पुरानी क्लासिक फिल्मों के रीमेक को क्यों नकार देते हैं दर्शक? डायरेक्टर्स ने बताई इसके पीछे की कहानी
देवदास (2002) डॉन द चेज बिगेन (2006) उमराव जान (2006) आग (2007) कर्ज़ (2008) अग्निपथ (2012) हिम्मतवाला (2013) चश्मे बद्दूर (2013) जंजीर (2013) और पति पत्नी और वो (2019) आदि गुज़रे जमाने की क्लासिक फिल्मों के रीमेक हैं।

स्मिता श्रीवास्तव, जेएनएन। देवदास (2002), डॉन: द चेज बिगेन (2006), उमराव जान (2006), आग (2007), कर्ज़ (2008), अग्निपथ (2012), हिम्मतवाला (2013), चश्मे बद्दूर (2013), जंजीर (2013) और पति पत्नी और वो (2019) आदि गुज़रे जमाने की क्लासिक फिल्मों के रीमेक हैं। खास बात यs है कि ये सभी लंबे अंतराल के बाद बनी हैं। डेविड धवन ने अपनी हिट फिल्म ‘जुड़वा’ का रीमेक बनाया। अब करीब 25 साल बाद वो फिर अपनी ही फिल्म ‘कुली नंबर 1’ का रीमेक लेकर आए हैं। इसके बाद ‘चुपके-चुपके’, ‘अंगूर’, ‘राम लखन’ और ‘वो कौन थी’ जैसी फिल्मों के रीमेक बनाने की भी चर्चा है।
‘डी डे’, ‘सत्यमेव जयते’ जैसी फिल्मों की निर्माता मोनिशा आडवाणी फिल्म ‘हीरो’ के निर्माण से भी जुड़ी थीं। सुभाष घई निर्देशित ‘हीरो’ के रीमेक का निर्देशन उनके भाई निखिल आडवाणी ने किया था। इस फिल्म से आदित्य पंचोली के बेटे सूरज पंचोली और सुनील शेट्टी की बेटी अथिया शेट्टी को लॉन्च किया गया था। मोनिशा कहती हैं, ‘हीरो की रीमेक से जुड़कर हम खुश थे। रीमेक की कहानी मूल फिल्म से काफी मिलती-जुलती थी। मैं खुद मूल फिल्म की फैन रही हूं। दुनियाभर में रीमेक का चलन है। सुपरमैन फ्रेंचाइजी को देखें कितने कलाकारों ने उसे अलग-अलग दौर में जिया है। एक तरफ मौलिक फिल्मों की अहमियत है, वहीं रीमेक भी चलती हैं। रीमेक करने के वाले क्रिएटर, लेखक और निर्देशक यह सुनिश्चित करते हैं कि आप उसे कैसे बनाने वाले हैं। जैसे रोहित शेट्टी ने ‘गोलमाल’ को अलग एंगल दिया था। ऑडियंस जब टिकट खरीदती है तो सिर्फ यह देखती है कि हमें यह फिल्म एंटरटेन करने वाली है या नहीं।’
फिल्ममेकर्स का कहना है कि फिल्मों की सफलता का कोई फार्मूला नहीं होता है। फिल्ममेकिंग अनिश्चित बिजनेस है। आपको वर्तमान समय के साथ चलना पड़ता है साथ ही आपको पता हो कि ऑडियंस को क्या पसंद आ रहा है, क्या पसंद आएगा और क्या पसंद था? दर्शक क्या पसंद करेंगे, क्या नहीं, इसका किसी को अंदाजा नहीं होता। अब तक सिर्फ एक असफल फिल्म ‘अग्निपथ’ का रीमेक हुआ है, जिसका रीमेक सफल रहा था। हालांकि इन फिल्मों को लंबे अंतराल के बाद बनाया गया।
