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- कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड ने कुरुक्षेत्र, कैथल और करनाल में तलाशे नए तीर्थ स्थल

-केडीबी का मानना तीर्थ स्थलों का पुराना महत्व है --नंबरगेम---

-134 तीर्थ स्थल अब तक तलाशे जा चुके हैं

-367 तीर्थ स्थलों की 48 कोस कुरुक्षेत्र में मान्यता जगमहेंद्र सरोहा, कुरुक्षेत्र : 48 कोस कुरुक्षेत्र में 27 नए तीर्थ स्थलों की पहचान की गई है। कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड का दावा है कि इन तीर्थ स्थलों का पौराणिक महत्व है। ये तीर्थ स्थल कुरुक्षेत्र, कैथल और करनाल में हैं। स्थानीय लोगों की यहां पुरानी मान्यता है। अब तीर्थ स्थलों की संख्या 134 हो गई है।

कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड 48 कोस कुरुक्षेत्र के अंतर्गत आने वाले कुरुक्षेत्र, करनाल, कैथल, पानीपत और जींद जिलों के प्रमुख तीर्थ स्थलों की देखरेख करता है। केडीबी का मानना है कि इस क्षेत्र में करीब 367 तीर्थ स्थलों को मान्यता है। केडीबी इनमें से अब तक 134 की पहचान कर पाया है। बाकि की पहचान करने के प्रयास चल रहे हैं। 1998-99 के बाद केडीबी ने 50 वर्ष पूरे होने पर जून 2019 में फिर से सर्वे किया था। केडीबी के मानद सचिव मदन मोहन छाबड़ा ने बताया कि इस सर्वे में 48 कोस कुरुक्षेत्र में 27 नए तीर्थ स्थल मिले हैं। बाकी तीर्थों को भी पहचाना जा रहा है। ये हैं प्रमुख तीर्थ स्थल

करनाल के बराश में मनोकामना तीर्थ केडीबी के अनुसार करनाल के बराश गांव में मनोकामना तीर्थ की पहचान की गई है। यह तीर्थ ऊंचाई पर स्थित है। यहां पांच और तीर्थों का जिक्र मिला है। चार अभी लुप्त हैं। मनोकामना तीर्थ में एक कुआं मिला है। जो पुषाण कालीन होने का प्रतीक बता रहा है। करीब दो हजार वर्ष पुरानी ईंटों का निर्माण इसमें मिला है। इसका मामन पुराण में भी जिक्र आता है। इसका निर्माण मध्यकालीन है। ग्रामीणों ने बताया कि यहां साल में दो बार मेला लगता है। वसंत नवरात्र पर मेला विशेष महत्व रखता है। यहां स्वामी जगदीशानंद महाराज की समाधी है। कैथल के जाडौला में जड़ भरत तीर्थ

केडीबी के अनुसार कैथल के गांव जाडौला में जड़ भरत तीर्थ मिला है। यहां मिली मूर्तियां नौवीं और दसवीं शताब्दी की हैं। उस समय का एक पिल्लर भी मिला है। इसका नारद पुराण में जिक्र आता है। यह सूर्यवंशी भरत से जुड़ा तीर्थ है। करीब एक किलोमीटर क्षेत्र में है और इसकी चौड़ाई करीब 250 मीटर में है। यहां घाट बने हुए हैं। बारवा में नरसिंह तीर्थ की मान्यता

कुरुक्षेत्र के बारवा गांव में नरसिंह तीर्थ की पहचान की है। केडीबी के अनुसार इसमें पत्थर की मूर्ति के कुछ हिस्से मिले हैं। माना जा रहा है कि यह मंदिर नौवीं और दसवीं शताब्दी का रहा होगा। यह 48 कोस कुरुक्षेत्र का नरसिंह के नाम का इकलौता मंदिर है। यहां हिरण्यकश्यप की पूजा की जाती है। बैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को नरसिंह जयंती मनाई जाती है। यहां पूजा पाठ के साथ भंडारा लगाया जाता है। दूर-दूर के साधु संत इसमें शामिल होते हैं। यह है 48 कोस कुरुक्षेत्र

यह वह भूमि है। माना जा रहा है कि महाभारत का युद्ध इसी भूमि पर हुआ था। इस समय हरियाणा के पांच जिले आते हैं। इनमें कुरुक्षेत्र, कैथल, करनाल, जींद और पानीपत आते हैं। इसमें नौ नदियों और सात वनों का जिक्र है। चारों कोणों पर चार यज्ञ हैं। उत्तर पूर्व का कोना रन्तुक यज्ञ है। यह पिपली कुरुक्षेत्र में है। उत्तर पश्चिमी कोने में अरन्तुक यज्ञ है। यह कैथल-पटियाला सीमा पर है। तीसरा दक्षिण पश्चिमी है। यह जींद के पौकरी खेड़ी गांव में है। दक्षिण पूर्वी कोने में पानीपत के सींक गांव में है। इसका नाम मचक्रुक यज्ञ है। इन चारों यज्ञों के बीच की जमीन 48 कोस कुरुक्षेत्र है।

Edited By: Jagran

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