जागरण संवाददाता, पानीपत: राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के तहत सिविल अस्पताल के ओपीडी ब्लॉक के प्रथम फ्लोर पर ऑडियोमीटर रूम बनाया जा रहा है। आंगनबाड़ी केंद्रों और विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों, किशोरों और युवकों के कानों की जांच स्कूल हेल्थ टीम करेगी। बहरेपन के लक्षण मिलने पर विद्यार्थी को जांच के लिए अस्पताल के लिए रेफर किया जाएगा। प्रदेश सरकार ने प्रत्येक जिले के सिविल अस्पतालों में ऑडियोमीटर रूम बनाए जाने और ऑडियोलॉजिस्ट की नियुक्ति का निर्णय लिया था। इसी कड़ी में पानीपत के सिविल अस्पताल के ओपीडी ब्लॉक के प्रथम तल पर (ईएनटी ओपीडी के पास) ऑडियोमीटर रूम बनाया जा रहा है। रूम साउंड प्रूफ होगा ताकि मरीज के हिय¨रग पॉवर की ठीक से जांच हो सके। स्कूल हेल्थ की टीम बहरेपन के लक्षणों के शिकार बच्चों को चिन्हित करेगी। उन्हें ईएनटी (कान, नाक, गला) ओपीडी में जांच के लिए भेजा जाएगा। विशेषज्ञ जांच के बाद हिय¨रग पॉवर टेस्ट के लिए रेफर करेंगे। जांच रिपोर्ट के आधार पर ही इलाज और ऑपरेशन की प्रक्रिया शुरू होगी। नए साल से मिलने लगेगी सुविधा आरबीएसके के जिला नोडल अधिकारी एवं डिप्टी सिविल सर्जन डॉ. मुनेष गोयल ने बताया कि ऑडियोमीटर रूम का लाभ अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले बच्चे और व्यस्क मरीज भी ले सकेंगे। ऑडियोलॉजिस्ट की पहले से ही नियुक्ति है, मशीनरी आ चुकी है। जनवरी माह में सुविधा मिलनी शुरू हो जाएगी। हर बीस बच्चे में एक को दिक्कत डॉ. गोयल बताते हैं कि स्कूल हेल्थ टीम जब विद्यालयों में विद्यार्थियों की स्वास्थ्य जांच करती है तो हर बीस में एक बच्चा बहरेपन का शिकार पाया जाता है। जन्मजात बहरापन कम है, कानों में गंदगी, संक्रमण आदि कारण अधिक हैं। ऐसे बच्चों की समय पर हिय¨रग पॉवर जांच कर, उनका इलाज शुरू हो सकेगा। ऐसे पहचानें बच्चे में सुनने की क्षमता हर बच्चे के सुनने की क्षमता की जांच जरूरी है। मशीन की मदद से बच्चे की ब्रेन वेव्स को देखकर ही क्षमता का पता चल जाता है। अगर छह माह तक बच्चा किसी आवाज की ओर ध्यान न दो, दो साल की उम्र तक बोल न पाए तो समझ लेना चाहिए कि उसके सुनने की क्षमता में कमी है। पांच साल की उम्र तक बच्चे के सुनने, समझने और बोलने की क्षमता का पूरा विकास हो जाता है। इसलिए इससे पहले जांच जरूरी है, ताकि ऑपरेशन की नौबत न आए। जन्मजात के अलावा भी कारण उम्र का बढ़ना। जेंटामाइसिन के इंजेक्शन से या बैक्टीरियल इन्फेक्शन। डायबिटीज और हॉर्मोंस का असंतुलन। मे¨नजाइटिस, खसरा रोग। कानों से पस बहना या इन्फेक्शन। कानों की हड्डी में कोई गड़बड़ी। कान के पर्दे का डैमेज हो जाना।