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    जानें क्या है खैर की लकड़ी, झारखंड से हरियाणा में भारी मात्रा में हो रही तस्करी

    By Rajesh KumarEdited By:
    Updated: Tue, 01 Mar 2022 07:29 PM (IST)

    झारखंड से हरियाणा में हो रही खैर की लकड़ी की तस्करी। इंटरनेशनल मार्केट में है भारी डिमांड। खैर की लकड़ी बहुत महंगी होती है। जिसके कारण इसकी तस्करी भी की जा रही है। इस रिपोर्ट में जानें बेशकीमती खैर की लकड़ी के बारे में।

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    झारखंड से हरियाणा में खैर की लकड़ी की तस्करी।

    यमुनानगर, जागरण संवाददाता। यमुनानगर में सीआइए टू की टीम ने झारखंड से ट्रक में खैर लेकर आ रहे तीन तस्करों को पकड़ा है। इस ट्रक से 230 क्विंटल खैर बरामद हुई है। यमुनानगर सहित प्रदेश के कई जिलों में खैर के पेड़ हैं। अब खैर तस्करी का झारखंड से कनेक्शन जानने के लिए पुलिस की टीमें सुबूत जुटा रही है। अभी तक की जांच में सामने आया कि जिले से 1500 किमी दूर झारखंड में जंगल अधिक हैं। वहां पर तस्करों को खैर सस्ती पड़ती है। इसे वह कींकर की बिल्टी पर लेकर आते हैं। इसकी वजह यह है कि कींकर व खैर की लकड़ी देखने में एक जैसी लगती है। इसे विशेषज्ञ ही पहचान सकते हैं। सीआइए टू ने खैर से लदा ट्रक पकड़ा था। लकड़ी की जांच भी वन विभाग के अधिकारियों से कराई। जिसके बाद ही पता लगा कि यह खैर की लकड़ी है।

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    पुलिस के मुताबिक, खैर तस्करी के मामले में मानकपुर निवासी नसीम, अर्जुननगर का माजरा निवासी प्रिंस और झारखंड के गढवा के गांव महुलिया निवासी चालक इरफान को पकड़ा गया है। ट्रक को इरफान चला रहा था, जबकि नसीम व प्रिंस ट्रक के आगे काली स्कार्पियो गाड़ी में चल रहे थे। यहां से ट्रक लेकर हिमाचल प्रदेश के कालाआंब जाना था, क्योंकि हिमाचल के कालाआंब में कत्थे की प्राइवेट फैक्ट्री है। कत्थे में खैर का प्रयोग होता है। इसके अलावा खैर का प्रयोग दवाईयां बनाने में भी होता है। वहां पर दवाईयों की काफी फैक्ट्री है। इसलिए यहां पर काफी मात्रा में खैर की खपत होती है।

    छछरौली व प्रतापनगर क्षेत्र के कई गांवों में खैर की तस्करी

    छछरौली व प्रतापनगर क्षेत्र के कई गांवों में खैर की तस्करी में लोग शामिल हैं। वन विभाग की टीम भी यदि खैर तस्करों पर कार्रवाई करती है, तो अधिकतर इस क्षेत्र के गांवों के ही आरोपित पकड़े जाते हैं। इस क्षेत्र के लोगों को खैर की अच्छी तरह से पहचान है। अब झारखंड से खैर की तस्करी लाते हुए भी छछरौली के गांव मानकपुर निवासी नसीम व अर्जुन का माजरा प्रिंस को पकड़ा गया है। पुलिस के मुताबिक, खैर तस्करी में लिप्त इन लोगों को यहां तक पता होता है कि खैर कहां पर बेची जाती है। इसलिए ही यह लोग अब झारखंड से तस्करी कर रहे हैं। वहां पर इन्हें खैर सस्ती मिलती है। कींकर की बिल्टी पर खैर को लेकर आते हैं। यदि कोई रास्ते में रोककर जांच भी करता है, तो वह खैर को पहचान नहीं पाता। इसलिए ही यह तस्कर झारखंड से बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश राज्यों से होते हुए हरियाणा तक पहुंच गए।

    पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम के तहत प्रतिबंधित

    वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम 1900 के तहत हरियाणा में दफा चार लगी हुई है। इसके तहत पंचकूला से शाहजाहपुर, बिलासपुर, साढौरा, छछरौली, दादूपुर, कलेसर व अन्य में कोई भी पेड़ नहीं काटा जा सकता। जहां तक झारखंड की बात है, तो यहां पर जंगल अधिक हैं। वहां पर तस्करी आसानी से हो जाती है। कुछ यमुनानगर के जो पुराने तस्कर हैं। इनको खैर के पेड़ की पहचान है और यह तक पता है कि कहां बिक सकती है। हिमाचल प्रदेश के कालाआंब में कत्थे की फैक्ट्री है। जिसमें खैर की लकड़ी की काफी मांग रहती है। करीब आठ हजार रुपये प्रति क्विंटल तक का रेट रहता है। यदि खैर बेचनी है, तो उसकी सरकारी नीलामी होती है। उसके पूरे दस्तावेज तैयार किए जाते हैं।

    अभी चल रही जांच

    सीआइए टू के इंचार्ज नरेंद्र सिंह का कहना है कि अभी आरोपित रिमांड पर हैं। अभी केस की जांच चल रही है। बरामद की गई खैर का कोई भी दस्तावेज आरोपित नहीं दिखा सके। इनके पास से कींकर की बिल्टी मिली है। आरोपित इरफान पर पहले करनाल में खैर तस्करी के मामले में पकड़ा जा चुका है। अभी नसीम व प्रिंस का भी रिकार्ड खंगाला जा रहा है।

    बिहार में खैर तस्करी में पकड़ा जा चुका निसार

    वर्ष 2019 में मानकपुर निवासी निसार अली को बिहार के गढ़वा रेहला मुख्य पथ के बेलचंपा स्थित बिरला एस फैक्ट्री के पास से बिना नंबर की ट्रैक्टर ट्राली के साथ पकड़ा गया था। जिसमें खैर लदी हुई थी। उस समय रांची पुलिस ने दावा किया था कि यह निसार खैर की लकड़ी तस्करों का सरगना है। हालांकि परिवार के लोगों का कहना था कि उनके पास खैर की लकड़ी बेचने का परमिट है। वह उत्तर प्रदेश और बिहार में खैर की लकड़ी बेचने व खरीदने का धंधा करते हैं।