मनोज वशिष्ठ, नई दिल्ली। अमेज़न प्राइम वीडियो पर 29 अक्टूबर को रिलीज हुई इमरान हाशमी और निकिता दत्ता की हॉरर-थ्रिलर फिल्म डिबुक में रोमांच और डर का भाव पैदा करने के लिए ज्यादातर मसाले वही इस्तेमाल किये गये है, जो ऐसी फिल्मों में अक्सर देखे जाते रहे हैं। ज्यूस माइथोलॉजी में प्रचलित डिबुक (Dybbuk) से प्रेरित कहानी जरूर दिलचस्प लगती है, मगर जिस तरह दृश्य दर दृश्य आगे बढ़ती है, इसमें नएपन का एहसास नहीं होता।

सैमुअल आइजैक न्यूक्लियर वेस्ट को सुरक्षित ढंग से ठिकाने लगाने वाली एक कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट ऑपरेशंस है। नए असाइनमेंट के लिए उसे मॉरीशस भेजा जाता है। भिन्न धर्म में शादी करने की वजह से पत्नी माही का परिवार उससे नाराज है। माही अनिच्छा से पति के साथ चली मॉरीशस जाती है, मगर वहां की खूबसूरती और नया घर उसे मोहित कर लेता है।

हेरिटेज थीम पर घर सजाने के लिए माही दूसरे सामान के साथ एक एंटीक बॉक्स घर लाती है, जो असल में एक डिबुक बॉक्स होता है, जिसके अंदर एक शक्तिशाली और विनाशकारी आत्मा (डिबुक) कैद होती है। बॉक्स खोलने पर आत्मा आजाद हो जाती है और घर में पैरानॉर्मल एक्टिविटीज शुरू हो जाती हैं। माही पर इसका ज्यादा असर पड़ता है। एहसास सैम को भी होता है। बचपन में अनाथ होने पर सैम की परवरिश करने वाले पादरी (फादर) उससे मिलने मॉरीशस आते हैं। घर को बाहर से देखते ही फादर को कुछ अजीब लगता है।

डिबुक बॉक्स देखते ही उन्हें सारी कहानी समझ में आ जाती है। डिबुक से मुक्ति के लिए रब्बी का नाम बताते हैं। सैम उनसे मिलता है, मगर इससे पहले वो कुछ कर पाते, मौत हो जाती है। डिबुक से मुक्ति के लिए फादर ज्यूस धर्मगुरु रब्बी बेन्यामिन से संपर्क करने को कहते हैं, जो डिबुक माइथोलॉजी के बारे में कई अहम बातें बताते हैं, मगर इससे पहले कि वो कुछ कर पाते, उनकी मौत हो जाती है। रब्बी का बेटा मार्कस उनकी मदद करने का आश्वासन देता है और सही समय पर मॉरीशस पहुंच जाता है।

डिबुक को वापस भेजने के लिए एक खास तरह के तांत्रिक अनुष्ठान की जरूरत होती है। मार्कस उसकी तैयारी के लिए डिबुक की हिस्ट्री पता करता है। डिबुक असल में अब्राहम एजरा की आत्मा है, जो प्रतिशोध की आग में जल रही है। एक ईसाई लड़की नोरा से प्रेम करने के कारण आइलैंड के कट्टरपंथियों ने उसकी जान लेने की कोशिश की थी। एजरा का पिता याकूब एजरा आइलैंड पर शरण लेने वाले शुरुआती लोगों में से था। एक अमीर और प्रतिष्ठित कारोबारी चेहरे के पीछे वो प्राचीन तांत्रिक विद्या का उपासक और सिद्धहस्त था। एजरा के मरणासन्न स्थिति में पहुंचने पर याकूब उसकी आत्मा को शरीर से अलग करके डिबुक बॉक्स में बंद कर देता है और उसकी लाश को समंदर के बीचोंबीच प्रवाहित कर देता है।

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डिबुक बॉक्स से आजाद होने के बाद एजरा इसी ज्यादती का बदला लेने के लिए वो पूर आइलैंड को खत्म करना चाहता है। जो भी उसके रास्ते में आएगा, उसकी मौत निश्चित है। मारकस पर भी जानलेवा हमला होता है। अपना बदला पूरा करने के लिए डिबुक ने सैम के परिवार को चुना है। यहां एक जबरदस्त ट्विस्ट आता है, जो आप खुद फिल्म में देखिए।

