हिसार/नारनौंद, [सुनील मान] महिलाओं के सजने संवरने और मांग में सिंदूर भरने की परंपरा आज से नहीं बल्कि आठ हजार साल पहले से है। आठ हजार वर्ष पुरानी हड़प्पा कालीन सभ्यता में भी महिलाएं ऐसे ही सज संवरकर बाहर निकलती थी। पूरी दुनिया में सबसे पहले मानव होने के प्रमाण भारत में हड़प्पा कालीन की सभ्यता सबसे बड़ी साइट राखीगढ़ी में मिले हैं।

राखीगढ़ी की खोदाई में उजागर हो रहे हड़प्‍पाकालीन सभ्‍यता के बड़े राज

खुदाई के दौरान अनेक चौंकाने वाले तथ्य सामने आ चुके हैं और काफी रहस्यों से परतें खुलना अभी बाकी है। खुदाई के समय महिलाओं के श्रृंगार के लिए प्रयोग की जाने वाली काफी वस्तुएं मिली है। जिनमें पत्थर के मनको की माला, मिट्टी,तांबा व फियांस की चूड़ियां, कंगन, सोने के आभूषण, मिट्टी की माथे की बिंदी, सिंदूर दानी, अंगूठी, कानों की बालियां सहित अनेक ऐसी वस्तुएं मिली हैं। जो साबित करती है कि उस समय भी महिलाएं सज संवरकर रहती थी।

महिलाओं की मांग में सिंदूर डालने की प्रथा भी हजारों वर्ष पुरानी है। उस समय भी महिलाएं मांग में सिंदूर डालती थी। यह डीएनए जांच में भी साबित हो चुका है। खुदाई के दौरान जो कंकाल मिले थे उन कंकालों का डीएनए टेस्‍ट हुआ तो उसमें यह सामने आया है कि महिला के कंकाल से सिंदूर के कुछ साक्ष्य मिले हैं। आज के दौर में भी महिलाएं शादी होने के बाद मांग में सिंदूर डालती हैं।

विज्ञान की तरक्की के कारण आज मिट्टी की चूड़ियों की जगह कांच व अन्य मेटल की चूड़ियों ने ले ली है। उस समय माथे की बिंदी की जगह मिट्टी की बिंदी का प्रयोग किया जाता था। आज वह भी अलग-अलग तरीकों से तैयार हो रही है। मनकों की माला का प्रयोग आज किया जा रहा है। लेकिन कुछ महिलाएं हीरे जवारात की माला भी सज संवरने में प्रयोग करती हैं। खुदाई के दौरान एक भट्ठी भी मिली थी जिससे यह साबित होता है। कि उससे में भी महिलाएं सोने के आभूषणों का प्रयोग करती रही होंगी।

डेक्कन यूनिवर्सिटी पूना के पूर्व वॉइस चांसलर प्रोफेसर वसंत शिंदे ने बताया हड़प्पा कालीन सभ्यता में भी महिलाएं सज संवरकर रहती थी। कंकालों के डीएनए से भी यह साबित हो चुका है कि महिलाएं उस समय भी माथे में सिंदूर लगाती थी।आज कुछ चीजों में बदलाव हुआ है। सतरोल खाप की महिला प्रधान सुदेश चौधरी ने बताया कि हजारों वर्ष पुरानी परंपराएं आज भी हम अपनाए हुए हैं। जो बुजुर्ग हमें विरासत में देकर गए हैं। उन्हीं के पद चिन्हों पर चलकर हम समाज को आगे बढ़ा रहे हैं। मांग में सिंदूर डालना काफी पुरानी परंपरा है।

साइट पर बन रहा भव्‍य म्‍यूजियम

हिसार जिले के राखी गढ़ी गांव में हड़प्पाकालीन सभ्यता ने विश्व को संदेश दिया था कि आर्य भारत के मूल निवासी थे। मानव सभ्यता की शुरुआत भी यहीं से हुई थी। देश के चुनिंदा पर्यटक स्थलों में अब राखी गढ़ी की गिनती की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर के बनने वाले इस म्यूजियम से प्रदेश के राजस्व में भी बढ़ोतरी होगी। इसके साथ ही गांव व आस-पास के क्षेत्र को भी उसी स्तर पर विकसित किया जाना है। इस म्यूजियम में राखी गढ़ी से मिले कंकाल, पुराने समय के आभूषण भी रखे जाएंगे।

साइट का 1963 में पता चला

राखीगढ़ी में करीब 8000 साल की प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले हैं। हड़प्पाकालीन सभ्यता को लेकर यह क्षेत्र अब विश्व में प्रसिद्ध है। खुदाई में मिले नर कंकालों के डीएनए की रिपोर्ट से पता चल चुका है कि आर्य यहीं के मूल निवासी थे। वह बाहर से आकर ङ्क्षहदुस्तान में नहीं बसे थे। शोध के परिणाम आने के बाद केंद्र सरकार का ध्यान इस और गया और इसको विकसित करने का निर्णय लिया। नारनौंद की राखीगढ़ी साइट का 1963 में पता चला था और 1997 में इसकी खुदाई शुरू हुई। इस सभ्यता का पता चलने के बाद टीलों की खुदाई गई। कुछ गांव के हिस्से को भी खाली करवा गया।

राखीगढ़ी एक नजर में

- हड़प्पाकाल की सबसे बड़ी व पुरानी साइट है जोकि 550 हेक्टेयर में फैली हुई है।

- इस साइट पर 9 टिल्ले हैं, जिनमें से तीन टिल्लों की खुदाई हो चुकी है।

- खुदाई के दौरान मकान, सोने के मनके, मिट्टी की चूडिय़ां, मिट्टी के बर्तन, पत्थर के मनके सहित काफी रोचक चीजें निकल चुकी हैं।

- 2015 में टिल्ले नंबर 7 पर हुई खुदाई में मानव नर कंकाल व प्रतीकात्मक कंकाल मिले थे।

- अब सरकार राखीगढ़ी में 25 करोड़ रुपये की लागत से एक म्यूजियम का निर्माण कर रही है जोकि बनकर लगभग तैयार होने वाला है।

- म्यूजियम आधुनिक तरीके से बनाया जा रहा है। इसमें रेस्ट हाउस, हॉस्टल और एक कैफे का निर्माण भी किया जा रहा है।

 

 

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