मनोज वशिष्ठ, नई दिल्ली। डिज्नी प्लस हॉटस्टार की ताजा पेशकश दिल बेकरार का टाइटल जुबां पर आते ही क्या आप जैकी श्रॉफ और पूनम ढिल्लों की फिल्म तेरी मेहरबानियां का रोमांटिक गीत 'दिल बेकरार था दिल बेकरार है...' गुनगुनाने लगते हैं। अगर जवाब हां है तो आप इस वेब सीरीज को एंजॉय करने वाले हैं, क्योंकि यह सीरीज आपको उस दौर में ले जाती है, जब आज की मिलेनियल पीढ़ी आंखें खोल रही थी या अपने पैरों पर खड़ा होना सीख रही थी।

थर्टीज और फोर्टीज में पहुंच चुकी पीढ़ी के लिए दिल बेकरार यादों का पिटारा है तो उसके बाद पैदा हुई पीढ़ी के लिए उस दौर को समझने का एक जरिया। बजाज स्कूटर का आइकॉनिक विज्ञापन, ब्लैक एंड व्हाइट टीवी की जगह लेता रंगीन टीवी, सिग्नल के लिए छत पर चढ़कर एंटीने को सही दिशा में घुमाते हुए 'आया... नहीं आया...हां आ गया आ गया' की समवेत स्वर में उठतीं आवाजें, रोमांटिक डेट से लेकर मेहमानों की खातिरदारी के लिए गोल्ड स्पॉट पर निर्भरता, सरकारी समाचार चैनल पर बालों में फूल लगाकर समाचार पढ़तीं सलमा सुलतान... अगर आपको याद हैं तो दिल बेकरार आपको आकर्षित करेगी।

ऐसी तमाम बातें जो अस्सी के दौर की अमिट पहचान हैं, इस सीरीज में एपिसोड-दर-एपिसोड सामने आती हैं। राज बब्बर, पूनम ढिल्लों, पद्मिनी कोल्हापुरे और तेज सप्रू जैसे कलाकारों की कास्टिंग इस सीरीज की जान हैं, जो खुद अस्सी के दौर के वेटरन कलाकार रहे हैं।

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अनुजा चौहान के चर्चित उपन्यास द प्राइसी ठाकुर गर्ल्स पर बनायी गयी सीरीज 80 के पारिवारिक, सामाजिक और राजनीतिक हालात पर टिप्पणी करते हुए चलती है। मगर, लेखन की खासियत यह है कि सीरीज के मुद्दे तो उस दौर के हिसाब से हैं, मगर उन पर की गयी टिप्पणी आज के दौर की महसूस होती हैं। दिल बेकरार अपने शीर्षक की पैरवी करते हुए रोमांटिक ड्रामा तो है ही, साथ ही हिस्सों में थ्रिलर का मजा भी देती है।

कहानी का साल 1988 और लोकेशंस- दिल्ली और मुंबई। केंद्र में तीन परिवार हैं। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज एलएन ठाकुर और छोटे भाई एएनठाकुर। एलएन ठाकुर की पत्नी ममता ठाकुर और पांच बेटियां एंजी, बिन्नी, चंदू, डब्बू और ईश हैं। एएन ठाकुर की पत्नी भूदेवी और बेटा गुलगुल है। तीसरा परिवार रिटायर्ड ब्रिगेडियर शेखावत का है।

शेखावत की पत्नी क्रिश्चियन हैं। उनके तीन बेटे हैं। बड़ा बेटा डिलन शेखावत मुंबई के अंग्रेजी अखबार द न्यू पायनियर में रिपोर्टर है। एलएन ठाकुर की बेटी डब्बू यानी देबजानी ठाकुर देश दर्पण चैनल (दूरदर्शन की तर्ज पर) में न्यूज रीडर है। विज्ञापन फिल्मों में काम करती रही डब्बू की यह पहली नौकरी है, जो उसे स्टार बना देती है, जैसा कि उस दौर में दूरदर्शन के न्यूज रीडर्स के साथ होता था। 

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कहानी मुख्य रूप से डिलन और डब्बू के बीच प्रेम और डिलन की इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म पर फोकस करती है। साइड ट्रैक्स में इन तीनों परिवारों की आपसी और एक-दूसरे से संबंधों की समस्याओं का खाका खींचा गया है। एलएन ठाकुर की पांचों बेटियों के जरिए उस दौर की महिलाओं के विभिन्न मानसिक नजरियों को पेश किया गया है।

डिलन के किरदार के जरिए अस्सी के दौर की सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर अखबारी पत्रकारिता और डब्बू के जरिए सरकारी समाचार चैनलों की खबरों की एकरूपता पर कमेंट किया गया है। डिलन और डब्बू की प्रेम कहानी के उतार-चढ़ाव दिखाती सीरीज में दिलचस्प मोड़ तब आता है, जब हेल्थ मिनिस्टर मोटला 1984 में हुए भोपाल गैस लीक कांड की जिम्मेदार कंपनी को देश में निरोध बांटने का कॉन्ट्रेक्ट दिलवाता है और यह स्टोरी डिलन के नाम से फ्रंट पेज पर छपती है। यहां से सीरीज गंभीर हुए बिना पत्रकारिता और स्वार्थी राजनीति के बीच टकराव को दिखाती है। भोपाल गैस कांड पीड़ितों को न्याय दिलाने की कोशिश में इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म करते डिलन को जेल भी जाना पड़ता है, मगर डब्बू और अपने परिवार की मदद से वो इस विकट मुश्किल से बाहर निकलता है और राजनीति में चल रहे भ्रष्टाचार को उजागर करता है। 

