मानवीय मूल्यों की स्थापना को लेकर महाड़ सत्याग्रह का अद्वितीय स्थान : डा. अमरजीत
रविवार को आजादी का अमृत महोत्सव श्रृंखला के तहत गांव बिरोह में कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

जागरण संवाददाता, चरखी दादरी : रविवार को आजादी का अमृत महोत्सव श्रृंखला के तहत गांव बिरोहड़ के राजकीय महाविद्यालय के स्नातकोत्तर इतिहास विभाग के तत्वावधान में महाड़ सत्याग्रह की 95वीं वर्षगांठ के अवसर पर आनलाइन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के संयोजक और मुख्य वक्ता डा. अमरदीप ने कहा कि मानवीय मूल्यों की स्थापना और अधिकार का भाव जागृत करने वाला महाड़ सत्याग्रह इतिहास में अद्वितीय स्थान प्राप्त है। 1920 का दशक भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण दौर था जब असहयोग आंदोलन, खिलाफत आंदोलन, खेड़ा सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन जैसे कई कदम अंग्रेजी दासता से मुक्ति के लिए चलाए गए। 20 मार्च 1927 को डा. भीमराव आंबेडकर ने मानव मात्र की स्वतंत्रता, मानवीय मूल्यों एवं सामाजिक अधिकारिता की स्थापना के लिए महाड़ सत्याग्रह का नेतृत्व किया। इसी कारण इस दिन को भारत सरकार के निर्देशानुसार सामाजिक अधिकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है। 19 मार्च 1927 को डा. आंबेडकर के नेतृत्व में महाड़ में विशाल जनसभा का आयोजन किया गया और अगले दिन 20 मार्च को डा. आंबेडकर के नेतृत्व में लगभग 5 हजार से अधिक पुरुषों और महिलाओं ने चावदार तालाब तक मार्च किया और पानी पीकर मानवीय समानता और अधिकारिता के कानून को लागू करवाने का प्रयास किया। 25 दिसंबर 1927 को एक नया सत्याग्रह शुरू किया गया। कानून ना तोड़ने के लिए सत्याग्रह स्थगित कर दिया गया। डा. अमरदीप ने कहा कि एक दशक के बाद 17 मार्च 1936 को बांबे हाइकोर्ट ने दलितों के पक्ष में फैसला सुनाया। यह नैतिक और कानूनी दोनों आधारों पर वंचित वर्गों की ऐतिहासिक जीत थी।
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