पानीपत, जेएनएन। शहर की बात करें या गांव की। सच्चाई सबके सामने हैं, पर्यावरण संरक्षण के लिए कोई तैयार नहीं है। अपने फायदे और आलस्य के चलते हम सभी जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। पौधा लगाना तो दूर संरक्षण करना भी मुनासिब नहीं समझते। लेकिन हम लोगों में से कुछ लोग प्रहरी हैं, पर्यावरण प्रहरी। वो न दिन देखते हैं न रात। न गर्मी देखते हैं और न बरसात। पर्यावरण को संरक्षित के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। अब तो लोग उन्हें देखते ही ग्रीनमैन कहने लगे हैं। पढि़ए ये रिपोर्ट।

थर्मल पावर प्लांट। राख की वजह से आसपास की जमीन तक बंजर हो चुकी है। जिस धरा पर पौधों का जिंदा रहना मुश्किल हो जाता है, वहीं पर एक शख्स ने हरियाली लहलहा दी। ये काम इतना भी आसान नहीं था। शुरुआत में 10 फीट तक खोदाई की और 1500 पौधे रोपे, लेकिन इनमें से बचे सिर्फ 10। इस पर वह डिगे नहीं, बल्कि ठान लिया कि अब इन 10 को हजारों की संख्या में बदलना है। आखिरकार करके भी दिखाया। इसी वजह से हरियाणा सरकार ने उन्हें ग्रीनमैन का अवार्ड दिया। हम बात कर रहे हैं पानीपत थर्मल पावर स्टेशन के एक्सईएन सूरजभान की।

 World Environment Day

पांच हजार पौधे लगाए उनको संरक्षित भी किया
सूरजभान ने बताया कि कक्षा आठ तक उन्होंने गांव आसन कलां के सरकारी स्कूल में शिक्षा ग्रहण की है। यह वह दौर था जब गांव में बिजली नहीं थी। अध्यापक स्कूल के मैदान में पेड़ के नीचे बैठाकर पढ़ाते थे। वर्ष 2009 में उन्हें थर्मल में को हैंडि‍लिंग प्लांट का चार्ज मिला था। यहां वातावरण में कोयले(राख) की परत छाई रहती थी। इस कारण अधिकांश अधिकारी ड्यूटी करने से कतराते थे। तब उन्होंने इस जमीन को हरा-भरा करने का बीड़ा उठाया। उनके लगाए पांच हजार पौधे अब जीवित हैं। 

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सूरजभान।

सीएम ने देखा था प्लांट 
वर्ष 2016 में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने थर्मल में को हैंडि‍लिंग प्लांट का दौरा किया था। तब हरियाली की खूब सराहना की थी। थर्मल पावर प्लांट को हरा भरा बनाने के कारण वर्ष 2017 में उद्योग मंत्री विपुल गोयल ने ग्रीन मैन अवॉर्ड से सम्मानित किया। 

घर पर करते हैं पौध तैयार  
एक्सईएन सूरजभान ने बताया कि बरसात के मौसम में घर में ही छायादार और फलदार पेड़ों की पौध तैयार करते हैं। पौध तैयार होने पर आस-पास के गांव के लोगों को भी बांटते हैं। 

इस तरह रोपते हैं पौधे 
थर्मल की जमीन के ऊपर ही नहीं, नीचे भी कोयले की परत जम गई है। सूरजभान दस से पंद्रह फीट तक खोदाई करते हैं। कोयले और काली जमीन को एक तरफ करते हैं। इसमें सामान्य मिट्टी की भराई कराने के बाद खाद के साथ पौधों को रोपते हैं। 

रिलायंस के अधिकारी हो गए थे हैरान 
रिलायंस कंपनी ने जब गूगल मैप से पानीपत थर्मल पावर प्लांट देखा तो काले धुएं की जगह हरियाली देखकर वे चौंक गए। बाद में वह थर्मल प्लांट देखने पहुंचे और समझा कि किस तरह यहां पर पेड़ पनप सके।
(सुनील मराठा, थर्मल पानीपत की रिपोर्ट) 

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पौधों के साथ जीने का जुनून, बरातियों को भी गमले बांटने वाले मास्टरजी
पौधों के साथ रहने का जुनून देखना हो तो जींद के शिक्षक जगदीप सिंह  के घर चले आइये। लोग इन्हें पौधों वाले मास्टरजी भी कहने लगे हैं। घर के प्रवेश द्वार से लेकर कोने-कोने पर आपको कहीं फूल, कहीं फल तो कहीं सजावटी पौधे दिख जाएंगे। इतना ही नहीं, इन्होंने अपनी छत को भी हराभरा पार्क बना दिया है। करीब ढाई सौ गज के घर में 1200 से अधिक गमले हैं। महीने में इन पर 15 हजार से अधिक खर्च करते हैं। गमले खुद अपने हाथों से बनाते हैं। आज पर्यावरण दिवस है। आइये, आपको ले चलते हैं इनके घर। 

अब तो घर में ही गमले बनाने लगे
पेड़-पौधों से इतना लगाव कैसे हुआ, इस बारे में मास्टर जगदीप सिंह बताते हैं कि वर्ष 1986 में जब आठवीं कक्षा में पढ़ता था तब घर में टूटे मटके में बिच्छु बंटी उगाई थी। वह इतना सुंदर लगा कि तब से पौधे रखने का शौक लग गया। 11वीं व 12वीं में साइंस पढ़ी तो पौधों के बारे में लगाव बढ़ता गया। पांच साल में ही घर में करीब 300 गमले जमा हो गए। इसके बाद तो पेड़-पौधे के सेमिनार में जाने लग गए। जहां भी कोई नया पौधा मिलता, उसे खरीद लाते। घर में ही गमले बनाने शुरू कर दिए। 

