Dussehra 2022: कर्णनगरी में 122 साल पुरानी दशहरे की पंरपरा, लालटेन की रोशनी में होता था रामलीला मंचन
करनाल में 122 साल पुरानी परंपरा आज भी चली आ रही है। कर्ण नगरी की कमेटियां इस पुरानी परंपरा को निभा रही हैं। लंबे सफर में रामलीलाओं के मंचन ने बड़े बदलाव का दौर देखा है। लालटेन की रोशनी में रामलीला का मंचन होता था।

करनाल, [पवन शर्मा]। कर्ण नगरी में रामलीला मंचन की करीब 122 वर्ष पुरानी परंपरा है। इस दरमियान रामलीला के आयोजकों व दर्शकों ने कई अहम बदलाव देखे हैं। शुरुआत दौर में जहां बेहद आम संसाधनों की मदद से मंचन किया जाता था वहीं अब अत्याधुनिक तकनीक के प्रयोग की बदौलत रामलीलाओं का स्वरूप काफी हाईटेक हो चला है।
लालटेन की रोशनी में होता था मंचन
शहर में पहलेपहल श्री रामलीला सभा मंचन करती थी। अब श्री रामायण पाठक सभा भी परंपरा निर्वहन कर रही है। रामलीला का आयोजन पहली बार 1904 में प्रधान चमनलाल बैंकर की देखरेख में किया गया था। आरंभिक दौर में शहर का दायरा काफी कम था और उस समय के भीड़-भाड़ वाले इलाकों में शुमार चौड़ा बाजार के एक बड़े चबूतरे पर पेड़ के नीचे लालटेन की रोशनी में लीला मंचित की जाती थी। आमंत्रित किए गए अतिथियों के लिए कुर्सियों का इंतजाम किया जाता था। आम लोग और खासकर बच्चे दरियों पर बैठकर लीला का आनंद उठाते थे। फिर समय के साथ अधिक स्थान की आवश्यकता हुई तो दशहरा मैदान में मंचन होने लगा। अब रेलवे रोड स्थित रामलीला भवन में लीला मंचित होती है।
पीढ़ियां सहभागी, बाहरी कलाकार भी आते रहे
रामलीला में आज कई कलाकारों के परिवार की चौथी पीढ़ी सहभागी है। 1947 में विभाजन त्रासदी व 1975 में आपातकाल के दौरान मंचन नहीं हुआ। फिर काेरोना काल में मंचन बाधित रहा। जनता मंडी में भी मंचन किया जाता था। बाहरी मंडलियों को बुलाकर भी यहां कई बार रामलीला मंचन कराया गया है। इनमें हरिद्वार, मुरादाबाद, अयोध्या और अन्य स्थानों की मंडलियां प्रमुख हैं। 2016 में मुरादाबाद की कार्तिकेय सांस्कृतिक संस्था के कलाकारों ने प्ले बैक से मंचन किया था। यानि मंच पर एक भी बार पर्दा गिरे बिना कलाकारों ने केवल अभिनय किया जबकि संवाद पर्दे के पीछे से बोले गए थे।
इन लीलाओं की भी अलग पहचान
शहर के पास कुंजपुरा में भी नौ दशक से अधिक समय से रामलीला मंचित की जाती है। कुंजपुरा स्थित श्री महावीर ड्रामेटिक क्लब के प्रेमपाल सागर व राजपाल रोजड़े के अनुसार ब्रिटिश काल यानि 1930 से यहां लीला मंचन शुरू हुआ। तभी से यह परंपरा लगातार निभाई जाती रही लेकिन कोरोना काल में मंचन नहीं हो सका। तब श्रद्धालुओं की आस्था का ध्यान रखते हुए नवरात्र के दौरान क्लब की ओर से हनुमान चालीसा का पाठ व भजन कीर्तन किया गया। इसके अलावा कुछ समय पहले मुलतानी समाज के लोग लाइन पार क्षेत्र में दिन में लोक भाषा में रामलीला करते थे। मुख्यत: विभाजन के समय पाकिस्तान से आए विस्थापित जिम्मेदारियां निभाते थे। अब यह लीला बंद है।
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