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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 07, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

अनेकता में एकता की पहचान है भारत

By JagranEdited By:
Published: Thu, 07 Oct 2021 05:11 AM (IST)

अनेकता में एकता की पहचान है भारत। संस्कारशाला के तहत प्रिंसिपल अनीता ने दिया यह मंत्र।

अनेकता में एकता की पहचान है भारत
अनेकता में एकता की पहचान है भारत

संस्कारशाला:::राष्ट्रीय एकता एवं समरसता

फोटो : पांच

अनेकता में एकता की पहचान है। हमारा भारत पूरे विश्व में अपनी एक अलग पहचान रखता है। एकता शब्द स्वयं यह प्रकट करता है कि भारत में जाति, रंग, रूप, वेशभूषा अलग होने के बावजूद भी यह एक सूत्र में बंधा है। जिस प्रकार अनेक वाद्य यंत्र मिलकर संगीत की एक लय, एक गति एक लक्ष्य और एक भाव बना देते हैं और मनमोहक संगीत का जन्म होता है। भारत में भी विभिन्न जातियां, धर्म, भाषाएं, बोलियां एवं वेशभूषा हैं, फिर भी हम सब एक हैं। भारत की एकता आज से नहीं बल्कि प्राचीनकाल से प्रसिद्ध है। समय-समय पर विभिन्न ताकतों ने इस एकता को खंडित करने के प्रयास किए हैं, परंतु उन्हें भी हमारी एकता के सामने शीश झुकाकर नमन करना पड़ा। मनुष्य समाज का एक भावनात्मक प्राणी है और अंतर्मन की भावनाओं के कारण ही वह समाज के अन्य प्राणियों से जुड़ा होता है। प्राय: किसी जाति, समुदाय व राष्ट्र के व्यक्तियों के बीच जब भावात्मक एकता समाप्त होने लगती है तो सामाजिक अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है और सारे बंधन शिथिल पड़ने लगते हैं। जिस प्रकार एक परिवार एकता के अभाव में बिखर जाता है, उसी प्रकार सामाजिक एकता व समरसता के बिना धरा निष्प्राण सी दिखती है। सामाजिक एकता समरसता पूर्ण सृष्टि का एक मजबूत स्तंभ है। आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा औी बेरोजगारी है। देश की प्रगति के लिए हम सबको मिलकर इन चुनौतियों का समाधान करना चाहिए। परन्तु कुछ असामाजिक तत्व छोटी-छोटी बातों को लेकर आपसी भाई-चारे में दरार डालने का काम करते हैं। इन लोगों के मनसूबों को जानकर हमें उनका सामाजिक बहिष्कार करना चाहिए और समरसता को बनाए रखना चाहिए। हमारी पुरातन संस्कृति में कभी भी किसी के साथ किसी भी तरह के भेदभाव को स्वीकार नहीं किया गया। हमारे वेदों में भी जाति व वर्ण के आधार पर किसी प्रकार के भेद-भाव का वर्णन नहीं दिखाई पड़ता। परंतु समाज के कुछ तुच्छ प्राणियों की मिथ्या बातों के कारण ही समरसता फीकी पड़ने लगी है। हमें विशेषकर युवाओं को दिग्भ्रमित होने से बचाना चाहिए और उनमें इस प्रकार के संस्कार विकसित करने चाहिए जिससे सामाजिक एकता व समरसता का माहौल कायम रहे। हम सबको मिलकर सामाजिक एकता, जुटता व समरसता का संकल्प लेना चाहिए ताकि फिर से हमारा बिखरता समाज एक ही माला में गुंथकर समरसता की अनूठी मिसाल बन जाए।

-अनीता भंडारी, प्रिसिपल, द आर्यन स्कूल