नई दिल्ली, जेएनएन। इस हफ्ते रिलीज हुई फिल्म 'दूरदर्शन' को देखकर यही जाहिर होता है कि यह उस समय की बात करती है जब देश में दूरदर्शन के सिवा कुछ नहीं था| एक प्रतीक की तरह निर्देशक गगन पुरी ने 'दूरदर्शन' का इस्तेमाल किया है।

यह कहानी है दिल्ली में रहने वाले एक मध्यमवर्गीय परिवार की जिसमें माता (माही गिल)और पिता( मनु ऋषि चड्ढा) मनमुटाव के चलते अलग-अलग रहते हैं। इस बीच सालों से कोमा में पड़ी दादी( डॉली अहलूवालिया) होश आ जाता है| डॉक्टर कहता है की दादी को पता ना पड़े कि वह सालों के बाद होश में आई है इससे उसे सदमा लग सकता है| ऐसे में 1990 का माहौल पूरे में खड़ा किया जाता है इसके बाद क्या-क्या होता है, यही कहानी है फिल्म 'दूरदर्शन' की है।

फिल्म में जिस जनरेशन ने 'दूरदर्शन' देखा है उनके लिए यादों को ताजा करने का मौका तो है ही साथ ही इस दौरान बदलती हुई संस्कृति परंपरा और सामाजिक रिश्तो में जिस तरह का बदलाव आया है उसे बखूबी दर्शाया गया है!

फिल्म मैं अभिनय की अगर बात करें तो मनु ऋषि और माही गिल की केमिस्ट्री देखने लायक है। मनु ऋषि खुद एक लेखक है इसलिए किरदार को पकड़ना वह बेहतर ढंग से जानते हैं। अपने किरदार पर कई बारीक काम करके उसे सशक्त बनाया है। वहीं दूसरी ओर माही गिल भी एक सशक्त कलाकार हैं। प्रिया और बिल्लो दोनों ही किरदारों उन्होंने अपनी जान फूंक दी है। इसके अलावा राजेश शर्मा, डॉली अहलूवालिया, सुप्रिया शुक्ला, मेहक मनवाणी, सुमित गुलाटी जैसे कलाकार अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।

कुल मिलाकर यह कहा जाए तो गलत नहीं होगा की 'दूरदर्शन' कोई महान फिल्म नहीं है। उसमें कई कमियां भी है बावजूद इसके यह फिल्म आपको कल की मिठास आज का मनोरंजन जरूर देती है। आपको सोचने पर मजबूर कर देती है कि आधुनिकता की जिस रफ्तार में हम चल रहे हैं उसमें हमने क्या खोया क्या पाया।

रेटिंग : 3 स्टार्स

Posted By: Priti Kushwaha

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