गीता की जन्मस्थली से दे रहे सुरों का संदेश, आर्थिक रूप से कमजोर बच्चाें को कर रहे पारंगत
गीता की जन्मस्थली से सुरों का संदेश दिया जा रहा है। डा. मनीष कुकरेजा आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को बांसुरी में पारंगत कर रहे। अस्पताल संभालने के बाद खुद बांसुरी के गुर सिखाते हैं। 10 बच्चों को प्रशिक्षित कर रहे।

पानीपत/कुरुक्षेत्र, [विनीश गौड़]। पेशे से आयुर्वेदिक चिकित्सक डा. मनीष कुकरेजा भी कुरुक्षेत्र की धरती से आर्थिक बच्चों को कर्म का संदेश देकर उन्हें बांसुरी जैसी विद्या में पारंगत कर रहे हैं। न केवल वे खुद इन बच्चों को सात सुरों का ज्ञान दे रहे हैं बल्कि प्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के गुरु पंडित भोला प्रसन्ना के पुत्र पंडित अजय प्रसन्ना और बांसुरी के बड़े ज्ञाताओं की कार्यशाला लगवाकर उन्हें नई-नई तकनीक सीखने का मौका भी दे रहे हैं। अब तक वे 10 ऐसे बच्चों को तैयार कर चुके हैं जो बांसुरी में न केवल गानों की धुन बल्कि शास्त्रीय संगीत के सुर भी अच्छे से लगाने लगे हैं। डा. मनीष दिन भर ओपीडी करने के बाद इन बच्चों को बांसुरी के सुर सिखाने नहीं भूलते। वे खुद भी रोजाना डेढ़ से दो घंटे का बांसुरी पर अभ्यास करते हैं।
बच्चों की ऊर्जा सही जगह लगेगी और प्रख्याती भी मिलेगी
डा. मनीष कुकरेजा बताते हैं कि विपरीत परिस्थितियों में फंसे बच्चों को जब उन्होंने देखा तो उन्हें लगा कि इन बच्चों के लिए कुछ करना चाहिए। फिर उन्होंने सोचा कि भगवान श्रीकृष्ण के चक्रधारी रूप काे तो सब जानते हैं और उनकी शक्ति को प्रणाम भी करते हैं लेकिन उनके सबसे सौम्य रूप बांसुरी वादक को बहुत कम लोग देखते हैं। इसके चलते यह निर्णय किया कि भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध के क्षेत्र में गीता के ज्ञान से ही जब शोक अर्जुन में डूबे अर्जुन को महारथी बना दिया तो अगर भगवान श्रीकृष्ण के बांसुरी के संदेश को आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को दिया जाए तो उन्हें भी जीवन एक अच्छे मुकाम पर पहुंचाया जा सकता है। यह साज सीखकर न केवल उनमें एक हुनर होगा बल्कि इस पवित्र वाद्य यंत्र को जीवन में धारण करने से वे खुद भी सही दिशा की ओर अग्रसर होंगे।
मेरा लक्ष्य भगवान श्रीकृष्ण की नगरी से अच्छे बांसुरी के संगीतकार निकालना
डा. मनीष कुकरेजा ने बताया कि उनका व उनके गुरु उस्ताद मुस्तफा हुसैन का एक ही लक्ष्य है कि भगवान श्रीकृष्ण की कर्मनगरी से अच्छे बांसुरी वादक युवाओं को निकालना जाए, ताकि जिस धरती को भगवान श्रीकृष्ण की कर्मनगरी के नाम से जाना जाता है उसे भगवान के मधुर संगीत की धरती के रूप में भी जाना जाए। डा. मनीष कुकरेजा ने बताया कि ऐसे कई बच्चे तैयार हो गए हैं जिन्हें बांसुरी का काफी अच्छा ज्ञान हो गया है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने जिस साज को खुद अपने अधरों से लगाया हो वह पवित्र साज किसी के जीवन को भी बदल सकता है। बशर्ते उसे एक साधना के तौर पर सीखा जाए। यह सबसे मुश्किल साज है क्योंकि इसमें न केवल अपनी सांस से आवाज देनी होती है बल्कि सात सुरों पर उन सांसों को संभालना भी होता है। डीजे की धमक तो सिर्फ पैरों में थिरकन देती है लेकिन बांसुरी सुनकर ही व्यक्ति का तन, मन, मस्तिष्क सब झूमने लगता है। इसी साज से बच्चों के जीवन को एक नई दिशा देने का प्रयास किया जा रहा है।
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