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    Commonwealth Games 2022: बजरंग और दीपक पूनिया से गोल्ड की उम्मीद, इस अखाड़े में किया अभ्यास

    By Rajesh KumarEdited By:
    Updated: Sat, 30 Jul 2022 03:29 PM (IST)

    Commonwealth Games 2022 कामनवेल्थ गेम्स में बजरंग और दीपक पूनिया से गोल्ड की उम्मीद है। बजरंग और दीपक पूनिया ने एक ही अखाड़े से पहलवानी के दांव पेंच सीखें हैं। ये दोनों ही पहलवान झज्जर के गांव छारा में स्थित लाला दीवानचंद अखाड़े से निकले हैं।

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    बजरंग और दीपक पूनिया कोच वीरेंद्र के साथ।

    बहादुरगढ़, जागरण संवाददाता। कामनवेल्थ खेलों में इस बार झज्जर के पहलवान बजरंग पूनिया और दीपक पूनिया पर नजर है। दोनों के पहले कोच आर्य वीरेंद्र दलाल को पूरा यकीन है कि उनके शिष्य स्वर्ण पदक लेकर आएंगे। दोनों के कुश्ती मुकाबले चार अगस्त को होने हैं। खास बात यह है कि ये दोनों ही पहलवान झज्जर के गांव छारा में स्थित लाला दीवानचंद अखाड़े से निकले हैं। इसी अखाड़े ने ये दोनों पहलवान तराशे हैं। यहां अभ्यास में ही दोनों का बचपन बीता है। 

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    खेत के एक कोने से शुरू हुई थी व्यायामशाला, देश को दिए नामी पहलवान

    इस अखाड़े ने देश-प्रदेश काे कई नामी पहलवान दिए हैं। बजरंग और दीपक को तो आज पूरी दुनिया जानती है। कुछ साल पहले तक जब दोनों झज्जर के इस अखाड़े के बाल पहलवानों में शामिल थे, तब शायद किसी को यह भान न था कि दोनों एक साथ देश का प्रतिनिधित्व करेंगे। बजरंग पूनिया तो झज्जर के गांव खुड्डन से है, जबकि दीपक पूनिया का गांव छारा ही है। दीपक का परिवार गांव में ही रहता है।

    बजरंग का परिवार फिलहाल सोनीपत में है। छारा में दाव-पेंच सीखने के बाद इन दोनों ने दिल्ली का रुख किया, लेकिन आज भी जब दोनों की उपलब्धियों काे गिना जाता है तो उसकी शुरुआत छारा के इसी अखाड़े से होती है। छारा के इस अखाड़े की शुरुआत खेत के कोने में छोटी सी व्यायामशाला से हुई थी। वर्ष 1995 में कोच आर्य वीरेंद्र दलाल ने यह अखाड़ा शुरू किया था। बाद में उनकी लगन और गांव से खिलाड़ियों की प्रतिभाओं को देखते हुई यह छोटी सी कोशिश सफल होने लगी।

    1997 में लाला दीवान चंद कुश्ती एवं योगा केंद्र के नाम से संस्था रजिस्टर करवाई गई। उसी की देखरेख में यहां पर अखाड़ा शुरू हुआ। वर्ष 2003 में भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) ने इस अखाड़े के परिणामों को देखकर इसे गोद ले लिया। 2004 में सबसे पहले भारतीय खेल प्राधिकरण ने आठ से 12 वर्ष के पहलवानों का यहां पर चयन किया और द्रोणाचार्य अवार्डी कोच ओमप्रकाश दहिया को यहां पर पहलवानों को गुर सिखाने के लिए तैनात किया।

    2010 तक भारतीय खेल प्राधिकरण में किया अभ्यास

    वर्ष 2004 में ही यहां के पहलवान बजरंग पूनिया को भी भारतीय खेल प्राधिकरण ने गोद लिया था। यहां पर वर्ष 2010 तक अभ्यास किया। जबकि 2005 में दीपक पूनिया ने अखाड़े में प्रवेश पा लिया। वर्ष 2007 में दीपक को साई ने गोद लिया था। एक दशक तक दीपक ने यहां पर अभ्यास किया। यहीं से इन दोनों की कामयाबी की राह बनी। इसके बाद अनेकों राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहलवान यहां से निकलते रहे। दोनों पहलवानों के पहले कोच रहे आर्य वीरेंद्र कहते हैं कि सरकार सुविधाएं बढ़ाएं तो और भी प्रतिभाएं निकल सकती हैं। उम्मीद है कि दोनों पहलवान देश के लिए स्वर्ण पदक जीतेंगे।