मनोज वशिष्ठ, नई दिल्ली पाप और पुण्य सिर्फ़ एक नज़रिया है। किसी एक के लिए जो पाप है, वो दूसरे के लिए पुण्य हो सकता है, लेकिन यह सिर्फ़ नज़रियाभर है तो फिर किसे स्वर्ग मिलेगा, किसे नर्क... इसका फ़ैसला तो बड़ा मुश्किल होता होगा। ख़ासकर, मौत के बाद उस दफ़्तर में, जिसके हेड यमराज हैं और हेड क्लर्क चित्रगुप्त। इसी आध्यात्मिक फलसफे पर अनुराग बसु ने ढाई घंटे की फ़िल्म लूडो बनायी है, जो ट्रीटमेंट और स्टाइल के लिहाज़ से बिल्कुल भी आध्यात्मिक नहीं है। फ़िल्म में अनुराग बसु ख़ुद यमराज और राहुल बग्गा चित्रगुप्त के प्रतीक दिखाये गये हैं और उनका पसंदीदा खेल भी लूडो है। 

लूडो के खेल में जिस तरह लाल, हरे, नीले और पीले रंग की गोटियां होती हैं, उसी तरह लूडो फ़िल्म में चार मुख्य किरदारों के जीवन में होने वाली घटनाएं इन चार रंगों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिनकी हर चाल तय करता है किस्मत का पासा। ये चारों किरदार एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं, लेकिन ज़िंदगी का खेल खेलते-खेलते किस्मत इन्हें बार-बार एक ही 'घर' (मंज़िल) तक ले जाती है। लूडो के खेल की तरह बीच-बीच में ऐसे पड़ाव आते हैं, जहां यह एक-दूसरे की गोटी काटते हैं।

लूडो की शुरुआत डॉन सत्तू भैया यानी राहुल सत्येंद्र त्रिपाठी (पंकज त्रिपाठी) से होती है, जो बिल्डर भिंडर का क़त्ल कर देता है। क़त्ल करके लौटते समय इस मर्डर के गवाह राहुल अवस्थी (रोहित सर्राफ) को अपनी वैन में साथ ले जाता है। राहुल एक मॉल में कर्मचारी है और अपने बॉस के आतंक का मारा है। हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि वो अनजाने में भिंडर के खून का गवाह बन जाता है।

सत्तू की वैन आगे बढ़ती है और रास्ते में आशा (आशा नेगी) के पति भानु (भानु उदय गोस्वामी) को उठा लिया जाता है, जिस पर सत्तू का 90 लाख रुपया बकाया है। आशा, बिट्टू (अभिषेक बच्चन) की पूर्व पत्नी है। बिट्टू की आपराधिक पृष्ठभूमि रही है और छह साल की जेल काटकर अभी-अभी लौटा है। दोनों की एक बेटी (रूही) भी है। उसके जेल जाने के बाद आशा भानु से दूसरी शादी कर लेती है।

आशा, रूही को पढ़ने के लिए हॉस्टल भेज देती है। उसी के लिए आशा के पति ने सत्तू से पैसा उधार लिया था। आशा, पति को सत्तू से छुड़ाने के लिए बिट्टू की मिन्नतें करती है। आख़िरकार बिट्टू मान जाता है और सत्तू से बात करने उसके अड्डे पर जाता है। बिट्टू और सत्तू की भी एक कहानी है।

आलोक कुमार गुप्ता यानी आलू (राजकुमार राव) छोटे-मोटे अपराधों में लिप्त रहता है, लेकिन विकट आशिक़ है। हरफनमौला किस्म का आलू मिथुन दा की तरह लंबे बाल रखता है, उन्हीं के डांस स्टेप्स को फॉलो करता है और ज़रूरत पड़ने पर वैसे ही बात भी करता है, क्योंकि पिंकी (फातिमा सना शेख़) के फेवरिट एक्टर मिथुन चक्रवर्ती हैं। आलू बचपन से ही पिंकी को प्यार करता है और उसके लिए किसी भी हद तक जा सकता है। मगर, पिंकी की शादी मनोहर जैन (पारितोष त्रिपाठी) से हो जाती है।

