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    आत्मज्ञान सबसे बड़ा ज्ञान है : श्रद्धानंद

    By Edited By:
    Updated: Sun, 28 Jun 2015 04:00 PM (IST)

    सत्संग फोटो 28 पीडब्ल्यूएल-12 में है। कैप्शन: स्वामी श्रद्धानंद संवाद सहयोगी, पलवल : वैदिक विद

    सत्संग

    फोटो 28 पीडब्ल्यूएल-12 में है।

    कैप्शन: स्वामी श्रद्धानंद

    संवाद सहयोगी, पलवल : वैदिक विद्वान स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती ने कहा है कि आत्मज्ञान से बढ़कर कोई सुख नहीं है। आत्मज्ञान सबसे बड़ा ज्ञान है। आत्मज्ञानी यह अनुभव करता है कि समस्त पदार्थों में परमात्मा व्यापक है। वह अंदर भी है और बाहर भी हैं। सर्वत्र परमात्मा के दर्शन करने वाला शोक व मोह से ऊपर उठ जाता है।

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    स्वामी श्रद्धानंद आर्य समाज हाउ¨सग बोर्ड में प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मनुष्य अकेला ही आवागमन के चक्र में फंसता है। अकेला ही पाप पुण्य का फल भोगता है। अकेला ही नाना प्रकार के कष्टों को भोगता है और अच्छे कर्म करने वाला व्यक्ति अकेला ही मोक्ष प्राप्त करता है। माता-पिता, भाई, बंधु, पत्नी आदि कोई भी उसके सुख-दुख को बांट नहीं सकते। मनुष्य को कर्मों का फल अवश्य भोगना ही पड़ता है। परमात्मा की न्याय व्यवस्था में कोई त्रुटि नहीं है। न्याय व्यवस्था में किसी गुरु, पीर, पैगंबर, अवतार की सिफारिश नहीं चलती।

    उन्होंने कहा कि जो आंख से दिखाई नहीं देता, बल्कि जिसकी वजह से आंख देखती है, वही आत्मा है। जो लोग आत्मज्ञान को प्राप्त करने के स्थान पर संसार के विषयों में रम जाते हैं, वे आत्महंता हैं। बिना आत्मा व परमात्मा को जाने जन्म व मृत्यु के बंधन से नहीं मुक्त पा सकता। शरीर की भी सत्ता है और आत्मा की भी सत्ता है। शरीर जड़ है, जबकि आत्मा चेतन तत्व है। आत्मा ही कर्ता है और आत्मा ही भोगता है। उन्होंने कहा कि कर्म, विकर्म और अकर्म को जाने बिना निष्काम कर्म को नहीं जाना जा सकता। कर्म तो हम सब करते हैं, उसमें जान डाल देना विकर्म का काम है। विकर्म का अर्थ है, विशेष कर्म। कर्म के साथ विकर्म जुड़ जाता है तो वह निष्काम कर्म बन जाता है। बिना किसी काम के किया गया कर्म भी निष्काम कर्म है। स्वार्थहित कर्म बंधन का निस्वार्थ भाव से किया गया कर्म मुक्ति का कारण बन जाता है।

    यज्ञ आदि कर्म नित्य कर्म के तहत आते हैं, जो अवश्य करने चाहिए। कुछ कर्म निषेद होते हैं, जो नहीं करने चाहिए। जिनमें मिथ्याचरण, ¨हसा, जुआ, शराब आदि का सेवन करना है। कुछ कर्म कामना विशेष के लिए किए जाते हैं तो कुछ कर्म पर्व आदि के अवसर पर किए जाते हैं। भगवान कृष्ण के अनुसार कर्म की गहन गति होती है। जबकि महर्षि दयानंद सरस्वती ने कहा है कि सब काम धर्मानुसार अर्थात सत्य व असत्य का विचार करके करने चाहिए।