मतभेद से राकेश टिकैत और गुरनाम चढूनी की भूमिका पर सवाल करने लगे आंदोलनकारी, बोले- क्या तय करेंगे दिशा
किसानों ने कहा हरियाणा संयुक्त किसान मोर्चा के प्रत्येक सदस्य का सम्मान और सहयोग करेंगे। साथ ही बारी-बारी इस मोर्चे में अपना प्रतिनिधित्व करेंगे। यही हरियाणा संयुक्त किसान मोर्चा की विचारधारा है। जिस किसी भी सदस्य को इस विचारधारा से हटकर चलने की इच्छा है वह अलग हो सकता है।

हिसार/बहादुरगढ़, जेएनएन। जेजेपी विधायक देवेंद्र बबली और किसानों के बीच हुई झड़प के टोहाना प्रकरण के बाद राकेश टिकैत और गुरनाम चढूनी की भूमिका को लेकर आंदोलनकारी अब सवाल करने लगे हैं। आवाज उठने लगी है कि क्या दो लोग ही इस आंदोलन की दिशा तय करेंगे। बहादुरगढ़ में टीकरी बॉर्डर पर मोर्चा डाले बैठे न्यूनतम समर्थन मूल्य संघर्ष समिति के अध्यक्ष प्रदीप धनखड़ व अन्य का कहना है कि न तो हम किसी भी संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य के विरोधी हैं और न ही हम किसी नेता के समर्थक हैं।
हम सिर्फ हरियाणा संयुक्त किसान मोर्चा के प्रत्येक सदस्य का सम्मान और सहयोग करेंगे। साथ ही बारी-बारी इस मोर्चे में अपना प्रतिनिधित्व करेंगे। यही हरियाणा संयुक्त किसान मोर्चा की विचारधारा है। जिस किसी भी सदस्य को इस विचारधारा से हटकर चलने की इच्छा हो तो वह हरियाणा संयुक्त किसान मोर्चा से अलग हो सकता है। धनखड़ ने कहा कि राकेश टिकैत और गुरनाम चढूनी की जिस तरह से भूमिका सामने आ रही है उसमें सवाल यही उठ रहा है कि क्या इन दो लोगों को ही किसान आंदोलन की दिशा तय करने का अधिकार है।
बाकी एसकेएम हरियाणा कहां है। टोहाना प्रकरण में जिस तरह से एक नेता द्वारा सक्रिय आंदोलनकारियों को अपना कहने से मना किया गया ताे कल को ये उन्हें पहचानने से भी इंकार कर देंगे। यदि आंदोलनकारी नहीं जागे तो गुरनाम चढूनी और राकेश टिकैत की यह लड़ाई आंदोलन को खा जाएगी।
पहले भी सामने आ चुकी है अलग-अलग विचारधारा
राकेश टिकैत और गुरनाम चढूनी की अलग-अलग विचारधारा पहले भी सामने आ चुकी है। विगत में जब बहादुरगढ़ में ये दोनों नेता एक मंच पर आए तब इनकी अलग-अलग राय सामने आई थी। राकेश टिकैत तो उस समय तक यह कहते रहे कि आंदोलन सर्दियों तक चलेगा, जबकि गुरनाम चढूनी इसे उनकी निजी राय बताते रहे थे। अब गुरनाम चढूनी के टोहाना प्रकरण से जुड़े बयान पर उसी अंदाज में राकेश टिकैत उनकी सोच अलग होने की बात कह चुके हैं।
ऐसे समझें पूरा प्रकरण
राकेश टिकैत को मुख्त तौर पर किसान नेता माना जाता है और वे उत्तर प्रदेश से हैं। मगर तीन कृषि कानूनों के विरोध में चल रहा आंदोलन हरियाणा में सक्रिय है। ऐसे में गुरनाम चढूनी ने बयान दिया कि अगर यूपी के किसान भी साथ दें तो इस लड़ाई को आसानी से जीता जा सकता है। इस बयान के बाद कई तरह के कयास लगाए गए। वहीं जब यूपी के सीएम योगी नोएडा स्थित काेविड अस्पताल में आए तो राकेश टिकैत ने कहा कि वे स्वास्थ्य सेवा से जुड़े कार्यक्रम में आ रहे हैं इसलिए विरोध नहीं होगा। वहीं जब हरियाणा के हिसार में सीएम मनोहर लाल कोविड अस्पताल का शुभारंभ करने के लिए आए तो यहां जमकर उपद्रव हुआ और राकेश टिकैत उसी दिन कई जिलों में पहुंचे और आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज के विरोध में रोड जाम कर दिए गए। इस घटना के बाद भी कई तरह के सवाल उठे थे।
देवेंद्र बबली और आंदोलनकारी प्रकरण में राकेश टिकैत और गुरनाम में ऐसे दिखा मतभेद
कोरोना वैक्सीनेशन कार्यक्रम में पहुंचे टोहाना से जननायक जनता दल पार्टी (जजपा) के विधायक देवेंद्र बबली पहुंचे तो बीजेपी गठबंधन होने से खफा आंदोलनकारियों ने उनका रास्ता रोक लिया। इस पर विधायक तिलमिला गए और आंदोलनकारियों को अपशब्द कह डाले। इसके बाद आंदोलनकारी भी उग्र हो गए और विधायक की लग्जरी गाड़ी के शीशे पर लठ से वार कर दिया।
शीशा टूट गया और विधायक के निजी सचिव की गर्दन में गहरी चोटें आईं। इस पर कई आंदोलनकारियों को हिरासत में ले लिया गया। इसकी पूरे प्रकरण की वीडियो भी वायरल हो गई। बुधवार को जब आंदोलनकारियों की रिहाई की मांग को लेकर टोहाना में आंदोलनकारी जुटे तो गुरनाम चढूनी भी पहुंचे।
प्रशासन ने उनसे 7 जून तक का समय मांगा ताकि विधायक से बात हो सके। आंदोलनकारी विधायक के माफी मांगने पर अड़े थे और मामला दर्ज मांग करने की भी बात कही। चढूनी ने जब इस बात को आंदोलनकारियों के बीच रखा तो आंदोलनकारियों ने समय देने की मांग को ठुकरा दिया। इस पर चढूनी ने कहा कि हमें लठ चलाने का आदेश नहीं है, कोई ऐसा करता है तो हमारा उससे कोई लेना देना नहीं। इस पर आंदोलनकारी बिफर गए। यह वीडियो भी वायरल हो गया।
वहीं जब इस प्रकरण पर राकेश टिकैत से पूछा तो उन्होंने कहा कि आंदोलनकारियों को लेकर दिए गए बयान गुरनाम चढूनी के निजी विचार हो सकते हैं, हमें उससे कोई सरोकार नहीं है। अगल-अलग बयानों को लेकर अब आंदोलनकारी असमंजस में हैं। वहीं अब आंदोलन में हिंसा बढ़ने के आसार भी ज्यादा हो रहे हैं क्योंकि शीर्ष नेताओं की बात को अनसुना किया जा रहा है।
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