मनोहर का अफेयर किसी दूसरी औरत से चल रहा है। कुछ ऐसा घटनाक्रम होता है कि मनोहर, भिंडर के क़त्ल के आरोप में पकड़ा जाता है। पति को बचाने के लिए पिंकी आलू से मदद मांगती है, जो पिंकी को किसी भी सूरत में ना नहीं बोल सकता।

श्रुति चोक्सी (सान्या मल्होत्रा) का सपना एक अमीर आदमी से शादी करके घर बसाने का है, जिससे लाइफ़ तनावमुक्त हो जाए। वेडिंग ऐप के ज़रिए लड़का खोजने के दौरान उसकी मुलाक़ात डॉ. आकाश चौहान (आदित्य रॉय कपूर) से होती है। कुछ मुलाकातों के बाद दोनों में शारीरिक संबंध बन जाते हैं, जिसका वीडियो इंटरनेट पर अपलोड हो गया है। कैसे? ये राज़ आगे जाकर खुलता है।

वीडियो में सिर्फ श्रुति का चेहरा साफ दिख रहा है, इसलिए आकाश पुलिस में शिकायत दर्ज़ करवाने के लिए उसे राज़ी करने की कोशिश करता है, मगर पांच दिन बाद श्रुति की शादी है। वो तैयार नहीं होती। आख़िर, आकाश अपने बड़े भाई, जो वकील हैं, के साथ सत्तू की मदद लेने उसके अड्डे पर जाता है, ताकि कानून के दायरे से बाहर रहकर समस्या का समाधान किया जा सके। 

यह तीनों किरदार बिट्टू, आकाश और राहुल सत्तू के अड्डे पर पहुंचते हैं और वहां एक दुर्घटना हो जाती है, जिसमें कई लोग मारे जाते हैं और सत्तू गंभीर रूप से ज़ख्मी हो जाता है। इसके बाद ये सभी किरदार किस तरह अपनी-अपनी समस्याओं को सुलटाने के लिए ज़िंदगी के लूडो पर अपनी-अपनी चालें चलते हैं और इसी क्रम में एक-दूसरे के रास्ते में आकर अनजाने में ही एक-दूसरे की प्लानिंग को पलीता लगाते हैं।

लूडो, अनुराग बसु की निर्देशन स्टाइल को आगे बढ़ाने वाली फ़िल्म है। कई किरदारों और उनके साथ होने वाली घटनाओं को पटकथा में सफलतापूर्वक पिरोना अनुराग की ख़ासियत रही है। उनकी पटकथा का यह सबसे मजबूत पक्ष भी है। इसमें भटकाव का भी रिस्क होता है। इतने सारे किरदारों को समेटकर कहानी को एक पटरी पर दौड़ाते रहना ज़रा मुश्किल होता है। हालांकि, इसमें दर्शक की जिम्मेदारी थोड़ा बढ़ जाती है। उसे एकाग्र होकर स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रखनी पड़ती हैं। इस तरह का भार दर्शक अनुराग की 'बर्फी' में भी महसूस कर चुके होंगे।

अनुराग और सम्राट चक्रवर्ती के स्क्रीनप्ले में वर्तमान और अतीत में होने वाली घटनाओं के क्रम को जोड़ने का बेहतरीन प्रयोग किया गया है। जैसे-जैसे किरदारों के साथ घटनाएं घटित होती हैं, ज़रूरत के हिसाब से फ्लैशबैक आते रहते हैं। एक ही दृश्य में कई पात्र मौजूद रहते हैं, मगर जिस सीक्वेंस में जिसकी ज़रूरत होती है, उसे ही हाइलाइट किया जाता है, बाक़ी नेपथ्य में रहते हैं। उसी दृश्य को जब आगे दोहराया जाता है, तो नेपथ्य में रहने वाले पात्रों की भूमिका मुख्य हो जाती है।  

