मनोज वशिष्ठ, नई दिल्ली। सेना और जवानों से जुड़ी कहानियों का अपना एक रोमांच होता है। उसमें भी अगर कहानी एक ऐसे जांबाज़ की हो, जो सामने खड़े दुश्मन से लड़ने के साथ ख़ुद से भी जंग जीत चुका हो तो रोमांच का स्तर अलग ही हो जाता है। फिर यह कहानी किसी फौजी अफ़सर की नहीं रहती। यह हर उस शख़्स की कहानी बन जाती है, जो निराशा और हताशा के गहन अंधकार से निकलने के लिए अपनी ज़िद को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाता है। 

Zee5 पर रिलीज़ हुई वेब सीरीज़ जीत की ज़िद कुछ काल्पनिकताओं के साथ एक्स आर्मी ऑफ़िसर मेजर दीप सिंह सेंगर के जज़्बे, हौसले और जीत के लिए ज़िद की असली कहानी है। यह उन सभी जवानों और अफ़सरों की कहानी भी है, जो युद्ध भूमि में अदम्य साहस और पराक्रम के निशान अपने जिस्म पर और सीने पर मेडल लेकर जब आम ज़िंदगी में लौटते हैं तो उनके सामने एक नई जंग तैयार खड़ी होती है। 

जीत की ज़िद वेब सीरीज़ परिवार, दोस्तों और साथियों के रूप में उस सपोर्ट सिस्टम की अहमियत को भी रेखांकित करती है, जो ख़ुद से लड़ी जा रही इस जंग को जीतने के लिए प्रोत्साहित करता है, जैसा कि सीरीज़ के आख़िरी एपिसोड में मेजर दीप सिंह सेंगर एक कार्यक्रम में स्वीकार करते नज़र आते हैं।

आकाश चावला और अरुणाभ जॉय सेनगुप्ता की कहानी को पटकथा लेखक सिद्धार्थ मिश्रा ने नॉन-लीनियर नैरेटिव स्टाइल में रखा है। स्क्रीनप्ले वर्तमान और अतीत में सफ़र करते हुए मेजर सेंगर की ज़िंदगी में 1987 से 2010 के बीच हुए प्रमुख घटनाक्रमों को दिखाता है। इस बीच कहानी भोपाल, आईएमए देहरादून, जम्मू-कश्मीर, अहमदाबाद के प्रीमियर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट से होते हुए गुड़गांव तक पहुंचती है। 

पहले एपिसोड की शुरुआत पिछली सदी के आख़िरी सालों के दौरान जम्मू कश्मीर में एक सैन्य ऑपरेशन से होती है। एक स्कूल में आतंकवादियों ने कुछ सिविलियंस को बंधक बनाकर रखा है। सूचना मिलने पर मेजर सेंगर बंधकों को छुड़ाने स्कूल पहुंचते हैं। मिशन कामयाब रहता है, मगर मेजर सेंगर को गोली लग जाती है। ऑपरेशन के दौरान मेजर को अपने बचपन की एक दहलाने वाली घटना याद आती है, जिसने उनकी ज़िंदगी का रुख़ ही मोड़ दिया था। मेजर को दिल्ली के आर्मी अस्पताल में भर्ती करवा दिया जाता है। अपने पेशे के लिए समर्पित मेजर जल्द से जल्द अपनी यूनिट के पास जाना चाहते हैं, मगर डॉक्टरों के हिसाब से वो मेडिकली अनफिट हैं।

अस्पताल के माहौल से आज़िज आकर मेजर अपना यूरिनरी बैग हाथ में पकड़े हुए चुपचाप निकलकर दोस्त मेजर सूर्या सेठी (एली गोनी) की शादी में शामिल होने पहुंच जाते हैं, जहां उनकी मुलाकात जया (अमृता पुरी) से होती है। दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगते हैं। मेजर की बेचैनी देख कमांडिंग ऑफ़िसर उन्हें अपनी फिटनेस साबित करने के लिए 15 दिनों का वक़्त देते हैं। इस बीच मेजर को ख़बर मिलती है कि कारगिल में युद्ध छिड़ गया है और उनका नाम ऑपरेशन के लिए जाने वालों की सूची में नहीं है।

मेजर सेंगर अपनी यूनिट के पास पहुंच जाते हैं। मेजर की ज़िद देख सीओ उन्हें ऑपरेशन लीड करने की इजाज़त देते हैं। इस सैन्य ऑपरेशन में पांच गोलियां खाकर लौटे स्पेशल फोर्सेज़ के मेजर दीप सिंह सेंगर अस्पताल में कई महीनों तक जूझने के बाद ज़िंदगी की जंग तो जीत जाते हैं, मगर व्हील चेयर में उम्र गुज़ारने का ख़्याल मेजर को हताशा से भर देता है।