साल 1983 में रिलीज जीतेंद्र और श्रीदेवी अभिनीत ‘हिम्मतवाला’ का रीमेक एक लंबे अंतराल के बाद बनाने को लेकर साजिद खान कहते हैं, ‘मुझसे जब भी पांच पसंदीदा फिल्मों के बारे में पूछा गया उसमें ‘हिम्मतवाला’ का नाम शुमार रहा है। बचपन में करीब 38 बार इसे थिएटर में देखा था। मैं ‘हिम्मतवाला’ का बहुत बड़ा फैन था। मेरे ख्याल से 1983 में इसने इंडस्ट्री का पूरा रुख पलटा था। इसके पहले फिल्म को बनाने में दो से तीन साल लगते थे। साउथ से फिल्ममेकर्स के. राघवेंद्र राव आए थे। जितेंद्र, कादर खान, शक्ति कपूर और असरानी के साथ टीम बनाकर वह जल्दी-जल्दी फिल्म बनाते थे’।
‘उस समय फिल्मों की बाढ़ जरूर आ गई थी, लेकिन सिनेमा की क्वालिटी में गिरावट आई थी। ‘हिम्मतवाला’ में मस्ती, बेवकूफियां और लार्जर दैन लाइफ होने के साथ इसमें सुपरहिट गाने थे। मुंबई में यह ब्लॉकबस्टर थी। अजय देवगन और मैं बात कर रहे थे। मैंने कहा कि ‘हिम्मतवाला’ मेरी पसंदीदा फिल्म है। उन्होंने कहा कि चलो बनाते हैं। उस फिल्म में मेरे डैड ने एक्शन किया था। अजय ने कहा कि ‘हिम्मतवाला’ में इतनी सारी चीजें हैं जो वर्तमान की पीढ़ी को पसंद नहीं आएंगी। हमने तय किया कि फिल्म को 1983 में ही सेट करते हैं। आप बहुत सारी सिनेमैटिक लिबर्टी ले सकते हैं। बहरहाल, रीमेक से ज्यादा रीराइट था ‘हिम्मतवाला’ में।
रीमेक फिल्मों की स्वीकृति को लेकर साजिद कहते हैं, ‘इसके दो पहलू हैं। अगर मैं डेविड धवन का उदाहरण दूं तो उन्होंने अपनी फिल्म ‘जुड़वा’ का रीमेक ‘जुड़वा 2’ बनाया। फिल्म एकसमान थी बस कलाकार बदल गए थे, लेकिन फिल्म सफल रही थी। दरअसल, पुरानी ‘जुड़वां’ के फैन नई फिल्म को देखने आएंगे। वहीं वरुण धवन के फैन उनकी फिल्म को देखने आएंगे। यह एक पहलू है। दूसरा उस कहानी में आप क्या बदलाव लाएंगे और उस कहानी को दोबारा कहना कितना जरूरी है’।
‘मैंने और अजय ने चर्चा कि थी कि हम एक्शन फिल्म बना रहे हैं। मूल ‘हिम्मतवाला’ में ज्यादा एक्शन नहीं था। वह सोशल फिल्म थी। हमने एक्शन भरपूर डाला। उस वक्त ‘हिम्मतवाला’ के पचास लाख में अधिकार खरीदे गए थे। जब हमारा फाइनल स्क्रिप्ट लॉक हुआ था तो निर्माता वासु भगनानी ने कहा था कि मेरे पचास लाख क्यों खर्च करा दिए यह तो अलग फिल्म है। मैं जब हैदराबाद में शूटिंग कर रहा था तो मूल निर्देशक राघवेंद्र राव से मिलने भी गया था। वह साउथ के मनमोहन देसाई माने जाते हैं। मैंने उनका आशीर्वाद लिया था। उन्होंने कहा था कि अपनी कहानी पर फोकस रखो। बाकी चीजों पर ध्यान मत दो, पर हमारी फिल्म की तीखी आलोचना हुई। बहुत गाली पड़ी, पर बिजनेस के लिहाज से किसी को नुकसान नहीं हुआ था।’
अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म ‘जंजीर’ की रीमेक का निर्देशन अपूर्व लखिया ने किया था। वह भविष्य में क्लासिक फिल्मों का रीमेक बनाने से तौबा करते हैं। इसकी वजह बताते हुए वह कहते हैं, ‘मेरा अनुभव यही है कि क्लासिक फिल्म का रीमेक बनाना ही नहीं चाहिए। क्या होता है कि आइकोनिक फिल्म में कुछ अलग करो उसकी तुलना होगी ही। यह मेरा निजी अनुभव है। ‘जंजीर’ के समय भी मैंने कहा था कि रीमेक बनाने का फैसला मैंने इसलिए किया, क्योंकि ‘जंजीर’ मेरी पसंदीदा फिल्म थी। जब मुझे अप्रोच किया गया तो रामचरण को भी हिंदी इंडस्ट्री में लॉन्च करना था। मेरे पास स्टार कास्ट अच्छी थी। मुङो लगा कि मेरे पास अच्छा प्रोजेक्ट है। मेरा टिब्यूट होगा मूल फिल्म को। मैंने ईमानदारी से काम किया, लेकिन लोगों को पसंद नहीं आई। मेरी उम्र के लोग हैं या जिन्होंने मूल फिल्म देखी है वह ‘जंजीर’ की तुलना करते रहे। हालांकि अग्निपथ जैसी कुछ फिल्में चली भीं, मगर अब मैं कभी रीमेक नहीं बनाऊंगा।
क्लासिक फिल्मों के बॉक्स ऑफिस को लेकर ट्रेड एनालिस्ट अतुल मोहन कहते हैं, ‘जैसे ही किसी पुरानी फिल्म के रीमेक की घोषणा होती है, तब से लेकर उसके बनने तक वह चर्चा में बनी रहती है। रीमेक के समय में एक से दो पीढ़ी का अंतर भी आ जाता है। हो सकता है कि नई पीढ़ी पुरानी फिल्मों को न देखना चाहे। अगर उस कहानी को उनके पसंदीदा कलाकारों के जरिए बताया जाए तो शायद ऑडियंस उसकी बन जाती है। हमने अभी तक यही पाया है कि पुरानी क्लासिक फिल्मों के रीमेक को दर्शकों ने ज्यादातर नकार दिया है। ‘जुड़वा’ और ‘देवदास’ जैसी चंद फिल्में अपवाद हैं। जहां तक फिल्मों की तुलना की बात है, अगर फिल्ममेकर्स तुलना करना पसंद नहीं करते हैं तो उन्हें रीमेक नहीं बनाना चाहिए। अगर आप किसी शानदार फिल्म का रीमेक बना रहे हैं तो तुलना से बच नहीं पाएंगे। ऐसे में शिकायत क्यों करनी’।
आमिर खान अभिनीत फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ हॉलीवुड की क्लासिक फिल्म ‘फॉरेस्ट गंप’ की रीमेक है। कलाकारों की कास्टिंग को लेकर इसके कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा कहते हैं, ‘सिर्फ क्लासिक फिल्मों के रीमेक की नहीं हर फिल्म की कास्टिंग मुश्किल होती है। हर निर्देशक का अपना नजरिया होता है। मैंने खुद ‘दिल बेचारा’ का निर्देशन किया था। यह फिल्म हॉलीवुड की फिल्म ‘द फॉल्ट इन आवर स्टार्स’ की आधिकारिक रीमेक थी। फिलहाल ‘लाल सिंह चड्ढा’ के बारे में अभी बात नहीं कर पाऊंगा।
फिल्मों की सफलता का कोई फार्मूला नहीं होता है। निर्माता नई कहानियों के साथ हिट फिल्मों के रीमेक बनाने में खासी दिलचस्पी लेते हैं। यह चलन अर्से से चला आ रहा है। हालांकि पिछले कुछ अर्से से क्लासिकल फिल्मों के रीमेक बनाने का चलन आरंभ हुआ है। पुरानी हिट फिल्मों को नए रंग रूप में बनाया जा रहा है।
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