माचाड़ी की वीर प्रसविनी माटी में जन्में थे सम्राट हेमू
प्रथम किश्त: अंतिम ¨हदू सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य का लोगो -श्री राधावल्लभी संप्रदाय के प्रवर्त
प्रथम किश्त: अंतिम ¨हदू सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य का लोगो
-श्री राधावल्लभी संप्रदाय के प्रवर्तक श्रीहित हरिवंशराय के शिष्य थे हेमचंद्र के पिता राय पूरनमल
-घर में होता था वैदिक ग्रंथों का अध्ययन, वैष्णव भक्तिधारा में दीक्षित था परिवार
-चंद्रवंशी राजा उपरिचर के पुत्र मत्सिल ने बसाई थी मत्स्यपुरी, यही है आज का माचेड़ी गांव
महेश कुमार वैद्य, रेवाड़ी
सिर्फ जुबान ही नहीं पत्थर भी बोलते हैं। यकीन नहीं हो तो अलवर जिले के गांव माचाड़ी पहुंचकर खुद अनुभव कर लीजिए। अरावली की सुरम्य पर्वतमाला से घिरे इस गांव में प्रवेश करते ही ऐतिहासिक गांव होने का अहसास हो जाता है। दूर से ही पहाड़ी पर नजर आने वाला बड़गुर्जरों का लगभग आठ सौ वर्ष पुराना खंडहर किला हो या किले की पथरीली राह के दायें-बायें नजर आने वाली हवेलियां, यहां के मंदिर हों या छतरियां, हर इमारत अपने आम में इतिहास है।यह यकीन से कहना मुश्किल है कि इनमें से किस खंडहर हवेली में हेमचंद्र विक्रमादित्य का जन्म हुआ, लेकिन इसमें किसी को भी संदेह नहीं कि माचाड़ी की वीर प्रसविनी माटी में ही ¨हदू हृदय सम्राट हेमू का जन्म हुआ था।
महाभारत काल में चंद्रवंशी राजा उपरिचर के पुत्र मत्सिल ने जिस मत्स्यपुरी की स्थापना की थी, वही है आज का माचेड़ी गांव। अलवर जिले के राजगढ़ रेलवे स्टेशन से मात्र छह किलोमीटर दूर स्थित इसी ऐतिहासिक गांव की माटी में 2 अक्टूबर 1501 को राय पूरनमल के घर हेमचंद्र का जन्म हुआ था। आज का अलवर माचाड़ी की जननी कहा जाता है। यह गांव सड़क मार्ग से रेवाड़ी से लगभग 130 व दिल्ली से 220 किमी दूर है। दिल्ली-रेवाड़ी-अलवर-अहमदाबाद रेलमार्ग पर राजगढ़ स्टेशन पहुंचकर इस गांव में पहुंचा जा सकता है। रेवाड़ी को कर्मस्थली बनाने से पहले ही हेमू के परिजनों का रेवाड़ी में भी ठिकाना बन चुका था। नारनौल तक उनके परिवार की जागीर थी।
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श्रीहित हरिवंश राय के शिष्य थे पूरनमल
हेमचंद्र के पिता राय पूरनमल श्री राधावल्लभ संप्रदाय के प्रवर्तक श्रीहित हरिवंशराय के शिष्य थे। उनके घर में वैदिक ग्रंथों का अध्ययन होता था। किसी की जुबानी भार्गव व किसी की जुबानी ढूसर कहलाने वाला यह परिवार वैष्णव भक्तिधारा में दीक्षित था। हेमचंद्र विक्रमादित्य सहित इतिहास के अन्य विस्मृत पात्रों पर शोध कर रही डा. इंदुराव के अनुसार मत्स्य ही अपभ्रंश होकर आज का माचेड़ी बन गया। कुछ लेखकों ने माचाड़ी को मछेरी या माछेरी नाम दिया है।
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दैनिक जागरण ने अंतिम ¨हदू सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य के व्यक्तित्व व कृतित्व को सामने लाने की एक स्वागत योग्य पहल की है। रेवाड़ी के संत नवलदास व हेमू के पिता संत पूरनमल (पूरनदास) की श्रीहित संप्रदाय में गहरी आस्था थी। वृंदावन उनकी तपोस्थली रही थी।
श्रीहित आनंदलाल गोस्वामी,
राधा वल्लभ संप्रदायाचार्य
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विभिन्न स्थानों का दौरा करने के बाद मैं यह निश्चित तौर पर कह सकती हूं कि भारत मां का गौरव बढ़ाने वाले हेमचंद्र विक्रमादित्य पर इतिहासकारों को और अधिक काम करने की जरूरत है। उनको इतिहास में अभी तक वह सम्मान नहीं मिल पाया, जिसके वह हकदार हैं।
डा. इंदुराव, संस्कृति लेखिका
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हमें गर्व है कि गांव माचेड़ी को अंतिम ¨हदू सम्राट की जन्मस्थली होने का गौरव प्राप्त है। हमने दैनिक जागरण व इतिहास लेखन में जुटी डा. इंदु राव के प्रयासों को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे तक पहुंचाया। राजस्थान सरकार ने माचेड़ी के ऐतिहासिक स्थलों की वस्तुस्थिति की जानकारी के लिए आर्कियोलाजिकल डिपार्टमेंट को पत्र लिखा है।
पृथ्वी ¨सह नरुका, इतिहासकार
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