56 साल में अंबाला शहर के तीन विधायक बने विधानसभा के डिप्टी स्पीकर, पढ़ें राजनीति के और भी रोचक किस्से
अंबाला शहर के तीन विधायक 56 साल में डिप्टी स्पीकर बने हैं। आज तक अंबाला शहर विधानसभा हलके से केवल एक ही विधायक डेढ़ वर्ष के लिए प्रदेश सरकार में मंत्री बन सका है। 13 चुनावों में अंबाला शहर से 8 बार भाजपा 5 बार कांग्रेस को जीत मिली है।

जागरण संवाददाता, अंबाला शहर। संयुक्त पंजाब से अलग होकर बने हरियाणा जिसमें सात जिले ही होते थे। इनमें अंबाला भी शामिल था। तब से लेकर आज तक हरियाणा विधानसभा के कुल 13 आम चुनाव हुए हैं। इनमें शहर हलके से आज तक 8 बार भाजपा और 5 बार कांग्रेस का प्रत्याशी विजयी होकर विधायक बना है।
रोचक बात यह भी है कि शहर विधानसभा हलके से बीते 56 वर्षों में केवल एक बार ही स्थानीय विधायक और वह भी मात्र डेढ़ वर्ष की अवधि के लिए ही प्रदेश सरकार में मंत्री बन सका है। मार्च, 2005 में जब भूपेंद्र सिंह हुड्डा पहली बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। तब उन्होंने उनके तत्कालीन विश्वासपात्र और शहर से तब पहली बार कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने विनोद शर्मा, जो उससे पूर्व पंजाब से विधायक और राज्यसभा सांसद भी रह चुके थे, को मंत्रिमंडल में शामिल कर उन्हें आबकारी एवं कराधान (एक्साइज एंड टैक्सेशन ) एवं वन विभाग का कैबिनेट मंत्री बनाया था।
इसके बाद जनवरी, 2006 में उनके विभाग बदलकर बिजली, लोक निर्माण(भवन एवं सड़कें ) और पर्यावरण विभाग दे दिया गया था परन्तु शर्मा को अक्टूबर, 2006 में अर्थात मंत्री बनने के मात्र डेढ़ वर्ष बाद ही हरियाणा के कैबिनेट मंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा था। 2009 में विनोद शर्मा शहर से लगातार दूसरी बार कांग्रेस पार्टी से विधायक बने थे परंतु उन्हें दूसरी हुड्डा सरकार में मंत्री नहीं बनाया गया था।
यह तीन लोग बने डिप्टी स्पीकर
वर्ष 1968 और वर्ष 1972 के आम चुनावों में शहर से दो बार कांग्रेस विधायक बनी लेखवती जैन, वर्ष 1991 में चुनाव जीते कांग्रेस के सुमेर चंद भट्ट और वर्ष 1996 में बने भाजपा विधायक फकीर चंद अग्रवाल तीनों विधानसभा के डिप्टी स्पीकर (उपाध्यक्ष ) के पद पर पहुंच पाए थे। शहर से लगातार तीन बार 1977 ,1982 और 1987 में पहले जनता पार्टी और फिर भाजपा से विधायक बने मास्टर शिव प्रसाद और बाद में फरवरी, 2000 में भाजपा से विधायक बनी वीना छिब्बर भी मंत्रीपद तो दूर किसी अन्य सरकारी पद पर नहीं नियुक्त हो पाए थे।
मौजूदा विधायक असीम गोयल वर्तमान विधानसभा में गत तीन वर्षों से लोक उपक्रम कमेटी और इस वर्ष जून से विधायकों के प्रोटोकाल संबंधी कमेटी के चेयरमैन हैं जबकि वह सदन की ई-विधानसभा कमेटी (नेवा) के सदस्य भी हैं। लोक उपक्रम समिति का चेयरमैन होने के कारण असीम को किसी बोर्ड और निगम का चेयरमैन नहीं लगाया जा सकता क्योंकि एक ही समय पर कोई विधायक लोक उपक्रमों अर्थात बोर्ड-निगमों पर निगरानी रखने वाली विधानसभा की समिति का चेयरमैन और साथ साथ ही उन्हें स्वयं ही किसी बोर्ड निगम का चेयरमैन नहीं लगाया जा सकता है।
वर्ष 2016 में हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार द्वारा नियुक्त होने वाले मुख्य संसदीय सचिव (चीफ पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी) के पदों को असंवैधानिक करार कर दिया था जिनपर पहले सत्ताधारी पार्टी के उन विधायकों को लगाया जाता था जो मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किए जा सकते थे, इसलिए अब असीम को मुख्य संसदीय सचिव भी नहीं नियुक्त किया जा सकता है।

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