महावीर गोयल, पानीपत : औद्योगिक इकाइयों से निकल रहा केमिकल युक्त पानी प्रदूषण का बड़ा कारण बनता जा रहा है। हालांकि इनके समाधान के लिए कामन इन्फ्ल्यूएंस ट्रीटमेंट प्लांट (सीइटीपी) लगाए गए हैं। 42 एमएलडी की क्षमता के दो सीइटीपी सेक्टर 29 में लगे हैं। साथ ही घरों से निकलने वाले गंदे पानी को साफ करने के लिए सात एसटीपी लगाए जा चुके हैं। सिवाह में दो एसटीपी (सीवर ट्रीटमेंट प्लांट) लगे हुए हैं। सीवर प्लांट के साथ सीइटीपी मानकों पर खरा नहीं उतर रहे हैं। यमुना भी प्रदूर्षित हो रही है।

सिवाह स्थित 25 एमएलडी क्षमता के सीवर ट्रीटमेंट प्लांट में सलज पानी साफ करने में निकलने वाले अवशेष का डाटा प्रबंधन भी नहीं किया जा रहा है। लैब में भी कमियां मिल रही हैं। एसओएस (स्टेंडर्ड आपरेटिग प्रोसेसर) का भी पालन नहीं हो रहा है। 35 एमएलडी सीवर ट्रीटमेंट प्लांट में मिथेन गैस एनालाइजर भी काम नहीं कर रहा। जो सलज निकल रही है, उस का भी समुचित प्रबंधन नहीं किया जा रहा है। सेक्टर 29 पार्ट 2 में लगे 21 एमएमलडी क्षमता कामन ट्रीटमेंट प्लांट में डिस्पले बोर्ड तक वर्किंग नहीं कर रहा। एसओपी की गाइड लाइन का पालन नहीं हो रहा। क्लोरिनेशन भी समुचित नहीं किया जा रहा है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एसटीपी और सीइटीपी चलाने वाले ठेकेदार सहित हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण निगम को नोटिस जारी किए हैं। रीवर यमुना मानीटरिग कमेटी ने किया निरीक्षण

आरवाइएमसी की टीम ने पिछले दिनों एसटीपी, सीइटीपी का औचक निरीक्षण किया था। डा. पीकेएमके दास के नेतृत्व में कमेटी ने निरीक्षण किया। निरीक्षण दौरान एसटीपी सीइटीपी में अनेक खामियां मिली। नतीजन सैकड़ों औद्योगिक इकाइयों से निकल रहा केमिकल लोगों की सेहत बिगाड़ने व यमुना को जहरीली करने का काम कर रहा है। साथ ही करोड़ों रुपये की लागत से बने सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट में साफ किए गए पानी के नाले में डाला जा रहा है। नाले का पानी यमुना में मिल रहा है। नाले में पानी

सीवर के सामान्य पानी में केमिकल आक्सीजन डिमांड (सीओडी) 400-500 एमजी प्रति लीटर होती है। अधिक होने के कारण डिस्पले बोर्ड को ठीक से मेंटेन नहीं किया जा रहा। जो पानी साफ होता है, उसे साथ लगते नाले में डाल दिया जाता है। इससे सही डाटा ही नहीं मिलता कितना पानी साफ किया गया। टैंकर से ड्रेन में डाल रहे पानी

पानीपत में टेक्सटाइल औद्योगिक नगरी के नाम से विख्यात है। यहां मिक कंबल, प्लास्टिक उद्योगों के साथ, ढलाइ से लेकर डाइंग हाउस उद्योग भी बड़े स्तर पर है, लेकिन ऐसी इकाइयों की संख्या कम नहीं है जिनसे निकलने वाला केमिकल युक्त पानी सीधे नदियों में गिर रहा है। उद्योगों से टैंकर के माध्यम से गंदा पानी ड्रेन में डाला जा रहा है। खेतों में ब्लीच हाउस का पानी छोड़ा जा रहा है। बीमारियों का भय

एसटीपी में क्षमता से आधा पानी जा रहा है, बाका पानी सीधे यमुना में जा रहा है। शहर में 200 किलोमीटर में खुले नाले बने हुए हैं। बाहरी कालोनियों में पानी की निकासी का प्रबंध नहीं है। पानी कालोनियों में ही बहता है। क्षेत्र में पीने के पानी की शुद्धता का मानक भी बिगड़ चुका है। ग्राउंड लेवल गिरने के साथ ही जमीन का पानी भी प्रदूषित हो रहा है। जीरो डिस्चार्ज पालिसी जरूरी

औद्योगिक शहर में जीरो डिस्चार्ज पालिसी की जरूरत है। जेडएलडी लगवाने के लिए जल मंत्रालय की टीम भी पानीपत का सर्वे कर चुके ही। नए उद्योग जल बाहर नहीं छोड़ सकते । उसके बाद भी जल प्रदूषण की समस्या गंभीर बनी हुआ। पिछले दिनों जिला के गांव चुलकाना में जमीन का पानी तक खराब होने की शिकायत मिली है। मामला विधानसभा में जनप्रतिनिधि उठा चुके हैं। जनस्वास्थ्य विभाग के तीन ट्यूबवेल में भी केमिकल युक्त पानी आने की शिकायत मिली है। दो ट्यूबवेल बंद किए जा चुके हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने स्वास्थ्य विभाग से रिपोर्ट मांगी है कि प्रदूषित पानी से कितने लोग बीमार हुए हैं। फिर से लिए सैंपल

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के रीजनल आफिसर कमलजीत सिंह ने बताया कि यमुना में जाने वाली ड्रेन में डाला जाने वाले सभी आठ प्वाइंट से पानी की सैंपल लिए हैं। जांच के लिए लैब में भेजा गया है। रिपोर्ट होने पर कार्रवाई की जाएगी। एसटीपी, सीइटीपी ठेकेदार सहित संबंधित विभाग को नोटिस दिया जा चुका है। इन प्वाइंट के लिए सेंपल

थिराना, खोजकीपुर, ड्रेन नंबर दो, पानीपत ड्रेन, शिमला गुजरान, सिवाह, घरौंडा ड्रेन शामिल हैं। इन प्वांइट पर यमुना में जाने वाले ड्रेन में नालों, सीवर का पानी मिलता है।

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