नवनीत शर्मा, जेएनएन। 22 जुलाई 1923 को जन्मे स्वर्गीय मुकेश ने सन् 1945 में संगीत की दुनिया में कदम रखा था। उसके बाद के तीन दशकों तक वो बेहद लोकप्रिय रहे। उन्होंने फिल्मी और गैर फिल्मी गानों के अलावा उर्दू, पंजाबी और मराठी गानों को भी अपनी आवाज से सजाया। मुकेश की जन्मतिथि पर नवनीत शर्मा का विशेष आलेख...

‘मेरे सामने दस हल्के गीत हों, एक उदासी से भरा हो, तो मैं दस गीत छोड़ दूंगा और उदास गीत को चुनूंगा।’ ऐसा कहते थे मुकेश चंद्र माथुर, जो आज तक सबके लिए मुकेश के रूप में ही पर्याप्त हैं, लेकिन प्रतिभा का उत्कर्ष देखें... उदासी भरे गीतों के लिए नर्म दिल रखने वाले मुकेश ने हर प्रकार के गीत गाए और खूब गाए। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मोती लाल ने उन्हें सलाह दी था कि वह अपना अंदाज चुनें।

मुकेश के शुरुआती गीत बताते हैं कि वह कुंदन लाल सहगल से कितने प्रभावित थे। ‘दिल जलता है तो जलने दे’ सुनकर कई पीढ़ियां यही सोचती रहीं कि इसे के.एल. सहगल ने गाया है, लेकिन यह मुकेश थे। बाद में जब अपना अंदाज तलाशा तो उनकी रेंज ने ऐसा विस्तार पाया कि दिल्ली के लोक निर्माण विभाग में काम करने वाले और आवाज रिकॉर्डकर रिश्तेदारों को भेजने वाले मुकेश देशभर की आवाज बन गए। स्वर्गीय राज कपूर हों या दिलीप कुमार, देव आनंद हों या शम्मी कपूर, राजेश खन्ना या महानायक अमिताभ बच्चन हों...सब पर मुकेश ऐसे फबे कि इतिहास बन गया।

मुकेश ने ‘क्या खूब लगती हो’ और ‘धीरे धीरे बोल कोई सुन न ले’ जैसे शरारती गीत भी गाए। साथ ही ‘जाने कहां गए वो दिन’ और ‘जीना यहां, मरना यहां’ जैसे गाने भी गाए। फिर मुकेश के अंदर के बेहद उदासीपसंद गायक ने ‘चल री सजनी अब क्या सोचे’ और ‘आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें’ जैसे गाने भी दिए। मुकेश ने ही कुछ सदाबहार संदेश वाले गीत भी गाए जो आज भी प्रासंगिक हैं, जैसे- ‘सजन रे झूठ मत बोलो’ और ‘इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल’।

यह मुकेश ही थे जो एक तरफ ‘ईचक दाना, बीचक दाना, दाने ऊपर दाना’ गा सके तो दूसरी ओर ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ जैसा बेहद संजीदा गीत हमें दे गए। अस्ताचलगामी सूरज का दृश्य बनाते इस गीत में मुकेश की आवाज ने बेहद शानदार गाढ़ा रंग भरा। इस गीत के अर्थ विजुअल देखकर कुछ और बनते हैं और ऑडियो सुनने पर कुछ और। श्रीरामचरितमानस के लिए रविंद्र जैन की संगीत सेवा एक नजीर है पर हम उस पीढ़ी के लोग हैं जिनका रामायण से परिचय या तो दादा जी ने करवाया या फिर रेडियो के माध्यम से मुकेश ने। विशेष रूप से वन गमन और भरत मिलाप को गाते हुए मुकेश उन्हीं उदास नोट्स से काम लेते करुणा जगाते हैं, मन पर जमी रेत को खुरचते हैं और हमें कुछ सात्विक एवं शाश्वत मूल्यों के दर्शन होते हैं।

वास्तव में मुकेश की आवाज कई पीढ़ियों की आवाज है जो तलत महमूद और हेमंत कुमार के बीच का स्वतंत्र टापू है। इसका विस्तार रेंज और विविधता में झलकता है। यह आवाज हर आदमी को  इतना खुश कर देती है कि वह भी गुनगुना उठे। किसी आवाज में आमंत्रण की यह कशिश बहुत कम देखी जाती है। राज कपूर अकारण उन्हें अपनी आवाज नहीं बताते थे। राज कपूर ने कहा था- ‘अगर मैं जिस्म हूं तो मुकेश मेरी आत्मा।’ बेशक मुकेश ने हर संगीतकार के साथ काम किया, जिनमें नौशाद, कल्याण जी-आनंद जी, खय्याम, लक्ष्मीकांत-प्यारे लाल हैं, लेकिन शंकर-जय किशन के साथ उनकी जो रूहदारी बनी, वह राज कपूर, नर्गिस दत्त के हवाले से भी अमिट इतिहास है। ‘रमैया वस्तावैय्या’, ‘आवारा हूं’ और ‘मेरा जूता है जापानी’ जैसे गीत अब भी पूरे अमरत्व के साथ गूंजते हैं।

प्रसंगवश भारत में ‘मेरा जूता है जापानी’ जैसे गीत को खास मौके पर तो बजाया जा सकता था, लेकिन आकाशवाणी से इसके प्रसारण पर रोक थी। तरुण श्रीधर लिखते हैं, ‘1950 के बाद तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री डा. बालकृष्ण विश्वनाथ केस्कर ने संस्कृति प्रदूषित होने के डर से फिल्मी गीतों के प्रसारण पर रोक लगा रखी थी।’ जाहिर है रेडियो सिलोन के दिन बहुर गए। आज असहिष्णुता का उच्चारण करने वालों को याद रखना चाहिए कि 1950-60 तक भारतीय फिल्मी संगीत श्रीलंका के माध्यम से सुना गया।