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पानीपत/कुरुक्षेत्र, [पंकज आत्रेय]।  पिहोवा (पृथुदक) तीर्थ। महाभारत युद्ध भूमि कुरुक्षेत्र के पास बसी एक ऐसी नगरी जहां से पितरों को मुक्ति मिलती है। माना जाता है कि भगवान श्री कृष्ण, युधिष्ठिर और अन्य पांडवों ने महाभारत के युद्ध के बाद अपने सगे संबंधियों और जो युद्ध में मारे गए थे उनका श्राद्ध और पिंडदान पिहोवा (पृथुदक) तीर्थ में करवाए गए थे। क्योंकि यह देव भूमि युग युगांतरों से मृत आत्माओं की सदगति एवं शांति के लिए शास्त्रों व पुराणों में वर्णित रही है। आज भी हजारों यात्री दूर-दूर से श्राद्ध पक्ष में अपने पितरों की तृप्ति के लिए इस तीर्थ पर श्राद्ध करने आते हैं। यहां श्राद्धदेव का मंदिर भी है। आइए जानते हैं पिहोवा तीर्थ के महत्‍व को।

200 साल पुरानी वंशावली रखते हैं पिहोवा के तीर्थ पुरोहित
पृथुदक तीर्थ पर करीब 250 तीर्थ पुरोहित हैं जिनके पास करीब 200 साल पुरानी वंशावली उपलब्ध है। अपने पितरों के पिंडदान के लिए कई बड़ी हस्तियां पिहोवा तीर्थ पर पहुंच चुकी हैं। इनमें गुरुनानक देव जी के वंशज, गुरुगोबिंद सिंह जी के वंशज, गुरु अमरदास जी के वंशज, गुरु तेग बहादूर, गुरु हरगोबिंद, महाराजा रणजीत सिंह, पटियाला के महाराजा के वंशज, हिमाचल से नूरपुर महाराजा के वंशज, स्वामी ज्ञानानंद की वंशावली सहित फिल्मी हस्तियां सुनील दत्त आदि शामिल हैं।

श्रद्धा से पितरों के निमित दान ही श्राद्ध : महंत बंसी पुरी
हरियाणा साधू समाज के प्रदेशाध्यक्ष एवं श्री दक्षिणा कालीपीठ के महंत बंसी पुरी ने श्राद्ध के महत्व के बारे में बताया कि देश, काल तथा पात्र में श्रद्धा द्वारा जो भोजन व दान ब्राह्मणों को दिया जाए, उसे ही श्राद्ध कहा जाता है। वैसे तो श्राद्ध किसी भी स्थान पर श्रद्धा के अनुसार किया जा सकता है। परंतु किसी तीर्थ विशेष पर श्राद्ध का फल अधिक पुण्यदायी व कल्याणकारी है। अश्विन मास में प्रतिवर्ष कृष्ण पक्ष को श्राद्ध मनाए जाते हैं। इस अवधि में प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक 15 श्राद्ध मनाए जाते हैं। अमावस्या को सभी पितरों व अज्ञात पितरों का श्राद्ध किया जाता है। महंत बंसी पुरी जी ने आगे बताया कि श्राद्ध में श्रद्धा पूर्वक उत्तम भोजन व व्यंजन बनाकर पूर्ण शुद्धि के साथ ब्राह्मण को खिलाया जाता है तथा वस्त्र, मुद्रा व फल आदि का तर्पण सहित दान किया जाता है।

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गया जाकर भी पहले करनी पड़ती है पृथुदक बेदी की पूजा
तीर्थ पुरोहित अनुसार श्रद्धों में पिहोवा तीर्थ पर (पृथुदक) पिंडदान करने का विशेष महत्व है। यदि कोई श्रद्धालु पिहोवा पिंडदान किए बिना गया जी चला जाता है तो उसे वहां भी पहले पृथुदक बेदी की पूजा करनी पड़ती है।

12 प्रकार के माने जाते हैं श्राद्ध
पंडित विनोद शास्त्री ने अनुसार श्राद्ध की महत्वता की चचर मत्स्य पुराण, यमस्मृति, भविष्य पुराण, ब्रह्म पुराण, आदित्य पुराण, कर्म पुराण, गरुड पुराण, स्कंद पुराण आदि में विस्तार से की गई है। इसके अतिरिक्त बृहस्पति, महर्षि जाबालि, महर्षि काठणरजिनी तथा महर्षि सुमंतु ने भी श्राद्ध की अपार महत्ता का वर्णन किया है। परंतु सभी का निष्कर्ष निकालने पर श्राद्ध निम्‍नलिखित 12 प्रकार के माने गए हैं:- नित्य श्राद्ध, नैमितिकश्राद्ध, वृद्धि श्राद्ध, काम्‍य श्राद्ध, सपिंडन श्राद्ध, पार्वण श्राद्ध, गोष्ठी श्राद्ध, शुद्धार्थ श्राद्ध, कर्माग श्राद्ध, दैविक श्राद्ध, यायार्थ श्राद्ध तथा पुष्टार्थ श्राद्ध।

प्रसिद्ध तीर्थ पर श्राद्ध का विशेष महत्व
धर्मगुरु संजीव भारद्वाज का कहना है कि सिद्ध तीर्थ पर श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। सदियों पहले ऋषि-मुनियों ने पृथुदक तीर्थ में तपस्या की थी। जिससे तीर्थ का महत्व काफी अधिक है। इसलिए यदि ऐसे तीर्थ पर श्राद्ध कर्म किया जाए तो उसका विशेष फल प्राप्त होता है।

गया से पहले पिहोवा आते हैं श्रद्धालु
तीर्थ पुरोहित आशीष चक्रपाणी का कहना है कि मान्यता है कि पिहोवा तीर्थ पर पिंडदान का गया जी से भी अधिक महत्व है। उनके तीर्थ पुरोहित जोकि हिमाचल से आते हैं वे पहले पिहोवा तीर्थ में पिंडदान करवाते हैं और फिर गया जी जाते हैं।

मात्र पिहोवा में ही होती है श्राद्धदेव जी की पूजा
भारतीय इतिहास संकलन समिति हरियाणा की पिहोवा शाखा के संयोजक विनोद पचौली ने बताया कि पिहोवा में स्थित दशनामी डेरा में धर्मराज जी के मंदिर में आज भी श्राद्धदेव जी की प्राचीन मूर्ति स्थापित है। श्राद्धदेव महाराज जी का सरस्वती तट पर महाभारत काल में भी मंदिर था। जिसका विवरण भागत पुराण दशम स्कंद के बीच में विदूर द्वारा तीर्थ यात्र में मिलता है। यहा श्राद्धदेव के रूप में यमराज उपस्थित रहते हैं।

Posted By: Anurag Shukla

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