पंचकूला, अनुराग अग्रवाल। पंजाब के मुख्यमंत्री रहते हुए कैप्टन अमरिंदर सिंह जब भी हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल से मिले, तब दोनों के बीच अंतरराज्यीय मसलों पर ही बातचीत होती थी, पर पंजाब के सीएम के तौर पर कप्तानी छोड़ने के बाद इस बार कैप्टन हरियाणा के सीएम से संभावित पंजाब लोक पार्टी के मुखिया के तौर पर मिले हैं। तीनों कृषि कानून वापस हो जाने के बाद कैप्टन की मनोहर से हुई इस मुलाकात के सियासी मायने हैं। पंजाब में चुनाव सिर पर हैं।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि तीनों कृषि कानूनों का विरोध करने वाले आंदोलनकारियों को शुरू से ही कैप्टन अमरिंदर सिंह और भूपेंद्र सिंह हुड्डा का साथ मिलता रहा है। खुद कांग्रेस नेताओं ने माना कि आंदोलन को उनका समर्थन हासिल है, पर जब पंजाब में कैप्टन की रेल कांग्रेस की पटरी से उतर गई तो उन्हें ऐसे इंजन की तलाश हुई, जो उनकी राजनीतिक रेल को फिर से पटरी पर लेकर आ सके। कैप्टन को इस काम के लिए भाजपा से बढ़िया दूसरा कोई दल नजर नहीं आया।

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल (बाएं) और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह चंडीगढ़ में शिष्टाचार मुलाकात के दौरान एक दूसरे का अभिवादन करते हुए। जागरण

पहले भी एक बार कांग्रेस को अलविदा कह चुके कैप्टन जानते हैं कि भविष्य किस राजनीतिक दल का है। पंजाब में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल (बादल) के बीच जिस तरह से दूरियां बढ़ीं, उससे पैदा हुई खाई को पाटने के लिए भाजपा को भी एक मजबूत हाथ की जरूरत थी। इस काम के लिए भाजपा को कैप्टन का हाथ पकड़ना रास आया तो साथ ही कैप्टन को कमल के फूल को मुस्कुराते हुए अपनी जेब पर सजाने के प्रयास करने में कोई परहेज नहीं हुआ। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह एक झटके में बिना किसी माहौल के तीनों कृषि कानून वापस ले लिए, उससे कैप्टन की राह तो आसान हुई ही, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के साथ उत्तराखंड के भाजपा नेताओं को भी बड़ी राहत मिली है। संसद में तीनों बिल वापस हो चुके हैं। अब आंदोलनकारियों के पास कोई बात कहने के लिए नहीं बची है।

कैप्टन अमरिंदर सिंह इन तीनों कृषि कानूनों को वापस कराने में अपनी भूमिका को बढ़ा चढ़ाकर पेश कर रहे हैं। ऐसा करने की इजाजत उन्हें उनकी राजनीति भी देती है, जबकि भाजपा के तमाम नेताओं के पास कहने के लिए यह सब कुछ है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बड़े दिल के साथ किसानों की प्रमुख मांगों को माना है। इसलिए अब आंदोलन का कोई औचित्य नहीं बचता। भाजपा भी यह जानती है कि पंजाब में उसे कैप्टन सरीखे नेता का साथ और हाथ दोनों मिल जाएं तो वह कोई भी बड़ा राजनीतिक फेरबदल कर पाने की स्थिति में होगी। ठीक इसी तरह कैप्टन को भी नजर आ रहा है कि कांग्रेस को सबक सिखाने के लिए यदि उन्हें भाजपा का सहारा लेना पड़े तो इसमें कोई हर्ज नहीं होगा। कैप्टन का यह साथ भाजपा को उत्तर प्रदेश में भी रास आ सकता है।

भाजपा और कैप्टन के बीच यह नजदीकी उस समय ही बढ़ने की उम्मीद हो गई थी, जब कैप्टन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से मिलने दिल्ली पहुंचे थे। अब उनकी हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल से मुलाकात हुई है। हरियाणा और पंजाब दोनों के बीच पुराना रिश्ता है। दोनों राज्यों की राजनीति एक तरह की है। 1966 से पहले हरियाणा संयुक्त पंजाब का हिस्सा हुआ करता था। हरियाणा के करीब एक दर्जन जिले पंजाब की सीमा से लगते हैं और इसी तरह से पंजाब के यही जिले हरियाणा की सीमा में लगते हैं। इनकी आपस की राजनीति एक दूसरे के प्रदेश, जिले और विधानसभा की राजनीति को प्रभावित करती है।

यह कैप्टन भी जानते हैं कि हरियाणा से सटे पंजाब के जिलों में मनोहर कृपा से ही सफलता संभव हो पाएगी। मनोहर लाल ने जिस बड़े दिल के साथ अपने सरकारी आवास पर कैप्टन की आगवानी की, उससे कैप्टन खासे प्रभावित नजर आए। काफी देर तक दोनों के बीच बातचीत होती रही। दोनों ने इस मुलाकात को काफी अच्छा तो बताया, लेकिन खुले तौर पर अभी ऐसा कोई भी बयान देने से परहेज किया, जिसका भविष्य की राजनीति पर किसी तरह का विपरीत असर पड़ता हो। ऐसा करना दोनों की राजनीतिक सेहत के लिए उपयुक्त भी है, लेकिन राजनीति की जानकारी रखने वालों के लिए कैप्टन और मनोहर की यह मुलाकात कोई सामान्य मुलाकात नहीं थी, बल्कि इस मुलाकात में भविष्य की राजनीति के संकेत छिपे हैं, जिनके तार दिल्ली दरबार की राजनीति से जुड़े नजर आ रहे हैं। इस मुलाकात को लेकर अभी तो केवल इतना ही कहा जा सकता है, सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

[स्टेट ब्यूरो चीफ, हरियाणा]

Edited By: Sanjay Pokhriyal