करनाल, [पवन शर्मा]। द लास्‍ट राइट्स, आखिरी अधिकार कौन से? ये बताती हैं आस्‍था अपनी उस फिल्‍म के जरिये, जिसमें वो बेटियों की बात करती हैं। दादी के देहांत के बाद बनारस के मणिकर्णिका घाट में बेटी संस्‍कार करना चाहती है। वहां उसे संस्‍कार तो दूर, श्‍मशान घाट में भी प्रवेश नहीं करने दिया जाता। बेटियों को भी अंतिम संस्‍कार का अधिकार सौंपने की वकालत करती आस्‍था ने द लास्‍ट राइटस के जरिये पूरे समाज को झकझोरा है। करनाल की बेटी आस्‍था की यह फिल्‍म टोपाज फिल्‍म फेस्‍टिवल में 8 सितंबर को वर्चुअल रिलीज होगी। वार्नर ब्रॉस स्टूडियो में प्राइवेट स्क्रीनिंग को अपार सराहना मिली। अब दस देशों के लोग इस मूवी को देख सकेंगे।

करनाल की बेटी आस्‍था की मूवी का टोपाज फिल्‍म फेस्‍टिव में चयन, 8 सितंबर को होगी रिलीज

बनारस में ही शूट फिल्म की स्क्रीनिंग अमेरिका सहित ब्रिटेन, आयरलैंड, कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, नीदरलैंड, जर्मनी, फ्रांस व स्पेन में भी होगी। फेस्टिवल की वेबसाइट पर इसका शेड्यूल जारी हो गया है। आस्था ने गत वर्ष द लास्ट राइट्स बनाकर बेटियों को शोषण के खिलाफ आवाज उठाने का संदेश दिया था।

बेटियों को भी अंतिम संस्कार का अधिकार दिलाने की वकालत करती है यह चर्चित फिल्म

आस्था कहना चाहती थीं कि वक्त आ गया है, जब बेटियों को भी वे तमाम अधिकार मिलें, जिनके बारे में उनका सोचना तक गुनाह माना जाता था। आस्था कहती हैं कि यह विडंबना है कि जो स्त्री मनुष्य को जन्म देती है, उसे कभी पुरुषों की तरह बड़ों का दाह संस्कार नहीं करने दिया जाता।

कौन हैं आस्था

आस्था अब अमेरिका के लॉस एंजिल्स में हैं। उनका जन्म 2 सितंबर 1996 को करनाल में हुआ। माता-पिता करनाल में रहते हैं। आस्‍था दुबई शिफ्ट हो गईं, जहां उन्होंने हाईस्कूल किया। हेरिएट वाट यूके स्कॉटलैंड यूनिवर्सिटी से एमबीए करके आस्था ने लॉस एंजिल्स का रुख किया, जहां न्यूयॉर्क फिल्म अकादमी से फिल्म मेकिंग में मास्टर डिग्री ली।

उनकी पहली फिल्म द अनसंग फैदर ने यूएसए व यूरोप के समारोहों में सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार सहित नौ पुरस्कार जीते। यह विदेश में रेसिज्म जैसे चर्चित विषय पर आधारित थी। साधविश फिल्म्स के एमडी आस्था के पिता अनिल व माता इंदु बताते हैं कि बेटी को चुनौतियों से प्यार है। 40 से अधिक लघु फिल्मों में आस्था लेखिका, निर्माता-निर्देशक रही हैं।

गंगा घाटों पर जीवंत हुए किरदार

आस्था ने "द लास्ट राइट्स' के लिए ऐसी लोकेशंस चुनीं, जहां किरदार जीवंत हो उठें। वाराणसी में गंगा घाटों पर शूटिंग की। उसी घाट पर दाह संस्कार का दृश्य फिल्माया, जहां महिलाओं का जाना वर्जित है। आस्था ने ब्राह्मणों, शिक्षाविदों, संतों-महात्माओं से विस्तृत चर्चा करके स्क्रिप्ट तैयार की। फिल्‍म में मुख्‍य चरित्र का नाम काशी है। उसके पिता का देहांत हो चुका होता है। दादी का देहांत हो जाता है।

काशी अपनी दादी का सामान देखती है तो उसमें एक पत्र मिलता है, जो राशि के नाम ही होता है। दादी की अंतिम इच्‍छा थी कि उसकी पोती अंतिम संस्‍कार करे। मणिकर्णिका घाट पर राशि पहुंच जाती है। यह सीन नंदेश्‍वर घाट पर फिल्‍माया गया है हालांकि फिल्‍म में मणिकर्निका दिखाया है। वो उस चिटठी को पढ़कर सुनाती है। सभी भावुक हो जाते हैं। आंसुओं के साथ चाचा अस्‍थि कलश को राशि के हवाले करते हैं।

स्‍व अटल बिहारी वाजपेयी को उनकी दत्‍तक बेटी ने दी थी मुखाग्‍नि, वहीं से फिल्‍म का आइडिया मिला

आस्‍था ने बताया कि उन्‍होंने समाचारपत्र में पढ़ा कि हमारे प्रधानमंत्री स्‍व. अटल बिहारी वाजपेयी को उनकी दत्‍तक बेटी नमिता ने मुखाग्‍नि दी है। जब मां से बात की तो उन्‍होंने बताया कि बेटियों को संस्‍कार पर जाने की भी अनुमति नहीं होती। सैकड़ों, हजारों ऐसी बेटियां होती होंगी जो अपने मां-पिता के अंतिम संस्‍कार में नहीं जा पाती। द लास्‍ट राइटस में मैंने इसी पीड़ा, भावनाओं को साझा किया है। बीस मिनट की यह फिल्‍म रूढ़ीवादी परंपराओं पर सवाल उठाती है। जवाब देती है।

 

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