लेते हैं कि भाई नूं बताओ थम दिल्ली मै काम के करो सो। राव समर्थकों की यही परेशानी है। कुछ उच्च शिक्षित लोग भले ही उनके कार्य की जानकारी रखते हों, मगर आम राव समर्थक तो उलझन में हैं। मंत्रिमंडल विस्तार के समय राव समर्थक अपने नेता के लिए कैबिनेट रैंक की उम्मीद कर रहे थे, जबकि विरोधी उनकी छुट्टी का प्रचार कर रहे थे। मोदी ने बीच का रास्ता निकाला। कैबिनेट रैंक तो नहीं दी गई, मगर अब उन्हें पुराने दोनों महकमों के साथ कारपोरेट मंत्रालय में राज्यमंत्री का नया जिम्मा भी दे दिया गया है।
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उम्मीद बंध गई एक समय भाग्यशाली नेता कहलाने वाले पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह ठेकेदार लंबे समय से शांत थे। वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव में टिकट पर कैंची चलने के बाद उनकी राजनीति में सक्रियता कम हो गई थी, मगर कुछ अपवादों को छोड़कर अध्यक्ष जी (ओमप्रकाश धनखड़) की निगाह से कोई छूट नहीं रहा है। धनखड़ ने उन्हें हाल ही में प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य बना लिया है। वर्ष 2014 के विधानसभा चुनावों से पहले किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि बिक्रम कोसली से विधायक बनेंगे, मगर पहले उन्हें राव इंद्रजीत का सानिध्य मिला। फिर लहर के बीच राव की मदद से भाजपा का टिकट मिला। उनकी मदद से ही जीत मिली। पहली बार में ही मंत्री पद मिला, मगर राव से दूरी बनी तो टिकट दूर चला गया। राव से निकटता संभव नहीं लगती, मगर प्रदेश कार्यकारिणी में आने से पार्टी में काम मिलने की उम्मीद तो बंध ही गई।
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