110 रुपये किराए वाली दुकानों की कीमत अब करोड़ों में; गुरुग्राम के 5 SCO पर कोर्ट का बड़ा फैसला, HSVP पर उठे सवाल
बादशाहपुर के सेक्टर-चार हुड्डा मार्केट की पांच एससीओ के विवाद में अदालत ने दुकानदारों की अपील खारिज कर दी है।

HighLights
बादशाहपुर की 5 एससीओ पर अदालत का महत्वपूर्ण फैसला।
दुकानदारों की वैध दस्तावेज न होने पर अपील खारिज।
एचएसवीपी की निगरानी और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न।
महावीर यादव, बादशाहपुर। गुरुग्राम सेक्टर-चार हुड्डा मार्केट की करोड़ों रुपये की पांच एससीओ (शॉप-कम-आफिस) का विवाद हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
जिन दुकानों का किराया कभी महज 110 रुपये महीना बताया जा रहा है, उनका मौजूदा मासिक किराया करीब 50 से 60 हजार रुपये तक पहुंच चुका है। ऐसे में सवाल सिर्फ दुकानों के मालिकाना हक का नहीं, बल्कि उस सरकारी व्यवस्था का भी है, जिसकी निगरानी में दशकों तक यह स्थिति बनी रही।
अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत ने दुकानदारों की अपील खारिज कर दी। दुकानदारों की ओर से दावा किया गया था कि वे 1980-90 के दशक से दुकानों पर काबिज हैं और किराया देते रहे हैं।
'दुकानदार नहीं दे सके वैध दस्तावेज'
दूसरी ओर, एचएसवीपी ने दलील दी कि दुकानदार वैध आवंटन पत्र, लीज या हस्तांतरण से जुड़े पर्याप्त दस्तावेज पेश नहीं कर सके। अदालत ने भी माना कि केवल किराया जमा करने की रसीदें वैध किरायेदारी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। यहीं से प्राधिकरण की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठता है।
यदि आवंटन और लीज से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे, तो किराया किस आधार पर स्वीकार किया जाता रहा? क्या अधिकारियों ने कभी मूल आवंटन रिकार्ड खंगाला? क्या समय-समय पर दुकानों की स्थिति और किराये की समीक्षा की गई? इन सवालों का जवाब प्राधिकरण को अपने रिकार्ड के आधार पर देना चाहिए।
सरकारी संपत्ति की कीमत बढ़ी, जवाबदेही का हिसाब कौन देगा?
दशकों में बाजार का किराया हजारों रुपये से बढ़कर 50-60 हजार रुपये मासिक तक पहुंचने के बीच सरकारी संपत्ति के प्रबंधन की जिम्मेदारी भी अहम हो जाती है।
यदि दुकानों के कब्जे और किरायेदारी की स्थिति स्पष्ट नहीं थी, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि किराया नियमित रूप से लिया जा रहा था, तो उसके पीछे कौन-से दस्तावेज और आदेश आधार बने?
मामले में निष्पक्ष रिकार्ड जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा कि आवंटन, किराया वसूली और संपत्ति की निगरानी में कहां चूक हुई। अदालत का फैसला दुकानदारों के दावों पर न्यायिक स्थिति स्पष्ट करता है, लेकिन प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े सवालों का उत्तर एचएसवीपी को अपने पुराने रिकार्ड और कार्रवाई के विवरण से देना होगा।
सरकारी संपत्ति के मामले में केवल मुकदमे के फैसले तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं, यह भी जरूरी है कि इतने वर्षों तक बनी स्थिति की जिम्मेदारी तय हो।
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