गुरुग्राम-सोहना हाईवे पर सातवीं बार धंसी सड़क, करोड़ों खर्च फिर भी नहीं समाधान
गुरुग्राम-सोहना हाईवे पर सातवीं बार सड़क धंसने से NHAI और GMDA की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं। तीन करोड़ रुपये ...और पढ़ें

गुरुग्राम-सोहना हाईवे पर सातवीं बार धंसी सड़क ( एआई जेनरेटेड इमेज )
HighLights
सातवीं बार धंसा गुरुग्राम-सोहना हाईवे, कार्यप्रणाली पर सवाल।
तीन करोड़ से अधिक खर्च, स्थायी समाधान अभी भी नहीं।
सीवर लाइन शिफ्टिंग ही एकमात्र स्थायी उपाय बताया गया।
जागरण संवाददाता, गुरुग्राम। गुरुग्राम-सोहना हाईवे पर सोहना चौक के नजदीक सोमवार को सातवीं बार सड़क धंसने से एनएचएआइ और जीएमडीए की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है।
गड्ढा बनने के बाद बैरिकेडिंग कर एक लेन में यातायात बंद कर दिया गया है। इससे चौक के नजदीक हाईवे पर यातायात व्यवस्था प्रभावित हो रही है। हैरानी की बात यह है कि छह बार गड्ढे की मरम्मत के नाम पर तीन करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका।
चल रही है स्थायी समाधान की बात
अब सातवीं बार गड्ढा बनने के बाद अधिकारी स्थायी समाधान की बात कर रहे हैं। इसके लिए दो करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने का अनुमान है।
इस बार हाईवे के नीचे से गुजर रही लगभग 120 मीटर सीवर लाइन को पूरी तरह हटाकर सर्विस लेन पर शिफ्ट किया जाएगा। एनएचएआई के परियोजना निदेशक योगेश तिलक का दावा है कि सीवर लाइन को शिफ्ट करना ही समस्या का स्थायी समाधान है।
आखिर क्यों नहीं किया गया समाधान
सवाल यह है कि जब सीवर लाइन ही समस्या की जड़ थी, तो पिछली छह बार की मरम्मत में इसका समाधान क्यों नहीं किया गया? क्या हर बार केवल गड्ढा भरकर सड़क चालू करना ही अधिकारियों की जिम्मेदारी थी?
पिछली बार जब हाईवे पर गड्ढा बना था, उस समय भी जीएमडीए के सीईओ पीसी मीणा और एनएचएआइ के परियोजना निदेशक योगेश तिलक ही थे। उस समय भी एनएचएआइ की ओर से स्थायी समाधान का दावा किया गया था।
इसके बावजूद तीन महीने के भीतर फिर गड्ढा बन गया। जब एनएचएआई के परियोजना निदेशक योगेश तिलक से पूछा गया कि पिछली बार ही 120 मीटर सीवर लाइन को शिफ्ट क्यों नहीं किया गया तो उनके पास कोई जवाब नहीं था।
एक-दो बार किसी तकनीकी कारण से अस्थायी मरम्मत की नौबत समझी जा सकती है, लेकिन छह बार मरम्मत के बाद भी समस्या का समाधान नहीं होना गंभीर लापरवाही की ओर इशारा करता है।
छह बार में तीन करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने के बाद अब दो करोड़ रुपये से अधिक खर्च करने की तैयारी है।
यदि गड्ढे में गिर जाता वाहन तो कौन होता जिम्मेदार?
सातवीं बार सड़क धंसने से एक बड़ा सवाल यह भी खड़ा हो गया है कि यदि अचानक बने गड्ढे में कोई तेज रफ्तार वाहन गिर जाता और जान-माल का नुकसान होता तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेता?
बैरिकेडिंग लगाकर एक लेन बंद करना तत्काल सुरक्षा उपाय हो सकता है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। सेक्टर-40 निवासी रमेश कुमार और नवीन वर्मा का कहना है कि जब तक जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक सड़क धंसने की घटनाएं रुकने वाली नहीं हैं। छह बार मरम्मत के बावजूद समस्या बनी रही।
जिन अधिकारियों के कार्यकाल में हाईवे का निर्माण हुआ था, उनकी पहचान कर कार्रवाई होनी चाहिए। इसके अलावा अब तक मरम्मत कार्य में लापरवाही बरतने वाले सभी अधिकारियों की पहचान की जाए। ऐसे सभी जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई करते हुए आपराधिक मुकदमा दर्ज होना चाहिए। अब तक अस्थायी समाधान के नाम पर जितनी राशि खर्च हुई, उनकी वसूली सभी जिम्मेदार अधिकारियों से की जाए। -- जेएस सुहाग, पूर्व तकनीकी सलाहकार, एनएचएआई
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