चार बहनों में किसी के भात में नहीं गए बंसीलाल, कहा था भानजा पढ़ेगा तो ही मिलेगी नौकरी
पूर्व सीएम चौंधरी बंसीलाल के छोटी बहन शांति देवी ने साझा की अतीत की यादें कहा भाई ने सबके विकास के बारे में सोचा केवल परिवार के बारे में नहीं। परिवार के लिए भी एक समान नजरिया था
ढिगावा मंडी [मदन श्योराण] चौधरी बंसीलाल 8 बहन भाइयों में सबसे बड़े थे। छठे नंबर पर शांति देवी गांव खरखड़ी में रहती हैं। उन्होंने बताया कि चौधरी बंसीलाल की 15 वर्ष के दौरान शादी हो गई थी। बंसीलाल के शादी के समय शांति देवी महज 13 महीने की ही थी बंसीलाल कभी पैंट शर्ट नहीं पहनते थे वह हमेशा कुर्ते पायजामे को ही प्राथमिकता देते थे। जब वह छोटे थे तब कढावनी के अंदर से मलाई वाला दूध पीते थे।
चौधरी बंसीलाल के परिवार का कोई भी सदस्य बंसीलाल के सामने ज्यादा नहीं बोलता था। वह जो कहते थे वह फाइनल होता था। शांतिदेवी ने कहा कि उसकी शादी करीब 60 साल पहले गांव खरकड़ी में हुई थी। मेरे से पहले मेरी दो बहन उनकी भी शादी मेरे यहां परिवार में हुई थी। तारा देवी की शादी मेरे से 20 साल पहले मेरे जेठ प्यारेलाल के साथ हुई थी। बाद में कलावती की 10 साल बाद यानी कि मेरे से 10 साल पहले हुई थी। बाद में मेरी दोनों बहनों के देवर से मेरी शादी हुई थी।
मेरे पिता मोहर सिंह की लोहारू में अनाज की दुकान थी। उसी समय गांव खरखड़ी निवासी छल्लू राम से मुलाकात हुई। छल्लूराम नवाब के नजदीकी हुआ करते थे और गांव के नंबरदार भी थे। नवाब के नजदीकी होने के कारण क्षेत्र में खूब जान पहचान थी और लोग इज्जत और मान सम्मान करते थे।
उसके बाद मेरे पिता मेहर सिंह ने पहले अपनी एक लड़की तारा देवी की शादी छल्लू राम के लड़के के साथ की थी और उसके बाद दूसरी लड़की की शादी की थी समय बीतता गया उसके बाद करीब 20 साल बाद मेरी शादी की गई। मेरी बहन तारा देवी की शादी के बाद बंशीलाल गांव खरखड़ी में आते जाते थे और कई कई दिनों तक यहां रहते थे। ऊंट की सवारी भी खूब करते थे। चौधरी बंसीलाल को खरकड़ी के महाराज बाबा गुलाब गिरी महाराज से काफी लगाव था और उन्हें आदर्श मानते थे।
बाद में चौधरी बंसीलाल जालंधर में वकालत का कोर्स करने चले गए। उसके बाद वो भिवानी रहने लगे मेरी शादी के बाद मुंशीलाल कभी कभार गांव खरकड़ी में आते थे। मंत्री और मुख्यमंत्री बनने के बाद गांव खरकड़ी में वह कभी भी नहीं आए।
ऊंट पर गई थी बरात
चौधरी बंसीलाल दूध और घी के खाने के शौकीन थे। सायं 3-4 बजे गांव में गाय और भैंस के दूध को गर्म करने के लिए हारे (चूल्हे ) में रखा जाता है। करीब चार-पांच घंटे में दूध पर मोटी मलाई आ जाती है। उस मलाई को खाने के बड़े शौकीन थे। शांति देवी ने बताया कि चौधरी बंसीलाल खेलों में इतना ध्यान नहीं देते थे लेकिन बचपन में ऊंटों की दौड़ बहुत करवाया करते थे। चौधरी बंसीलाल की शादी में भी ऊंट पर बरात गई थी और बारात वापस 3 दिन में पहुंची थी। बारात में जाने वाले सभी बाराती अपना खाना साथ लेकर गए थे।
4 बहनों में से किसी भी बहन के भात में शामिल नहीं हो सके
शांति देवी ने आगे बताया कि वैसे भी चौधरी बंसीलाल शादी के बाद अपने भाई बहनों से कम ही बातें किया करते थे। एक बार 1996 में मैं अपने लड़के के लिए बंसीलाल से भिवानी में मिली। मैंने कहा कि मेरे एक लड़के को नौकरी लगवा दो तो चौधरी बंसीलाल ने सीधे शब्दों में कह दिया था की पढ़ेगा तो अपने आप लग जाएगा मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा। उसके बाद कोई भी बहन या भाई चौधरी बंसीलाल से अपने काम के लिए नहीं मिले। वैसे राजी खुशी समय-समय पर चौधरी बंसीलाल से भिवानी में मुलाकात होती रहती थी। दीपावली के त्यौहार पर चौधरी बंसीलाल अपनी माता से मुलाकात करने गांव गोलागढ़ जाते थे और बाद में भिवानी पहुंचते थे।
पुरानी यादों को याद का बहन के छलक पड़े आंसू
पुरानी यादों को याद करते हुए शांति देवी के आंखों में आंसू छलक पड़े। खेतों की तरफ इशारा करते हुए कहा कि चौधरी बंसीलाल हमेशा 20 -30 साल आगे की सोचते थे। उन्होंने चाय की तरफ इशारा करते हुए कहा बेटा आप तो चाय पीजिए। आंसू पूछते हुए कहा बेटा यह देख गेहूं की बोरी कैसे पड़ी हैं, खेतों में कपास को देखो, पीने के पानी को देखो, ऊपर चल रहा पंखा देखो यह मेरे भाई की देन है। यह कहते ही उनकी आंखों में एक बार फिर आंसू आ गए। आंसू पोंछते हुए बताया कि पूरे हरियाणा के लिए खूब काम किया लेकिन अपने भाई बहनों के लिए कुछ नहीं किया। चौधरी बंसीलाल पूरे हरियाणा को अपना परिवार मानते थे और पूरे हरियाणा का विकास करवाना उनके अपने परिवार का विकास करवाना की सोचते थे।
रात को जब हम सोकर उठते थे उस समय भी चौधरी बंसीलाल बड़ी-बड़ी किताबों को पढ़ते हुए मिला करते थे। चौधरी बंसीलाल का स्वभाव अडिय़ल रहा, लेकिन मेरे पिताजी मोहर सिंह के सामने वह हमेशा निर्मलता से पेश आते थे मेरे पिताजी उनको जो काम कहते थे वह वह काम कर देते थे।वह चौधरी सुरेंद्र सिंह के हादसे के बाद बार-बार यहीं कहते थे कि अब ज्यादा नहीं जी पाऊंगा मैं सुरेंद्र के पास जाना चाहता हूं।
चौधरी बंसीलाल के देहांत से 6 दिन पहले ही मिली थी वह काफी निराश लग रहे थे। चौधरी बंसीलाल से मिलने के लिए मैं उनके कमरे में पहुंची तो उन्होंने पूछा शांति बताओ तुम किस काम के लिए आई हो। तुम्हें जो काम करवाना है वह बता दो अब ज्यादा समय नहीं बचा है। चौधरी बंसीलाल पूरे हरियाणा को अपना परिवार मानकर कार्य करवाते थे और सम्मान विकास चौधरी बंसीलाल ने ही करवाया था उसके बाद तो सब क्षेत्रवाद हावी हो गया।
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