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    किसी का दिल दुखाना है सबसे बड़ा पाप

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    Updated: Thu, 08 Oct 2015 04:25 PM (IST)

    जागरण संवाददाता, झज्जर : भले ही हमें आर्थिक हानि उठानी पड़ जाए, लेकिन अपना वश चलते कोई ऐसा कार्य न कर

    जागरण संवाददाता, झज्जर : भले ही हमें आर्थिक हानि उठानी पड़ जाए, लेकिन अपना वश चलते कोई ऐसा कार्य न करे जिसके कारण किसी अन्य व्यक्ति या प्राणी का दिल दुखे, क्योंकि किसी के दिल से निकली बदुआएं हमें विकट परिस्थितियों में डाल सकती है। ऐसा मानना था अच्छेज गांव निवासी धर्मपाल का। उन्होंने बताया कि उनके पिता धर्मपाल सिंह 24 फरवरी 2010 को परमात्मा को प्यारे हो गए थे। उन्होंने हमें नसीहत दी था कि हमेशा अपना काम ईमानदारी के साथ करें, क्योंकि ईमानदारी से किए हुए काम से मन, मस्तिष्क व आत्मा तीनों को शांति मिलती है। रमेश ने बताया कि उनके पिता अकसर कहते थे कि ईमानदारी की कमाई नेक कमाई होती है यदि कोई इसे हड़पना ही चाहता है तो वह उसे पचा नहीं पाएगा और ठीक इसके विपरित हमारी हड़पी गई नेक कमाई परमात्मा किसी न किसी रूप में हमें दोगुनी करके देंगे। रमेश सोलंकी ने बताया कि उसके पिता बताते थे कि महज 18 माह की अल्पायु में उनकी माता का स्वर्गवास हो गया था। परिजनों ने उसके पालन पोषण के लिए मामा के घर को बढि़या विकल्प चुना और वे वहीं पले बढ़े। जिसके उपरांत 19 साल की आयु में भारतीय सेना में भर्ती उसके पिता धर्मपाल हुए थे। वहां भी देश की सेवा तो प्रमुख लक्ष्य रहा तथा भाईचारे की भावना व परोपकार की नीति सेना के कार्यरत रहने के दौरान अपनाई। सेना से सेवा निवृत होने के उपरांत अपना खानदानी पेशा खेती ही अपनाई और अपने बुजुर्गो से मिले संस्कारों को जीवन भर कायम रखा। एडवोकेट रमेश का मानना है कि श्राद्ध, श्रद्धा भावना व्यक्त करने के लिए पीढ़ी दर पीढ़ी चलते आ रहे है। हमें मिले संस्कारों की पालना के लिए जीवन भर प्रयासरत रहने के साथ ही इन्हें अगली पीढ़ी को सौंपना ही बुजुर्गो के सच्चे श्राद्ध होते हैं।

    -रमेश सोलंकी, एडवोकेट

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