पत्नी की प्रेरणा से मेजर कैट परीक्षा पास करके अहमदाबाद के एक प्रीमियर मैनेजमेंट संस्थान में दाख़िला लेते हैं। एमबीए करके एक कॉरपोरेट कंपनी में नौकरी करने लगते हैं और कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते हुए ऊंचे पद पर पहुंच जाते हैं। मगर, इस दौरान कुछ ऐसे घटनाक्रम होते हैं कि मेजर को अपने अपाहिज होने का एहसास कचोटने लगता है और धीरे-धीरे निराशा के अंधकार में डुबो देता है। इसके बाद मेजर की ख़ुद से जंग छिड़ती है, जिसमें उनकी पत्नी जया, दोस्त सूर्या और स्पेशल फोर्सेज़ की ट्रेनिंग में मेजर के सीओ रहे कर्नल रंजीत चौधरी उनका सपोर्ट सिस्टम बनते हैं।

जीत की ज़िद सीरीज़ वैसे तो 7 एपिसोड्स में फैली हुई है, मगर असली उफ़ान आख़िरी के तीन एपिसोड्स में ही आता है। इन एपिसोड्स में अमित साध की अदाकारी की परिपक्वता देखने लायक है। अमित ने मेजर दीप सेंगर बनने के लिए जो होम वर्क किया  है, उसका अंदाज़ा उन्हें स्क्रीन पर देखकर हो जाता है। स्पेशल फोर्सेज़ की मुश्किल ट्रेनिंग की चुनौतियों को हराने वाले मेजर से व्हील चेयर में धंसे एक बेबस और हारे हुए एक्स-आर्मी ऑफ़िसर के ट्रांसफॉर्मेशन को अमित ने अपने अभिनय से जीवंत कर दिया है। सीरीज़ में मेजर सेंगर के अलावा पत्नी जया का किरदार काफ़ी अहम है और अमृता पुरी के हिस्से में कुछ बेहतरीन दृश्य भी आये हैं।

मेजर के व्हील चेयर से बद्ध होने के बावजूद शादी करने का फ़ैसला, उन्हें अवसाद से निकालने के लिए मोटिवेट करना या मेजर को बिखरता हुआ देख कर्नल चौधरी से मदद मांगने जाना। अमृता ने अपने अभिनय के ज़रिए जया की भावनाओं को मुकम्मल आयाम दिया है। दोस्त के किरदार में एली गोनी ने ठीक काम किया है। इन सबके बीच कड़क, तुनकमिज़ाज मगर मुर्दे में भी जान फूंक देने का जज़्बा रखने वाले कर्नल चौधरी के किरदार में सुशांत सिंह अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहते हैं। 

जीत की ज़िद में भावनाओं को असरदार ढंग से उकेरा गया है, मगर तकनीकी पहलू पर सीरीज़ मात खा जाती है। कुछ दृश्य बेहद बचकाने लगते हैं। इन दृश्यों में सहयोगी कलाकारों की अदाकारी से लेकर एडिटिंग तक में अपरिपक्वता साफ़ झलकती है। आईएमए में एली गोनी और अमित साध के किरदारों की पहली मुलाक़ात वाले बॉक्सिंग मैच के दृश्य का निष्पादन बहुत हल्का और बेजान है। दृश्यों के संयोजन में कसे हुए निर्देशन की कमी साफ तौर पर झलकती है।

स्पेशल फोर्सेज़ की ट्रेनिंग के दृश्यों में प्रोबेशनरों का किरदार निभाने वाले जूनियर कलाकारों की शारीरिक भाषा और हाव-भाव बिल्कुल फौजियों वाले नहीं लगते। ऐसे में दृश्यों को प्रभावशाली बनाने का सारा दबाव मुख्य कलाकारों पर आ जाता है। उनसे निगाह हटते ही सीरीज़ का कैनवास एकाएक छोटा लगने लगता है। स्क्रीनप्ले में घटनाओं के बहुत आगे पीछे होने से भी प्रवाह टूटता है। ऐसी कमियां निश्चित तौर पर विशाल मैंगलोरकर के निर्देशन को कमज़ोर बनाती हैं।

सीरीज़ के हर एपिसोड के अंत में मेजर सेंगर पत्नी जया के साथ आकर दर्शक से रू-ब-रू भी होते हैं और प्रमुख घटनाओं पर चर्चा करते है। बायोपिक फिल्मों में हमने तस्वीरों के साथ ऐसे प्रयोग देखे हैं, पर खुद आकर बात करना पहले नहीं देखा गया है। जीत की ज़िद अपनी ख़ूबियों और ख़ामियों को समेटे एक प्रेरणादायी और जज़्बाती वेब सीरीज़ है, जो अमित साध की ईमानदार परफॉर्मेंस के लिए सराही जानी चाहिए।

कलाकार- अमित साध, अमृता पुरी, सुशांत सिंह, एली गोनी आदि।

डायरेक्टर- विशाल मैंगलोरकर

निर्माता- बोनी कपूर

वर्डिक्ट- *** (3 स्टार)

Edited By: Manoj Vashisth