मनोज वशिष्ठ, नई दिल्ली। देश में ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के फलने-फूलने का सबसे बड़ा फ़ायदा ऐसी फ़िल्मों को हुआ है, जो सीमित बजट में बन तो गयीं, मगर बड़े पर्दे पर आने के लिए तमाम ज़द्दोज़हद करनी पड़ती है। अगर किसी तरह सिनेमाघरों में कुछ स्क्रींस मिल भी गयीं तो बड़ी फ़िल्मों के साये में उनका नज़रअदाज़ होना लगभग तय होता है और अगर फ़िल्म कोई मैसेज दे रही हो तो वो लोगों तक नहीं पहुंच पाता।

11 जून को डिज़्नी प्लस हॉटस्टार पर रिलीज़ हुई शादीस्थान सीमित संसाधनों में बनी ऐसी फ़िल्म है, जिसका इरादा नेक और संदेश व्यापक है। शादीस्थान, भारतीय समाज की सोच में पैबस्त एक ऐसे मुद्दे को रेखांकित करती है, जो कई मामलों में आधी आबादी की घुटन का बहुत बड़ा कारण बन जाता है।

'लोग क्या कहेंगे', 'समाज क्या सोचेगा' के डर से लड़की की शादी को उसके जीवन का अंतिम सत्य मानने वाली सोच पर सीधा प्रहार करती है शादीस्थान। मुंबई में रहने वाली 17 साल की अर्शी कुछ घंटों में 18 साल की होने वाली है। माता-पिता ने उसके लिए राजस्थान में अपने रिश्तेदारों की मदद से एक लड़का ढूंढ लिया है, जो एक तरह से दो परिवारों के बीच लड़कियों का आदान-प्रदान है।

अर्शी की बुआ के बेटे की शादी जिस लड़की से हो रही है, उसके भाई के साथ अर्शी का रिश्ता किया जा रहा है। अर्शी शादी के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। वो अपने ख्वाबों को परवाज़ देना चाहती है। विरोध भी करती है, मगर मां का मजबूर चेहरा देखा हथियार डाल देती है।

 

 

 

 

 

 

 

 

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शादी में जाने के लिए प्लेन मिस हो जाने के बाद अर्शी का परिवार एक म्यूज़िक बैंड की बस में सफ़र करता है। यह म्यूज़िक बैंड उसी शादी में परफॉर्म करने जा रहा है, जिसमें अर्शी के परिवार को शामिल होना है। बैंड की लीड सिंगर साशा के अलावा फ्रैडी, जिगमी और इमाद हैं।

रास्ते में बातचीत के दौरान साशा को अर्शी की दुविधा का पता चलता है और वो किसी तरह उसकी मदद करना चाहती है। साशा अर्शी की मां से बात करती है, मगर वो पति और समाज के ख़िलाफ़ होने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। शादी में पहुंचकर बैंड परफॉर्म करता है।

साशा एक बार फिर अर्शी की मां से बात करती है, जहां वो समाज के चक्रव्यूह से निकलने में असमर्थता जताती है। इस बीच एक ऐसा घटनाक्रम होता है कि अर्शी के पिता और मां को अपनी भूल का एहसास होता है और आख़िरकार वो अर्शी का रिश्ता किये बिना ही बैंड की बस के साथ मुंबई लौट जाते हैं। 

शादीस्थान की कहानी फ़िल्म के निर्देशक राज सिंह चौधरी ने लिखी है, जबकि स्क्रीनप्ले और संवाद में कार्तिक चौधरी, निशांक वर्मा और कुलदीप रुहिल का योगदान है। कहानी बिल्कुल सीधी-सपाट है, मगर स्क्रीनप्ले के ज़रिए इसे रोचक बनाने की सफल कोशिश की गयी है। संकुचित सोच वाले माता-पिता का चार ऐसे फ्री-स्प्रिटेड म्यूज़िशयंस के साथ इंटरेक्शन दिलचस्प लगता है, जिनकी सुबह बीयर के साथ होती है।

साशा और अर्शी की मां, भारतीय समाज की दो अलग धाराओं की महिलाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। हालांकि, स्क्रीनप्ले में इनके चित्रण में कोई अतिश्योक्ति नहीं है। दो अलग-अलग सोचों को संतुलन के साथ दिखाया गया है। इसके लिए संवाद लेखकों को श्रेय दिया जाना चाहिए, जिन्होंने साशा और अर्शी की मां के बीच संवाद को तार्किक और नियंत्रित रखा है।

फ़िल्म की स्टोरी ऐसी है कि ड्रामा दिखाने की गुंजाइश थी, मगर स्क्रीनप्ले को बेहद साधारण और वास्तविकता के क़रीब रखा गया। हालांकि, क्लाइमैक्स में यह सादगी थोड़ा अखरती है। जब  एक अहम घटनाक्रम के बाद दर्शक कुछ थ्रिल महसूस कर रहा होता है तो फ़िल्म एक झटके में ख़त्म हो जाती है।

लेखन के साथ शादीस्थान की दूसरी सबसे बड़ी ताक़त इसके कलाकार हैं, जिनका नेतृत्व कीर्ति कुल्हरी कर रही हैं। कीर्ति बेहतरीन अदाकारा हैं। उनकी अभिनय क्षमता शैतान और पिंक जैसी फ़िल्मों और वेब सीरीज़ में दर्शक देखते रहे हैं।

शादीस्थान में आज़ाद-ख़्याल मगर प्रैक्टिल सिंगर साशा के इस किरदार को कीर्ति कुल्हरी ने शिद्दत से जीया है। म्यूज़िक बैंड के बाक़ी तीन सदस्यों के किरदार में रियल लाइफ़ म्यूज़िशियंस अपूर्व डोगरा, अजय जयंती और शेनपेन खिमसर ने काबिले-तारीफ़ काम किया है।

अर्शी के किरदार को मेधा शंकर ने सफलता के साथ निभाया है। मेधा ने एक लड़की की छटपटहाट को कहीं ख़ामोशी तो कहीं भावों के ज़रिए बख़ूबी बयां किया है। वहीं, एक मिडिल क्लास, परिवार को समर्पित मगर समाज से डरने वाले पिता के किरदार में राजन मोदी ने बहुत सधी हुई परफॉर्मेंस दी है।

पति और समाज के नियमों से बंधी अर्शी की मां के किरदार में निवेदिता भट्टाचार्य अच्छी लगी हैं। फ़िल्म का संगीत नकुल शर्मा और साहिल भाटिया ने दिया है, जो कहानी और फ़िल्म के मिज़ाज पर फिट बैठता है। केके मेनन का कैमियो सुखद है। उन्हें स्क्रीन पर देखना फैंस को अच्छा लगेगा। 

शादीस्थान, ओटीटी पर रिलीज़ होने वाली उन चौंकाने वाली फ़िल्मों में शामिल है, जो एकाएक कहीं से निकलकर आती हैं और फिर दर्शकों की पसंद बन जाती हैं। फ़िल्म कुछ जगहों पर उपदेश देने वाली लग सकती है, मगर डेढ़ घंटे की फ़िल्म बोर नहीं करती। 

कलाकार- कीर्ति कुल्हरी, निवेदिता भट्टाचार्य, राजन मोजी, मेधा शंकर, अपूर्व डोगरा, अजय जयंती, शेनपेन खिमसर आदि। 

निर्देशक- राज सिंह चौधरी

निर्माता- अनंत रूंगटा, संजय शेखर शेट्टी।

रेटिंग- *** (तीन स्टार)

Edited By: Manoj Vashisth