समिति जरूरतमंद विद्यार्थियों में जगा रही है शिक्षा की अलख
झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले बच्चे पढ़ने की उम्र में मजदूरी न करें बल्कि उनके हाथ में पुस्तक पेन व पैंसिल हो। इसी ध्येय को लेकर श्री नर नारायण सेवा समिति 700 से अधिक जरूरतमंद विद्यार्थियों में शिक्षा की अलख जगा रही है।
जागरण संवाददाता, कैथल : झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले बच्चे पढ़ने की उम्र में मजदूरी न करें, बल्कि उनके हाथ में पुस्तक, पेन व पैंसिल हो। इसी ध्येय को लेकर श्री नर नारायण सेवा समिति 700 से अधिक जरूरतमंद विद्यार्थियों में शिक्षा की अलख जगा रही है।
इन स्लम बस्तियों में रहने वाले बच्चे स्कूल में जाकर शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकते तो समिति के सदस्यों ने इन्हें उन्हीं के घरों में जाकर पढ़ाने की बीड़ा उठाया। इसके तहत समिति द्वारा इन विद्यार्थियों को निशुल्क ट्यूशन दी जा रही है। वर्तमान में समिति द्वारा जिले में स्थापित 19 बस्तियों में 700 बच्चों को पढ़ाने का कार्य किया जा रहा है।
इस 19 बस्ती में बच्चों में किताबी ज्ञान लाने के लिए 19 ही अध्यापकों को अपने खर्चे पर नियुक्त किया है। जो प्रतिदिन दो घंटे तक इन बच्चों को पढ़ा रहे हैं। समिति की ओर से बच्चों को पढ़ाने की शुरूआत वर्ष 2006 से शुरू की गई थी।
इसका नतीजा यह है कि अब इन बच्चों का दूसरे कार्याें से ध्यान हटकर पढ़ाई में ध्यान ध्यान लग रहा है। इनमें से कुछ बच्चों को स्कूलों में दाखिला करवाया जाता है। इसके चलते बच्चे हरियाणा शिक्षा बोर्ड की कक्षाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन 90 से 95 प्रतिशत से अधिक अंक लाते हैं। इस समिति के कुल 30 सदस्य हैं, जो इस पुण्य के कार्य में लगातार सहयोग कर रहे हैं। इसके साथ ही समिति के अलावा अन्य लोग भी अपनी इच्छा से सहयोग कर रहे हैं।
कूड़ा न बीने बच्चे, इसलिए
ही शुरू किया था अभियान :
समिति के संरक्षक राजेश गर्ग ने बताया कि वह एक केमिस्ट है। वर्ष 2005 में झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले परिवारों को दवाइयां वितरित करने के लिए जाते थे। उस समय अधिकतर परिवारों में बच्चे कम उम्र में ही कूड़ा बीनने और मजदूरी का कार्य करते थे। उस समय वह इस बात से काफी खफा हुए, जिसके बाद उन्होंने समिति के अन्य सदस्यों से इन बच्चों को शिक्षा देने को लेकर चर्चा की तो उन्होंने प्रत्येक बस्ती में बच्चों को एकत्रित कर बच्चों को पढ़ाई करवाने की ठानी।
उस समय उन्हें इन बच्चों के अभिभावकों की ओर से भी इसको लेकर काफी आना-कानी की जाती थी, लेकिन अभिभावकों को समझाया। शुरूआत में कुल 13 स्लम बस्तियों में बच्चों को पढ़ाया जाता था। अब कुल 19 बस्तियों में पढ़ाया जा रहा है।
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