- पराग छापेकर

स्टार कास्ट: राहुल भट्ट, ऋचा चड्ढा, अदिति राव हैदरी, सौरभ शुक्ला आदि।

निर्देशक: सुधीर मिश्रा

निर्माता: प्रीतिश नंदी

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की ‘देवदास’ पर हिंदुस्तानी फ़िल्म इंडस्ट्री में ढेरों फ़िल्में बन चुकी हैं। मोटे तौर पर देवदास को अलग अंदाज़ में बहुत कम लोगों ने अडॉप्ट किया है उसमें से अनुराग कश्यप की फ़िल्म ‘देव डी’ भी है और अब लीजेंडरी डायरेक्टर सुधीर मिश्रा की फ़िल्म ‘दास देव’ दर्शकों के सामने है।

सुधीर ने अपने सारे इंटरव्यू में भी यह बात दोहराई है कि उन्होंने देवदास से सिर्फ पात्रों को लिया है और उन्हें एक अलग परिवेश में यानी राजनीति में रख दिया है। सुधीर मिश्रा की फ़िल्में कभी भी शुद्ध कमर्शियल मनोरंजक फ़िल्में नहीं रही हैं। उन्होंने हमेशा आपकी बुद्धि को ललकारा है! एक ऐसा सिनेमा उन्होंने हमेशा गढ़ा है जो आपको सोचने पर मजबूर कर देता है! उसी कड़ी को आगे बढ़ाती है यह फ़िल्म- ‘दास देव’।

सुधीर का देवदास यानी देव (राहुल भट्ट) उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिवार और उसकी विरासत का मालिक है। लेकिन, नशे में डूबा हुआ है। पारिवारिक दबाव के चलते देव अपने नशे से बाहर आकर राजनीतिक गलियारों में प्रवेश करता है लेकिन,उसके साथ क्या क्या मुश्किलें खड़ी होती हैं? उसे किन मानसिक यातनाओं से गुजरना पड़ता है? इस यात्रा में उसकी बचपन की दोस्त पारो (रिचा चड्ढा) उसके साथ किस तरह खड़ी होती है? राजनीतिक तौर पर सलाहकार के तौर पर उसकी ज़िंदगी में आई चांदनी (अदिति राव हैदरी) दबे छुपे उससे प्यार करने लगती है। इन दोनों के बीच भावानात्मक संघर्ष, राजनीतिक उठापटक, राजनीतिक दांव पेंच और उससे होने वाली मानसिक यातनाओं को बड़ी ही खूबसूरती से सुधीर मिश्रा ने कैद किया है।

‘राजनीति का मकसद सिर्फ और सिर्फ जनता से अपना लाभ उठाना है, जनता के लिए काम करना नहीं।’ यह एक स्पष्ट मत पूरी फ़िल्म से निकलकर आता है! कुछ प्रतीकात्मक दृश्यों में सुधीर कमाल कर जाते हैं-जैसे दो प्रेमियों का साथ बैठकर शराब पीना या पारो का शुक्ला की छतरी के नीचे जाना असरदार बन पड़े हैं।

अभिनय की बात करें तो राहुल भट्ट देव के किरदार में पूरी तरह से छा जाते हैं। अदिति राव हैदरी प्रभावित करती है। विनीत कुमार सिंह अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराते हैं। रिचा चड्ढा, सौरभ शुक्ला, दीपक राणा अपने-अपने किरदारों में न्याय करते नजर आते हैं। विपिन शर्मा फ़िल्म को एक अलग डायमेंशन देते हैं। फ़िल्म का संगीत अच्छा है- खासकर विपिन पटवा का गीत- ‘सहमी है धड़कन..’ प्रभावित करता है।

हालांकि, सुधीर मिश्रा की फ़िल्में थोड़ी अलग मानी जाती हैं मगर इसमें वॉइस ओवर का इस्तेमाल थोड़ा कम किया जाता तो अच्छा होता। विजुअल नैरेटिव की जगह वॉइस का इस्तेमाल पूरी तरह से खटकता है। स्क्रीनप्ले में सुधीर ने एक सस्ता सा कॉन्प्रोमाइज किया है जब शुक्ला (विपिन शर्मा) में कमजोरी दिखाने के बजाय पारो को देवदास के पास वापस आने का एक सशक्त कारण तलाशा होता तो बेहतर होता? कुल मिलाकर अगर आपको अलग तरह का सिनेमा पसंद है तो सुधीर मिश्रा की फ़िल्म ‘दास देव’ देखने आप जा सकते हैं।

जागरण डॉट कॉम रेटिंग: 5 में से 3 (तीन) स्टार

अवधि: 2 घंटे 20 मिनट

Posted By: Hirendra J