ये देते हैं दिन-रात ऑक्सीजन
जगदीप सिंह गमलों में लगे पारस पीपल, बोनसाई बड़, पीपल, स्पाइडर प्लांट, स्नेक और एलोवेरा के पौधे दिखाते हुए कहते हैं कि ये 24 घंटे ऑक्सीजन देते हैं। किसी के घर में ये पौधे हों तो वहां प्रदूषण नहीं रह सकता। वह कहते हैं कि हारसिंगार, एरिका पाम, साइकस, टी-साइकस, रबिश पाम जैसे इंडोर प्लांट से घर में सकारात्मक ऊर्जा रहती है। जींद के गांव बड़ौदी राजकीय प्राथमिक स्कूल में जेबीटी शिक्षक जगदीप कहते हैं कि स्कूल से आने के बाद रोज करीब चार-पांच घंटे इन पौधों को देता हूं। रिटायरमेंट के बाद अपना जीवन समाज में हरियाली लाने के लिए लगा दूंगा। 

पौधों के लिए देहरादून तक गए
जगदीप सिंह कहते हैं कि वह देहरादून, हिसार, टोहाना, दिल्ली सहित कई जगहों से अलग-अलग वैरायटी के पौधे इकट्ठे कर चुके हैं। इन पौधों, गमलों आदि पर पांच लाख रुपये से ज्यादा खर्च कर चुके हैं। हर महीने 15 हजार रुपये खर्च होते हैं। दूर से पौधे लाने के लिए स्पेशल जीप भी खरीद रखी है। देहरादून, हिसार या कहीं बाहर कार की बजाय इसी जीप में जाते हैं और आते समय गाड़ी को पौधों से भर लाते हैं। 

दहेज में दिए थे 11-11 पौधे, सीएम कर चुके सम्मानित 
जगदीप सिंह ने बेटी चंचल व भतीजी की शादी में दहेज में 11-11 पौधे दिए थे और एक फेरा पर्यावरण संरक्षण के नाम पर दिलाया था। इस अनूठी पहल पर मुख्यमंत्री मनोहरलाल ने दोनों बेटियों को दान में एक-एक लाख रुपये दिए थे। पिछले साल छोटी बेटी दीपिका की शादी में बरातियों को गमले दिए थे। जगदीप कहते हैं कि उनसे प्रेरणा लेकर काफी लोगों ने घरों में बड़ी संख्या में गमले रख लिए हैं। गांव में कोई बरात आती है तो ये बरातियों को गमले, पौधे बांटने की सीख देते हैं। उनकी बात को हर कोई मानता भी है। 

इन पौधों का खास कलेक्शन
जगदीप के पास, प्रेमना, गूगल, फ्रांस, देसी चंपा, रात की रानी, हींग, तेज पत्ता, मल्टी स्पाइस, करौंदा, साइपर्स, कपूर, धार्मिक पौधा शम्मी, अकरकारिया, गुडेला, एरिकाजाम, इमली, चीड़ सहित अनेकों किस्म के पौधे हैं। हरियाणा की धरती से लगभग लुप्त हो चुके जाल, कैंदू, खैर, बकैन, पिलखन के पौधे भी यहां लहलहा रहे हैं।
(कर्मपाल गिल, जींद की रिपोर्ट)

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डॉ. अनिल दहिया।

इंजीनियरिंग के साथ ही डॉ. दहिया को है पौधों का शौक
कुरुक्षेत्र में उच्च शिक्षा प्राप्त कर भले ही किसान का बेटा इंजीनियरिंग के क्षेत्र में एनआइटी जैसे संस्थान में प्रोफेसर के पद पहुंच गया हो, लेकिन उनका पेड़ पौधों से प्यार कम नहीं हुआ। प्रकृति प्रेम ने उन्हें एनआइटी में सभी का चहेता बना दिया है। यहां बात हो रही है एनआइटी कुरुक्षेत्र के इलेक्ट्रानिक्स विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अनिल दहिया की। 

अब तक लगा चुके हैं 50 हजार पौधे 
डॉ. अनिल दहिया को अगस्त 2012 में एनआइटी के होर्टिकल्चर का प्रोफेसर इंचार्ज बनाया गया था। इसके बाद से वे लगभग 50 हजार पौधे लगा चुके हैं। पिछले एक साल में उनकी देखरेख में एनआइटी प्रशासन और एचटीएस संस्था की ओर से लगभग 10 हजार पौधे लगाए जा चुके हैं। उन्होंने इस बार कई गांवों और शहर में भी पौधरोपण किया है। 

एनआइटी परिसर में लगाए हैं औषधीय पौधे 
डॉ. दहिया ने एनआइटी परिसर में 60 प्रकार के पौधे लगाए हैं। इनमें 30 पौधे फूलों के और 30 अन्य पेड़ लगाए गए हैं। परिसर में हरड़, एलोवीरा, आंवला, गिलोय, बालमखीरा आदि दर्जन भर औषधीय पौधे भी लगाए गए हैं। एनआइटी में डॉ. दहिया की देखरेख में कचरे से खाद बनाकर और गंदे पानी को ट्रीट कर पौधों में प्रयोग किया जाता है।
(सतीश चौहान, कुरुक्षेत्र की रिपोर्ट)

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Posted By: Anurag Shukla