मुंबई, स्मिता श्रीवास्तव व प्रियंका सिंह। शिक्षक व विद्यार्थी के रिश्ते को खूबसूरती से बयां करती हैं हमारी फिल्में। फिल्म ‘इकबाल’ में एक जुनूनी मूक बधिर लड़का क्रिकेटर बनना चाहता है। उसके सपनों को उड़ान तब मिलती है, जब पूर्व क्रिकेटर बतौर कोच उसके हुनर को मांजते हैं। ‘तारे जमीं पर’ में आर्ट टीचर को डिस्लेक्सिया बीमारी से पीड़ित बच्चे की परेशानी समझकर उसे दूर करने की कोशिश करते दिखाया गया। शिक्षक दिवस (5 सितंबर) पर शिक्षक की अहमियत को रेखांकित करती फिल्मों के निर्माण के पीछे फिल्मकारों, कलाकारों की सोच व उनकी सफलता के गणित की पड़ताल की स्मिता श्रीवास्तव व प्रियंका सिंह ने...

गुलजार निर्देशित फिल्म ‘परिचय’ में शरारती बच्चों को घर पर शिक्षा देने आए मास्टर द्वारा सही राह पर ले आना हो या ‘3 इडियट्स’ में इंजीनियरिंग कालेज के डीन वीरू सहस्त्र बुद्धे की लाइफ को लेकर यह शिक्षा हो कि लाइफ एक रेस है, अगर तेज नहीं भागोगे तो टूटे हुए अंडे की तरह हो जाओगे या इसी फिल्म से फुंगसुक वांगडू यानी आमिर खान के किरदार का डायलाग हो कि कामयाब होने के लिए नहीं, काबिल होने के लिए पढ़ो, इनके जरिए विद्यार्थियों के जीवन में शिक्षकों के योगदान को रेखांकित किया गया है। बिहार के आनंद कुमार ने गरीब, प्रतिभावान और महत्वाकांक्षी बच्चों को आईआईटी की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कराने के लिए सुपर 30 की नींव रखी थी। इस पर आधारित फिल्म ‘सुपर 30’ में रितिक रोशन ने आनंद कुमार का किरदार निभाया था। उन्होंने दिखाया था कि शिक्षा कैसे वंचित वर्ग के लोगों की किस्मत बदल सकती है। जीवन को अपनी जिंदगी का बेस्ट टीचर मानने वाले रितिक का कहना है, ‘शिक्षक देश के विचारों को बदलने का काम कर सकते हैं। अगर आपको बेहतर देश और समाज की कामना है तो बच्चों के मस्तिष्क में अच्छे विचारों को बोना पड़ेगा। यह काम एक शिक्षक ही कर सकता है।’

पवित्र है शिक्षक और विद्यार्थी का रिश्ता:

फिल्म ‘हिचकी’ में टारेट सिंड्रोम से पीड़ित टीचर को अपनी खामियों को दरकिनार करते हुए गरीब तबके के बच्चों को समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास करते हुए दिखाया गया था। इस फिल्म के निर्देशक सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा कहते हैं, ‘यह जानर मेरे दिल के करीब है। शिक्षा पर ही आधारित एक और फिल्म पर काम कर रहा हूं। मेरे लिए गुरु का स्थान सर्वोपरि है। मैं उस्ताद सुल्तान खान साहब और उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान साहब का शागिर्द हूं। यह रिश्ता बहुत शुद्ध होता है। रानी का किरदार टारेट सिंड्रोम को अपना दोस्त बना लेता है। यह फिलासफी जिंदगी का नजरिया सकारात्मक कर देती है। फिल्म में यह भी दिखाया गया कि योग्यता, किसी क्लास या स्टेटस से नहीं आती है। योग्यता शिक्षा और ज्ञान पाने की ललक से आती है। शिक्षा देना शिक्षक की जिम्मेदारी होती है। जो राह दिखाता है, वही काबिल बना सकता है। जिंदगी जीने के मायने इंसान को विपरीत परिस्थितियों से

जूझने से मिलते हैं। ऐसी फिल्में आम से खास हो जाती हैं। शिक्षा पर बनी ‘इम्तिहान’, ‘तारे जमीं पर’ जैसी फिल्मों ने असर छोड़ा है।’

जिम्मेदारी है इस विषय पर फिल्म बनाना:

शिक्षा में व्यवसाय कैसे अपने पैर पसार रहा है, इस मुद्दे को फिल्म ‘चाक एन डस्टर’ के निर्देशक जयंत गिलाटर ने दिखाने की कोशिश की थी। इस फिल्म की कहानी उनके लेखक की पत्नी जिस स्कूल में पढ़ाती हैं, उससे प्रेरित थी। जयंत शिक्षकों की परिस्थिति पर फिल्म बनाने को लेकर कहते हैं, ‘बाहरी दुनिया की समझ एक शिष्य को बिना शिक्षकों के नहीं मिल सकती है। ऐसे में इन फिल्मों को बनाते समय ध्यान रखना पड़ता है। टीचर्स और स्टूडेंट के रिश्ते को गलत तरीके से नहीं दिखाया जा सकता है। जब मेरे लेखक ने मुझे मी शिक्षिका टाइटल सुनाया था, तभी मैं इस कहानी को बनाने के लिए उत्सुक था। उनकी पत्नी के स्कूल में हार्ट अटैक आने पर टीचर को निकाल दिया जाता है। मुझे लगा टीचर्स के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए। उनकी दिक्कतों को मैंने अपनी फिल्म में दिखाने की कोशिश की। मैं एक और विषय पर काम कर रहा हूं, जो शिक्षकों पर ही है। अब विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ कोई न कोई स्किल सिखाने पर भी ध्यान दिया जाता है। स्पोट्र्स के कोच भी गुरु ही होते हैं। मैंने फुटबाल कोच पर गुजराती फिल्म ‘फुटबाल 11’ बनाई, जिसमें डेजी शाह हैं। फिल्म की कहानी जुवेनाइल क्रिमिनल्स पर है कि कैसे शिक्षक उनके माइंडसेट को बदलता है।’

