यमुनानगर, जागरण संवाददाता। औद्योगिक इकाइयों से निकल रहा केमिकल युक्त पानी प्रदूषण का बड़ा कारण बनता जा रहा है। हालांकि समाधान के लिए कामन इंफ्यूएंस ट्रीटमेंट प्लांट (सीइटीपी) लगाने की योजना तो बनी, लेकिन अरसा बीत जाने के बावजूद धरातल नहीं मिला। नतीजन सैकड़ों औद्योगिक इकाइयों से निकल रहा केमिकल लोगों की सेहत बिगाड़ने व यमुना को जहरीली करने का काम कर रहा है। साथ ही करोड़ों रुपये की लागत से बने सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट की मशीनरी को भी कमजोर रहा है।

सीवरेज के माध्यम से यह पानी प्लांट तक पहुंच रहा है। जिसमें केमिकल के साथ-साथ विभिन्न धातुओं के बारीक कण प्लांट की मशीनरी के लिए घातक साबित हो रहे हैं। इनके कारण मशीनें कई बार जवाब दे चुकी हैं। जिसको लेकर जन स्वास्थ्य एवं अभियांत्रिकी विभाग की ओर से प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड काे कई बार अवगत भी कराया गया, लेकिन स्थिति ज्यों की त्यों है।

जानकारों के मुताबिक सीवरेज के सामान्य पानी में केमिकल आक्सीजन डिमांड (सीओडी)400-500 एमजी प्रति लीटर होती है, लेकिन केमिकल व विभिन्न धातुओं के कण मिलने से यह कई गुणा अधिक बढ़ जाती है। जिसके चलते पानी को ट्रीट करना मुश्किल हो जाता है। दूसरा, प्लांट की मशीनरी सीवरेज के पानी को ट्रीट करने के आधार पर ही डिजाइन की गई है न कि केमिकल युक्त पानी को ट्रीट करने लिए। जन स्वास्थ्य विभाग के लिए यह समस्या गंभीर बनी हुई है।

यमुनानगर-जगाधरी औद्योगिक नगरी के नाम से विख्यात है। यहां प्लाइवुड उद्योग के साथ-साथ बर्तन उद्योग भी बड़े स्तर पर है, लेकिन ऐसी इकाइयों की संख्या कम नहीं है जिनसे निकलने वाला केमिकल युक्त पानी सीधे नदियों में गिर रहा है। बर्तन नगरी से निकलने वाले केमिकल युक्त पानी के शुद्धिकरण के लिए सरकार द्वारा इंफ्लुएंस ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की योजना बनाई। प्रयास यह था कि सभी इकाइयों से निकलने वाला केमिकल युक्त पानी सीधे ट्रीटमेंट प्लांट में गिरे और शुद्ध होने के बाद ही यमुना में जाकर मिले। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। जहरीला पानी नालियों में बह रहा है। जिससे न केवल क्षेत्रवासियों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है बल्कि भूमि प्रदूषण भी बढ़ रहा है।

बीमारियों का भय

विभिन्न औद्योगिक इकाइयों द्वारा नदियों में केमिकल युक्त पानी छोड़े जाने से भारी धातुएं आर्सेनिक, िजिंक, सीसा, पारा, केडमियम, क्रोमियम-6 आदि निर्धारित मात्रा से 20-30 गुणा अधिक पाई जा रही हैं। ऐसी स्थिति में कैंसर, ब्लड केंसर, लीवर फेल व गुर्दे की बीमारी सहित अन्य कई घातक बीमारियों का भय बना रहता है। क्षेत्र में पीने की पानी की शुद्धता का मानक बिगड़ चुका है।

जीरो डिस्चार्ज पॉलिसी जरूरी

पर्यावरणविद डॉ. अजय गुप्ता के मुताबिक औद्योगिक इकाइयों से केमिकल युक्त पानी सीधे सीवर लाइन में छोड़ा रहा है। इसको रिसाइकिल करना जरूरी है। इसके अलावा सभी इकाइयों में रिसाइकिल प्लांट लगवाए जाएं और जीरो डिस्चार्ज पालिसी को पूरी तरह लागू किया जाए। अन्य देशों में डिस्चार्ज पालिसी को सख्ती से लागू किया हुआ है, लेकिन भारत वर्ष में प्रमुख नदियों के प्रदूषित होने के बावजूद यह पालिसी लागू नहीं की जा रही है। जगाधरी में सीईटीपी का होना जरूरी है। क्योंकि बर्तन बनाने की सैकड़ों फैक्ट्रियां हैं और कई तरह के केमिकल निकलते हैं।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों को विशेष रूप से निर्देश दिए हुए हैं कि औद्योगिक इकाइयों से निकल रहा केमिकल युक्त पानी सीवरेज लाइनों में न डाला जाए। इसको ट्रीट किए जाने की व्यवस्था हो। अधिकारियों को इस ओर ध्यान देना चाहिए। यह मामला एनजीटी के संज्ञान में भी लाया जाएगा।

प्रीतम पाल, चेयरमैन, एनजीटी।

Edited By: Anurag Shukla