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    दुश्‍मन देशों से रक्षा के लिए रोहतक में 1942 में बनना था एयरबेस, आज तक सिरे नहीं चढ़ी योजना

    By Umesh KdhyaniEdited By:
    Updated: Tue, 08 Jun 2021 03:31 PM (IST)

    अंग्रेजों के शासनकाल में एयरबेस के लिए रोहतक जिले को चुना गया था। क्योंकि यहां से अंबाला दूर था। द्वितीय विश्व युद्ध 1939 से 1945 तक हुआ था। 1942 में यहां एयरबेस बनाने की योजना बनी। लेकिन तकनीकी कारणों से अब तक सिरे नहीं चढ़ पाई।

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    22 जून 1942 को गोपनीय पत्र लिखा गया था। उस समय सोनीपत जिला रोहतक का हिस्सा था।

    रोहतक [अरुण शर्मा]। जून माह रोहतक के लिए इतिहास के लिए खास है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दुश्मन देशों से मुकाबला करने के लिए रोहतक में एयरबेस को विकसित करने के लिए भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई शुरू हुई थी। 1942 में ही एयरबेस को विकसित करने के लिए एक पत्र भी लिखा गया। उस समय ब्रिटिश हुकूमत थी। बाद में तकनीकी कारणों के चलते यह योजना सिरे नहीं चढ़ सकी थी।

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    राजस्व विभाग के अलावा कुछ अन्य विभागों में इस संबंध में दस्तावेज मौजूद हैं। 22 जून 1942 को गोहाना(सोनीपत) तहसीलदार की तरफ से कानूनगो सर्कल को एक गोपनीय पत्र लिखा था। संबंधित पत्र में रोहतक में एयरबेस के निर्माण के लिए जमीन चिह्नित करने का जिक्र है। उस समय सोनीपत जिला रोहतक का ही हिस्सा था। तत्कालीन गोहाना तहसीलदार ने गोहाना, बरोदा और मुडलाना में जमीन चिह्नित करने को कहा था। पत्र में जरूरत के हिसाब से जमीन के क्षेत्रफल तक का जिक्र किया था। गोहाना में 10 गुणा 10, बरोदा में तीन गुणा तीन मील और मुडलाना में डेढ़ गुणा डेढ़ मील के दायरे में जमीन तलाशने तक का पत्र में जिक्र है।

    महम में दिल्ली-मुल्तान रोड पर पर्याप्त जमीन होने का जिक्र

    अंग्रेजों के शासनकाल में एयरबेस के लिए रोहतक जिले को इसलिए चुना गया है कि यहां से अंबाला दूर था। द्वितीय विश्व युद्ध 1939 से 1945 तक हुआ था। ब्रिटिश नियंत्रण के अधीन धुरी शक्तियों ने दुश्मन देशों के खिलाफ युद्ध लड़ा। आर्थिक मदद भी की गई थी। 1942 में लिखे पत्र के मुताबिक, कानूनगो सर्कल ने महम में 10 गुणा 10 मील के दायरे में जमीन उपलब्ध न होने का जिक्र किया है। हालांकि इसी पत्र में यह भी कहा गया है कि महम में ही दिल्ली-मुल्तान रोड पर एयरबेस के उपयोगी जमीन उपलब्ध है। इसके बाद भी इस प्रकरण में पत्राचार हुए। ज्यादा समय लगने के कारण योजना सिरे नहीं चढ़ सकी।

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