अंबाला, [अवतार चहल]। 1947 में बंटवारे की आग की लपटों से अंबाला भी अछूता नहीं रहा था। पाकिस्तान में हो रही मार काट और कत्लेआम की आंच ने यहां भी झुलसा कर रख दिया। लोगों ने गुस्से में काफिलों को रोक कर मार धाड़ शुरू कर दी। ऐसा ही कुछ पंजोखरा साहिब में भी हुआ। लेकिन यहां पर काफिलों के साथ निकल रही महिलाओं पर अंगुली तक नहीं उठने दी गई।

25 से 30 महिलाओं को गांव के बीच में बनी धर्मशाला में शरण दी गई। ग्रामीणों ने इंसानियत के नाते दो से तीन महीने तक बचाकर रखा और बाद में माहौल शांत होने पर प्रशासन के सुपुर्द कर दिया था।

अंबाला शहर के गांव पंजोखरा साहिब के रहने वाले भारत भूषण अग्रवाल ने बताया कि 1947 के दंगों के समय वह महज छह वर्ष के थे, लेकिन उन्होंने सारा हाल खुद देखा था। उन्होंने बताया कि आजादी से पहले पंजोखरा में जुलमगढ़ के नाम जगह पर उनका स्कूल था, जहां कुछ माह तक पढ़ाई की। उनके पिता ने 1942 में अंबाला शहर स्थित पुरानी अनाज मंडी में घर तैयार कर लिया था। लेकिन उसमें शिफ्ट नहीं किया था। 1947 के दंगों के दौरान भी वह गांव में ही रहे। क्योंकि उनकी गांव में करियाना की दुकान थी। लेकिन जैसे ही बंटवारे की आग की आंच कम हुई तो उन्होंने अंबाला शहर में शिफ्ट कर लिया था।

गांव की महिलाएं हर स्थिति से निपटने को रहती थी तैयार

गांव पंजोखरा साहिब में पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाएं भी हर स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहती थी। क्योंकि उस दौरान कहीं से भी हमला होने का खतरा बना रह रहा था। ऐसे में महिलाओं ने अपने बचाव के लिए मकानों की छतों पर ईंट-पत्थर रख लिये थे। यदि कोई काफिला हमला कर दे तो उससे आसानी से निपटा जा सके। दोनों ओर कत्लेआम होने पर दंगाइयों ने कोहराम मचा दिया था। हालात बुरी तरह से बिगड़ गए थे। दंगाइयों के कारण अन्य लोग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे थे। दंगाई काफिलों को निशाना बनाने लग गए थे और हमला कर छीनाझपटी शुरू हो गई थी।

दंगाई घोड़ों पर सवार होकर हाथों में रखते थे नंगी तलवारें

उन्होंने बताया कि 1947 के बंटवारे का खौफ आज भी बरकरार है। जब पुराने जख्म ताजा हो जाते हैं तो याद कर रौंगटे खड़े हो जाते हैं। दंगाई घोड़ों पर सवार होकर हाथों में नंगी तलवारें रखते थे। कोई काफिला फंस जाता था तो खून की नदी बहने लग जाती थी। उन्होंने बताया कि अंबाला शहर में भी एक दूसरे को निकाल कर मकान कब्जाए जा रहे थे।

Edited By: Anurag Shukla