कलाकारों के चरित्र-चित्रण और संवाद लेखन में ह्यूमर की गाढ़ी परत पूरे कथ्य में महसूस की जा सकती है। मौजूदा राजनैतिक हालात पर टिप्पणी के साथ शादी को लेकर लड़कियों की सोच, एकतरफ़ा मोहब्बत का एहसास और दर्द, कामकाजी माता-पिता के एकाकी बच्चों की मनोवृति, लूडो में संवादों और दृश्यों के ज़रिए उभरकर आते हैं। 'सवाल पूछो जलेबी, जवाब चाहिए कलाकंद' और 'ना सीता सुरक्षित है, ना सूपर्णखा' हल्के-फुल्के अंदाज़ में कही लाइनें गुदगुदाती हैं, मगर असर भी छोड़ती हैं। 

फ़िल्म के लेखन को कलाकारों की अदाकारी का भरपूर साथ मिला है। ख़ासकर, राजकुमार राव ने आलू के किरदार में अपने अलग ही रंग दिखाये हैं। सत्तू भैया के किरदार को पंकज त्रिपाठी ने बड़ी सहजता के साथ निभाया है। यह डॉन ग़ज़ब का सेंस ऑफ़ ह्यूमर भी रखता है। उनके हिस्से कुछ बेहतरीन लाइंस भी आयी हैं। वहीं, अभिषेक बच्चन के साथ बाल कलाकार इनायत वर्मा ने बेहतरीन जुगलबंदी की है। अभिषेक कई साल पहले आयी युवा में लगभग ऐसा ही किरदार लल्लन सिंह निभा चुके हैं। हालांकि, बिट्टू लल्लन से कम गुस्सैल है और बड़े दिलवाला है। 

फातिमा सना शेख़, सान्या मल्होत्रा, आदित्य रॉय कपूर, रोहित सर्राफ और पर्ली मनी ने अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है। किरदारों की भीड़ होते हुए भी यह एक-दूसरे में खोते नहीं। इसका श्रेय इन कलाकारों की अदाकारी को ही जाएगा कि फ़िल्म ख़त्म होने के बाद सभी याद रह जाते हैं। मलयामल इंडस्ट्री से तालुल्क रखने वाली पर्ली की पहली हिंदी फ़िल्म है और उनकी ओरिजिन मलयाली नर्स श्रीजा थॉमस के किरदार को पूरी तरह सपोर्ट करती है। पर्ली के किरदार का ट्रांसफॉर्मेशन लूडो के हाइलाइट्स में शामिल है। पर्ली की जोड़ी रोहित सर्राफ़ के किरदार राहुल के साथ है। ख़ास बात यह है कि लूडो का कोई पात्र चारित्रिक गुणों को लेकर मुकम्मल नहीं है, सभी में कुछ बुराइयां हैं। असल में उनकी यही बुराइयां लूडो की डार्क कॉमेडी की जान हैं।

लूडो में अनुराग ने भगवान दादा की फ़िल्म 'अलबेला' के 'किस्मत की हवा कभी गरम कभी नरम' गाने का बेहतरीन इस्तेमाल किया है। दरअसल, यह गाना फ़िल्म के कई घटनाक्रमों को जस्टिफाई भी करता है। प्रीतम का संगीत लूडो के रोमांच और कॉमेडी का साथ देता है। लूडो एक मनोरंजक फ़िल्म है। बस देखते समय ध्यान रखिए कि ध्यान ना भटके, क्योंकि ध्यान हटते ही आप लूडो की कोई चाल मिस कर जाएंगे और बाज़ी हाथ से निकल जाएगी। नेटफ्लिक्स ने लूडो को 16 प्लस कैटेगरी में रिलीज़ किया है, मगर उस लिहाज़ से भाषा और कुछ दृश्य बोल्ड हैं।

कलाकार- अभिषेक बच्चन, पंकज त्रिपाठी, राजकुमार राव, आदित्य रॉय कपूर, फातिमा सना शेख, सान्या मल्होत्रा, रोहित सर्राफ़, पर्ली माने आदि।

निर्देशक- अनुराग बसु

निर्माता- भूषण कुमार, दिव्या खोसला कुमार, कृष्ण कुमार, अनुराग बसु आदि।

वर्डिक्ट- *** (3 स्टार)

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