डिबुक एजरा नाम से आयी मलयालम फिल्म का रीमेक है और इसका निर्देशन भी उस फिल्म के निर्देशक जय के ने किया है। पटकथा का क्रेडिट भी जय के को ही दिया गया है। डिबुक का ट्रेलर जब जारी किया गया था, इसके कॉन्सेप्ट ने आकर्षित किया था और एक अलग तरह की हॉरर थ्रिलर फिल्म देखने की उम्मीद जगी थी। डिबुक टुकड़ों में प्रभावित करती है, मगर ऐसे दृश्य कम ही हैं, जो दर्शक को सिहरने के लिए मजबूर कर दें। लगभग आधे घंटे बाद फिल्म रफ्तार पकड़ती है और इंटरेस्ट जगाती है, मगर जल्द ही हॉरर फिल्मों की घिसी-पिटी परिपाटी पर लौट जाती है। हॉरर पैदा करने वाले ज्यादातर दृश्य कई हिंदी और अंग्रेजी फिल्मों में देखे जा चुके हैं।एजरा के रोल में इमाद शाह का इंट्रोडक्ट्री सीन हो या निकिता दत्ता की वश में होने के बाद गतिविधियां। पटकथा अगले दृश्यों का सस्पेंस बनाने में विफल रहती है। 

सबसे ज्यादा ताज्जुब डिबुक को देखकर होता है। उसकी सोच का स्तर देख लगता ही नहीं, आत्मा है, कोई जबरदस्त मास्टरमाइंड लगता है। बदला लेने के लिए वो किसी इंसान की तरह योजना बनाता है। अपने मोहरे चुनता है और जो बात सबसे अजीब लगती है कि वो न्यूक्लियर वेस्ट प्लांट के जरिए आइलैंड को खत्म करने की योजना बनाता है। ऐसी वैज्ञानिक सोच वाली आत्मा शायद ही कभी देखी होगी! क्योंकि, बेहद सुरक्षित न्यूक्लियर वेस्ट फेसिलिटी के अंदर पहुंचने के लिए जिस उन्नत तकनीकी सोच की जरूरत होगी, वो एक वैज्ञानिक आत्मा में ही हो सकती है। फिल्म यहां पूरी तरह पटरी से उतर जाती है। मॉरीशस में न्यूक्लियर वेस्ट प्लांट लगाने का विरोध प्रदर्शन जैसे दृश्यों का कहानी में कोई योगदान नहीं है।

जिस तरह से डिबुक के आतंक और दहशत को फिल्म में बिल्ड-अप करने की कोशिश की गयी है, उसके मुकाबले क्लाइमैक्स बेहद कमजोर लगता है। हॉरर फिल्मों के शौकीन यहां थोड़ा ज्यादा रोमांच की उम्मीद करते हों तो गलत क्या है। अंत के दृश्य भी ऐसे नहीं हैं कि फिल्म खत्म होने पर कुछ देर के लिए वो जहन में अटके रहें। हॉरर फिल्मों में दृश्यों की बुनावट से डर पैदा करने में तकनीकी पक्ष का अहम योगदान होता है। डिबुक का तकनीकी पक्ष कमजोर तो नहीं कहा जाएगा, मगर उतना असरदार भी नहीं है कि आंखें फटी रह जाएं। कैमरा, लाइटिंग, साउंड औसत है।

अभिनय की बात करें तो इमरान हाशमी ऐसी फिल्मों के एक्सपर्ट हैं और कथा, पटकथा के दायरे में उन्होंने ठीक काम किया है। द बिग बुल के बाद निकिता दत्ता इस फिल्म में नजर आयी हैं। निकिता फिल्म में अच्छी लगी हैं और अपनी भूमिका भी ठीक से निभा गयी हैं। मारकस के किरदार में मानव कौल ठीक लगे हैं, मगर उनको देखकर ज्यूस तांत्रिक या धर्मगुरु वाली फीलिंग नहीं आती। फादर के किरदार में डेंजिल स्मिथ, सैम के बॉस संजय के रोल में बिजय आनंद, इंस्पेक्टर रियाज के किरदार में गौरव शर्मा ने ठीक काम किया है। लगभग 1 घंटा 52 मिनट की डिबुक दूसरी हॉरर-थ्रिलर फिल्मों के बीच बस एक और फिल्म है। 

कलाकार- इमरान हाशमी, निकिता दत्ता, मानव कौल, डेंजिल स्मिथ, गौरव शर्मा आदि।

निर्देशक- जय के

निर्माता- कुमार मंगत पाठक, अभिषेक पाठक, भूषण कुमार, किशन कुमार।

अवधि- एक घंटा 52 मिनट।

रेटिंग- **1/2 (ढाई स्टार)

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