सिर्फ 15 साल की उम्र में जानलेवा बीमारी से जूझ रहे थे क्रिस्टियानो रोनाल्डो, हृदय रोग को हराकर फिर ऐसे जीती ‘दुनिया’
क्रिस्टियानो रोनाल्डो को सिर्फ 15 साल की उम्र में गंभीर बिमारी हो गई थी। मगर उन्होंने रोग को मात देते हुए फुटबॉल में अपनी बादशाहत कायम की।

क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने छोड़ा अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जागरण, नई दिल्लीः पुर्तगाली फुटबॉल के सबसे बड़े सितारे कहे जाने वाले क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल से संन्यास ले लिया है। सिर्फ 18 साल की उम्र में पुर्तगाल के लिए पदार्पण करने वाले रोनाल्डो ने 23 साल के अंतरराष्ट्रीय करियर में 18 साल तक इस टीम की कप्तानी की, एक यूरो कप और दो नेशंस लीग के खिताब जीते।
रोनाल्डो 234 मैचों में 146 गोल कर सबसे ज्यादा अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने और सबसे ज्यादा अंतरराष्ट्रीय गोल करने के विश्व रिकार्ड बनाए और अब सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर अपनी विश्व प्रसिद्ध नंबर सात की जर्सी भविष्य के हवाले करने का वादा कर दिया।
ह्रदय रोग को हराकर बने फुटबॉल के बादशाह
रोनाल्डो ने अपने करियर में कई उपलब्धियां हासिल कीं लेकिन उनका ये सफर आसान नहीं था। सिर्फ 15 साल की उम्र में रोनाल्डो को हृदय से जुड़ी ऐसी बीमारी हो गई थी जिसके चलते उनका करियर शुरू होने से पहले ही संकट में पड़ गया।
रोनाल्डो का हृदय जरूरत से ज्यादा तेज धड़कता था और ये बीमारी जानलेवा भी हो सकती थी लेकिन समय पर इलाज हुआ और वह कुछ दिनों बाद फिर मैदान पर लौट आए।
20 अगस्त 2003 को जब रोनाल्डो कजाखस्तान के विरुद्ध मैच के 46वें मिनट में लेजेंड लुइस फिगो की जगह मैदान पर आए तो वहां मुश्किल से आठ हजार लोग मौजूद थे। उस वक्त रोनाल्डो वो उभरते सितारे थे जिसे एक दिन दुनिया रोशन करनी थी, लेकिन इस रोशनी को आने में अभी वक्त था।
टीम के मुख्य कोच लुइस फिलिप स्कोलारी ने उसी दिन ऐलान कर दिया कि फुटबॉल की दुनिया में एक और सितारा आ चुका है। इस मैच में रोनाल्डो के प्रदर्शन ने प्रशंसकों को यकीन दिला दिया कि वह ना सिर्फ इस मैच में बल्कि विश्व फुटबॉल में भी फिगो के वारिस बनेंगे। हालांकि ये इतना आसान नहीं था।
डेब्यू के दो साल बाद छूटा पिता का साया
फुटबॉल के मैदान पर विपक्षी टीमों को अपनी कला से हैरान करने वाले रोनाल्डो के व्यक्तिगत जीवन की परेशानियां बढ़ती जा रही थीं। शराब पीने के आदी उनके पिता की हालत बद से बदतर होती गई और अंततः 6 सितंबर 2005 को जब रोनाल्डो एक विश्व कप क्वालीफायर मुकाबला खेलने के लिए रूस में थे तभी समाचार आया कि उनके पिता की मृत्यु हो गई।
कोई रोनाल्डो तक ये समाचार पहुंचाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था तब कोच स्कोलारी ने ये जिम्मेदारी ली और रोनाल्डो को उनके पिता की मौत की सूचना दी जिसे सुनकर रोनाल्डो बोले- आज मैं अपने पिता के लिए कुछ नहीं कर सकता इसलिए मैं कल का मैच खेलूंगा और फिर जाऊंगा।
इस मैच में रोनाल्डो खेले और बहुत अच्छा खेले, हालांकि दोनों ही टीमें यहां गोल करने में विफल रहीं और मैच 0-0 से ड्रा रहा। जैसे-जैसे वक्त बीता, रोनाल्डो ने स्कोलारी और प्रशंसकों के भरोसे पर खरे उतरते हुए आने वाले सालों में पुर्तगाल को अकेले दम पर कई मैच जिताए।
रोनाल्डो से पहले पुर्तगाल कई बार बड़े टूर्नामेंट में आगे तक जाकर भी कुछ नहीं जीत पाया था लेकिन रोनाल्डो के 23 साल के करियर में इन लोगों ने तीन ट्राफियां अपने नाम कीं। रोनाल्डो ने इस सफर में पांच बैलन डिओर भी जीते और राष्ट्रीय टीम के अलावा क्लब स्तर पर भी अपना लोहा मनवाया। हालांकि जाते-जाते एक बड़े विवाद ने उनकी विरासत में दाग जरूर लगा दिया।
विवाद के बीच खत्म हुआ फुटबॉल का सफर
बीते अक्टूबर महीने में अंतरराष्ट्रीय ब्रेक के दौरान डेनमार्क के विरुद्ध मैच से ठीक पहले रोनाल्डो ने राष्ट्रीय टीम का कैंप छोड़ दिया था। दरअसल इससे पहले पुर्तगाल का मैच नार्वे से हुआ जहां कोच जार्ज जेसुस ने उन्हें खेलने का मौका नहीं दिया और रोनाल्डो के मुताबिक ये वादाखिलाफी थी उन्होंने कोच पर तमाम आरोप लगाते हुए सोशल मीडिया पर एक लंबी पोस्ट की।
बाद में समाचार आए कि रोनाल्डो वापस आएंगे, लेकिन उनकी बहन ने स्पष्ट कह दिया कि धोखा मिलने के बाद वापसी मुश्किल होती है। यहीं से कहा जाने लगा कि जेसुस के रहते हुए रोनाल्डो का आना मुश्किल होगा।
बाद में पुर्तगाल फुटबाल महासंघ ने राष्ट्रीय टीम का कैंप छोड़ने के लिए रोनाल्डो पर 30 दिन का प्रतिबंध और 255 यूरो का जुर्माना लगाया था। हालांकि ये स्पष्ट नहीं था कि ये प्रतिबंध कब से कब तक चलेगा, इसलिए ये कहना मुश्किल है कि रोनाल्डो ने प्रतिबंधित रहते हुए संन्यास लिया या उन्होंने ये कदम प्रतिबंध खत्म होने के बाद उठाया।
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