दिल बेकरार में लगभग आधे घंटे की अवधि के दस एपिसोड्स हैं। पूरी सीरीज का मिजाज हल्का-फुल्का और मजाकिया है। हबीब फैजल ने अस्सी की दुनिया रचने में उस दौर के चर्चित गानों और फिल्मों का स्क्रीनप्ले में बेहतरीन इस्तेमाल किया है। गोलमाल, मैंने प्यार किया, कयामत से कयामत तक फिल्मों के जरिए दर्शक को कालखंड का इल्म होता रहता है, क्योंकि सीरीज 1988 से शुरू होकर दो-तीन साल आगे के कालखंड का सफर तय करती है।

उस दौर की पुनर्रचना करने में प्रोडक्शन विभाग की तारीफ भी करनी होगी। स्टेब्लिश शॉट्स के तौर पर बीच-बीच में 80s के असली फुटेज का इस्तेमाल दृश्यों को ऑथेंटिक बनाता है। इसके अलावा टेलीफोन, टीवी, कार, स्कूटर, मोटरसाइकिलों से लेकर कॉस्ट्यूम और घरों की साज-सज्जा तक पर प्रोडक्शन ने बारीकी से काम किया है। इस मामले में सीरीज कहीं भी ढीली नहीं लगती।

लेखक जोड़ी सुहानी कंवर और रुचिका रॉय ने संवादों को चुटीला रखा है तो किरदारों को बड़े खूबसूरत रंग दिये हैं और हर एक कैरेक्टर को उसकी चारित्रिक खूबियों और खामियों के साथ पेश किया है। कलाकारों ने भी अपने-अपने किरदारों को उसी शिद्दत से जीया है। चाहे कोर्ट पीस के शौकीन पूर्व जज एलएन ठाकुर के किरदार में राज बब्बर हों या उनकी पत्नी के रोल में पूनम ढिल्लों।

अपनी मेड के साथ गुलछर्रे उड़ाने वाले एएन ठाकुर के किरदार में पंकज कालरा, पति की बेवफाई पर भड़कती और पान चबाते रहने वाली पत्नी भूदेवी के रोल में पद्मिनी कोल्हापुरे ने खूब रंग जमाया है।  खूब जमे हैं। अस्सी के दौर की तकरीबन हर फिल्म में विलेन के किरदार में नजर आने वाले तेज सप्रू को ब्रिडेगियर शेखावत के किरदार में देखना अच्छा लगता है। वेब सीरीज की दुनिया में ग्रे शेड्स किरदारों के स्टेपल बन चुके अक्षय ओबेरॉय डिलन के किरदार में कुछ अलग करते दिखे।

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डिज्नी की ही सीरीज द एम्पायर में नजर आ चुकीं सहर बाम्बा ने डब्बू के तुनकमिजाज मगर आत्मविश्वास से भरे किरदार को बेहतरीन ढंग से जीया है। डिलन के साथ उनकी नोंकझोंक सुहानी लगती है। भ्रष्ट मंत्री के किरदार में चंद्रचूड़ सिंह परफेक्ट लगे हैं। उनके किरदार के जरिए कुछ ऐसी राजनीतिक टिप्पणियां की गयी हैं, जो आज भी प्रासंंगिक हैं। द न्यू पायनियर अखबार के एडिटर और अपने जूनियर सहयोगी के लिए सरकार से मुचैटा लेने की हिम्मत रखने वाले निडर पत्रकार के रोल में सोशलाइट सुहेल सेठ को देखना दिलचस्प है।

पीरियड सीरीज या सिनेमा के तौर पर हमने कई क्राइम, हिस्टोरिकल और पॉलिटिकल ड्रामा देखे हैं, मगर दिल बेकरार के रूप में पीरियड फैमिली कॉमेडी ड्रामा ओटीटी के लिए भी एक नया प्रयोग कहा जा सकता है। वैसे भी ओटीटी की दुनिया में क्राइम का अधिक बोलबाला है, ऐसे में दिल बेकरार जैसी हल्की-फुल्की, रोमांटिक, कॉमेडी वेब सीरीज दिल को करार देती है। 

कलाकार- राज बब्बर, पूनम ढिल्लों, पद्मिनी कोल्हापुरे, तेज सप्रू, अक्षय ओबेरॉय, सहर बाम्बा आदि।

निर्देशक- हबीब फैजल

निर्माता- सोबो फिल्म्स

अवधि- प्रति एपिसोड 30 मिनट

रेटिंग- ***1/2 (साढ़े तीन स्टार)

Edited By: Manoj Vashisth