जेएनएन, चंडीगढ़। 'महामारी के लिए माहवारी नहीं रुकती।' इस बात की महत्ता को समझते हुए एनजीओ नन्हे कदम ने लॉकडाउन में ग्रामीण महिलाओं को न केवल सेनेटरी पैड बनाने सिखाए, बल्कि गांव देहात में उनका वितरण भी किया। लॉकडाउन के दौरान गांवों में सेनेटरी पैड नहीं पहुंचने से ग्रामीण महिलाओं और लड़कियों का काफी दिक्कतें आई हैं। शहरों में तो इनका बंदोबस्त हो गया, लेकिन गांवों में लड़कियां इस समस्या से जूझती रही।

सामाजिक संगठन नन्हे कदम की संयोजक पैड वुमन रेणु माथुर ने वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिये गांव देहात की महिलाओं से संपर्क किया। उन्होंने अपने संगठन की कार्यकर्ताओं को इस वीडियो कान्फ्रेंस में जोड़़ा और उनके साथ ही स्वयं सहायता समूह तथा अन्य महिलाओं को साझीदार बनाया। विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस पर रेणु माथुर ने बताया कि पूरे लॉकडाउन के दौरान घर पर ही पुराने कपड़ों से सेनेटरी पैड बनाने की ट्रेनिंग देने का काम चलता रहा, जिसका फायदा महिलाओं को मिला। लॉकडाउन में न तो बाजार खुले और न ही यह जरूरत का सामान गांवों तक पहुंच पाया। बहुत ही महिलाओं ने गंदे कपड़ों का भी इस्तेमाल किया, लेकिन जागरूकता के चलते काफी हद तक समस्या का समाधान खोजने में सफलता मिली है।

पंचकूला निवासी रेणु माथुर ने बताया कि 24 से 26 मई तक आखिरी प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया। इससे पहले करीब एक दर्जन शिविरों के जरिये लड़कियों और महिलाओं को घर पर ही पैड बनाने की ट्रेनिंग दी गई है। ऐसे पैड बनाने की जानकारी दी गई, जिन्हेंं वाश करने के बाद (धोकर) दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, पंजाब और उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों की महिलाएं जुड़ी। उन्हेंं कपड़े के पैड को सिलाई करने के तरीके के बारे में बताया गया।

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Posted By: Kamlesh Bhatt

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