कमर्शियल होने का दबाव नहीं:

शिक्षकों से जुड़ी कई कहानियों पर फिल्में बनाने का स्कोप होता है, यह मानना है निर्देशक मिलिंद उके का, जिन्होंने शाहिद कपूर और नाना पाटेकर अभिनीत फिल्म ‘पाठशाला’ का निर्देशन किया है। वह कहते हैं, ‘टीचर्स और स्टूडेंट पर कई सच्ची कहानियां हैं, जो दिलचस्प हैं। जैसे एक बहुत छोटी जगह के एक शिक्षक को एक जाब मिली, जिसके लिए उसे रोजाना 40 किलोमीटर का सफर साइकिल से तय करना पड़ता था। वह जिस गांव में पढ़ाने जाता था, वहां रजिस्टर पर 10-15 विद्यार्थियों के नाम थे, लेकिन स्कूल में केवल एक विद्यार्थी पढ़ने आता था। एक बच्चे के लिए उसे रोजाना 40 किलोमीटर साइकिल चलानी पड़ती थी, क्योंकि अगर वह बच्चा भी स्कूल नहीं आया तो उसकी नौकरी चली जाएगी। पेड़ के नीचे चल रहे स्कूल पर जब सरकार की नजर इस कहानी की वजह से पड़ी तो बदलाव आया। अब वहां 30-40 विद्यार्थी पढ़ते हैं। एक इंसान का यह समर्पण देखने लायक होता है। मैंने कई यूरोपियन, अमेरिकन, लैटिन अमेरिकन, रशियन फिल्में देखी हैं, जो सिर्फ टीचर या शिक्षा व्यवस्था के आसपास बनाई गई हैं। जब मैंने साल 2010 में ‘पाठशाला’ बनाई थी, तब उस विषय पर फिल्म बनाना एक रिस्क ही था, लेकिन स्कूल, टीचर्स-स्टूडेंट पर बनी कहानियों का असर अभिभावकों पर बहुत होता है। अगर उनके मुद्दों को सही तरह से फिल्म में रखा जाए तो वे फिल्में देखना चाहते हैं। हमारी जनसंख्या का बड़ा हिस्सा पठन-पाठन से जुड़ा है। ऐसे में इन फिल्मों की कमर्शियल वैल्यू है। खुद कलाकारों की दिलचस्पी फिल्म में बढ़ जाती है। शाहिद पहले इस फिल्म से बतौर मेहमान जुड़े थे, लेकिन कहानी सुनने के बाद वह इस फिल्म का हिस्सा बन गए।’

‘इकबाल’ आज बनती तो 100 करोड़ के क्लब में जाती:

फिल्म में क्रिकेटर बनने की चाह रखने वाले युवक के सपने तब पूरे होते हैं, जब उसे एक समर्पित कोच मिलता है। फिल्म ‘इकबाल’ में मुख्य भूमिका निभाने वाले अभिनेता श्रेयस तलपड़े कहते हैं, ‘मैं रंगमंच का कलाकार हूं। वहां से मुझे यही सीख मिली है कि एक कलाकार जीवनभर एक विद्यार्थी ही रहता है। जब मैंने अपने कुछ दोस्तों से कहा था कि मैं ‘इकबाल’ फिल्म में काम कर रहा हूं तो उनका कहना था कि फिल्म में न मैं बोल रहा हूं, न डायलाग्स हैं, न गाने हैं, न हीरोइन है, इसमें काम करके क्या फायदा। मेरा मानना था कि ऐसा किरदार कम एक्टर्स की किस्मत में आता है। फिल्म में नसीरुद्दीन शाह सर, निर्देशक नागेश कुकुनूर सर से जो सीख मिली, वह यह थी कि एक एक्टर का रियाज सुबह आंख खुलने के साथ शुरू होता है और शाम को सोने के बाद बंद होता है। उस दौरान आप जितनी चीजों का अनुभव करते हैं, उसका इस्तेमाल अपने काम में करें। लोग कहते हैं कि अगर आज ‘इकबाल’ जैसी फिल्म बनती तो 100 करोड़ के क्लब में जरूर शामिल होती। मैं आज भी अपने रंगमंच के गुरुओं के संपर्क में हूं। मैं अमिताभ बच्चन साहब को भी अपनी प्रेरणा मानता हूं। उनके अंदर आज भी सीखने की भूख है। रंगमंच पर काम करते हुए मैंने अपने व्यवहार में उतारा है कि किसी भी काम में 100 फीसद देना है। जब कोई कहता है कि वह मेरे काम को देखकर सीख रहा है तो जिम्मेदारी का एहसास होने लगता है।’

Edited By: Priti Kushwaha