पंचकुला, अनुराग अग्रवाल। राजधानी चंडीगढ़, एसवाईएल नहर निर्माण और अलग हाई कोर्ट के बाद अब हरियाणा और पंजाब अलग विधानसभा भवन बनाने के मुद्दे पर आमने-सामने हैं। अपनी विधायी जरूरतों को पूरा करने के लिए हरियाणा सरकार को मौजूदा विधानसभा भवन काफी छोटा पड़ रहा है। नया विधानसभा भवन बनाने के लिए हरियाणा सरकार ने केंद्रशासित प्रदेश चंडीगढ़ से करीब 10 एकड़ जमीन देने का अनुरोध किया है, जिसे स्वीकार भी कर लिया गया है। इस जमीन पर मालिकाना हक चंडीगढ़ प्रशासन का ही रहेगा। फिलहाल हरियाणा और पंजाब विधानसभाओं के भवन एक ही बिल्डिंग में हैं। दोनों के प्रवेश द्वार एक हैं। पार्किंग एरिया एक है। दोनों राज्यों के विधानसभा सत्र भी लगभग एक ही समान अवधि में होते हैं, जिस कारण मंत्रियों, विधायकों एवं अफसरों के साथ विधानसभा सचिवालय को हर बार दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। विधानसभा के मौजूदा भवन में 60 प्रतिशत हिस्सा पंजाब विधानसभा के पास है और 40 प्रतिशत हिस्से में हरियाणा विधानसभा बनी हुई है।

हरियाणा सरकार ने जब चंडीगढ़ में विधानसभा के नए भवन के निर्माण की प्रक्रिया आरंभ की तो पंजाब के राजनेता ठीक उसी तरह से खुलकर विरोध में उतर जाए, जैसा विरोध वे एसवाईएल नहर निर्माण को लेकर हरियाणा के हक में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का करते हैं। पंजाब के राजनेताओं ने हरियाणा द्वारा बनाए जाने वाले नए विधानसभा भवन के मामले को राजनीतिक चश्मे से देखने का प्रयास किया है। जबकि यह विशुद्ध रूप से विधायी कामकाज के लिए संसाधन जुटाने का मामला है।

विधायी निकायों से जुड़े सचिवालयों का अपना महत्व है। हरियाणा विधानसभा के सदन और सचिवालय के पास उसकी गरिमा के अनुरूप स्थान नहीं है। इसलिए यह विषय लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ विधायिका की गरिमा और कार्यशैली के लिए मूलभूत ढांचे की जरूरत से जुड़ा है। साल 2026 में प्रस्तावित परिसीमन में हरियाणा में विधायकों की संख्या 90 से बढ़कर 126 हो सकती है। विधानसभा के मौजूदा सदन में 90 विधायकों के लिए बैठने का ही स्थान उपलब्ध है। हरियाणा विधानसभा डिजिटलीकरण की तरफ बड़ी तेजी से कदम बढ़ा रही है। अगला विधानसभा सत्र पेपरलैस होने वाला है। विधानसभा का वर्तमान भवन इसके लिए अपर्याप्त है। इन सभी समस्याओं के निदान के लिए चंडीगढ़ में हरियाणा विधानसभा के मौजूदा भवन के अतिरिक्त एक नई बिल्डिंग बनाने की आवश्यकता पड़ी है।

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भी ट्वीट कर नई विधानसभा और नए हाई कोर्ट के लिए चंडीगढ़ प्रशासन से जमीन मांगी है। उनकी इस मांग को भी पंजाब विधानसभा की अपनी जरूरत के परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है, लेकिन इसके बावजूद पंजाब के नेताओं द्वारा हरियाणा को जमीन देने का विरोध करना राजनीतिक दुर्भावना की तरफ ही इशारा कर रहा है। उन्हें यह समझने की जरूरत है कि वर्तमान और भविष्य की जरूरतों के अनुसार नए भवनों का निर्माण कोई परंपरा नहीं, बल्कि अनवरत विकास की सहज प्रक्रिया है।

ऐसा भी नहीं है कि हरियाणा नए विधानभवन की मांग करने वाला देश का अकेला राज्य है। छत्तीसगढ़, झारखंड, तेलंगाना और उत्तराखंड इसके प्रमुख उदाहरण हैं। राजस्थान, गुजरात और हिमाचल प्रदेश ने भी नए विधानभवन बनाए हैं। नई दिल्ली में भी नया संसद भवन बनाया जा रहा है। सभी राज्यों के विधानभवनों में ऐसा प्रविधान है कि सत्र के दौरान मंत्रियों के कार्यालय विधानसभा की इमारत में बनाए जाएं। पंजाब के पास चूंकि पर्याप्त जगह है, इसलिए वह ऐसा करता है, मगर हरियाणा जगह के अभाव में अपने मंत्रियों को बैठने के लिए अलग कमरे नहीं दे पाता। हरियाणा विधानसभा में मुख्यमंत्री के अलावा किसी भी मंत्री या समितियों के चेयरमैनों के लिए भी कार्यालय नहीं है। समय-समय पर राजनीतिक दलों की तरफ से मांग उठाई जाती रही है कि पंजाब विधानसभा की तर्ज पर हरियाणा विधानसभा परिसर में भी सभी पार्टियों के विधायक दलों के लिए स्वतंत्र कार्यालयों का प्रविधान किया जाए, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में हरियाणा के पास स्थान का अभाव होने के कारण यह मांग पूरी नहीं की जा सकती।

चंडीगढ़ दोनों राज्यों की राजधानी जरूर है, इसके बावजूद एक केंद्रशासित प्रदेश के तौर पर वह अपने आप में एक अलग इकाई भी है। भूमि के हस्तांतरण से किसी भी प्रकार से भौगोलिक बदलाव नहीं होते। चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से हरियाणा विधानसभा के लिए आवंटित की जाने वाली 10 एकड़ भूमि चंडीगढ़ का ही हिस्सा रहेगी। ठीक वैसे ही जैसे कि अन्य निजी या सार्वजनिक निकायों को दी जाने वाली भूमि संबंधित प्रदेश के नक्शे से बाहर नहीं जाती। ऐसे में पंजाब का विरोध सिर्फ विरोध के लिए विरोध है और कुछ नहीं।

[राज्य ब्यूरो प्रमुख, हरियाणा]

Edited By: Sanjay Pokhriyal

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