स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई।  हाल ही में सोनी लिव पर रिलीज वेब सीरीज महारानी में वीर सेना के कमांडर कुंवर सिंह के किरदार में नजर आए अभिनेता सुशील पांडे के अभिनय की खासी सराहना हो रही है। इस वेब सीरीज के क्रिएटिव सुभाष कपूर हैं, जिनके साथ सुशील 'फंस गए रे ओबामा', 'जॉली एलएलबी' जैसी फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं। उनके साथ हुई बातचीत के कुछ अंश।

महारानी वेब सीरीज से कितनी उम्मीदें पूरी हुई हैं?

ईमानदारी से कहूं तो मैंने इतनी बड़ी उम्मीदें नहीं बांधी थीं। सुभाष कपूर जी ने मुझे फंस गए रे ओबामा और जॉली एलएलबी में कास्ट किया था। उन फिल्मों से मुझे इंडस्ट्री में छोटी- मोटी पहचान मिलने लगी। जब उन्होंने महारानी में मेरा किरदार सुनाया, तो पांच मिनट के लिए मैं सोच में पड़ गया था, क्योंकि मुझे ऐसे किरदार में लेने के बारे में पहले किसी ने सोचा नहीं था।

आप खुद बिहार से ताल्लुक रखते हैं, ऐसे में वहां की नक्सली समस्या से वाकिफ होंगे। किरदार को समझना आसान हो गया होगा?

मैंने स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद अपनी रिसर्च की थी। मैं कुछ दिनों के लिए बाहर चला गया था। वहां कुछ लोगों से मिला। मेरे किरदार कुंवर सिंह में इतना क्रोध क्यों है, उसे समझना था। मुझे इस किरदार में जाने के लिए एक ट्रिगर चाहिए था, जो मुझे बिहार जाकर मिला।

इस वेब सीरीज से आपको जो लोकप्रियता मिल रही है, उसकी चाह यकीनन करियर के शुरुआती दौर से रही होगी?

मैं बिहार के सीवान से ताल्लुक रखता हूं। पिताजी कृषि विभाग में नौकरी करते थे, इसलिए उनकी पोस्टिंग गया में हो गई थी। हम गया में ही सेटल हो गए। वहां पर आज भी थिएटर का कल्चर है। रामलीला, कृष्णलीला होती है। जब मैं छोटा था, तब भी त्योहार के दौरान पौराणिक कहानियों पर नाटक खूब होते थे। मैं हमेशा से अभिनय करना चाहता था, लेकिन मैं जहां से ताल्लुक रखता हूं, वहां पर अभिनय को पेशा नहीं समझा जाता। बचपन में वीसीआर पर हमारे मोहल्ले में फिल्में दिखाई जाती थीं। बच्चों को टिकट एक रुपये, बड़ों की टिकट दो रुपये होती थी। रातभर में मैं तीन फिल्में देख लेता था। गंगा जमुना सरस्वती और दलाल के बाद जब मुजरिम फिल्म देखी, तो लगा कि बस बुरे लोगों को मारना है और हीरो बनना है। फिर किसी और पेशे के बारे में सोचा ही नहीं।

अभिनय को पेशा बनाना कितना मुश्किल रहा?

मैं नोवीं- दसवीं क्लास से ही थिएटर में काफी सक्रिय था, लेकिन दसवीं क्लास में पिताजी का देहांत हो गया। वहां से जिम्मेदारी का अहसास हुआ। मां मुझे लेकिर चिंतित रहती थीं। वह कहती थीं कि पढ़ो- लिखो नाटक कब तक करोगे। फिर मैंने होटल मैनेजमेंट का कोर्स किया। कैंपस सिलेक्शन में ताज होटल में काम मिल गया। गोवा जाकर नौकरी की, लेकिन मजा नहीं आ रहा था। एक महीने में वहां भी थिएटर ढूंढ लिया। वहां कोंकणी और अंग्रेजी में नाटक होता था। मैंने कहा बैकस्टेज या वर्कशॉप कुछ भी कर लूंगा। दो साल ऐसे ही चलता रहा। फिर नौकरी छोड़कर दिल्ली आकर थिएटर करने लगा। वहां से मुंबई के पृथ्वी थिएटर पहुंचा। दिनभर पृथ्वी में बैठा रहता था। फिर टीवी में छोटे- छोटे रोल मिलने लगे। साल 2010 में 'फंस गए रे ओबामा' फिल्म में बड़ा ब्रेक मिल गया। जॉली एनएनबी फिल्म के बाद लाइफ आसान हो गई।

आप आर्टिकल 15 के बाद फिर से अनुभव सिन्हा की फिल्म अनेक में काम कर रगे हैं...

हां, लेकिन अभी बहुत ज्यादा नहीं बता पाऊंगा। अनेक एक एक्शन ड्रामा है। नॉर्थ ईस्ट में कहानी सेट की गई है।

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