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    Panipat: अब्दाली भी हुआ था मराठा सैनिकों की वीरता का कायल, पर्दे पर दिखी 1761 के युद्ध की झलक

    By Ruchi VajpayeeEdited By:
    Updated: Fri, 14 Jan 2022 01:59 PM (IST)

    मराठे अश्वसेना और तोपखाने की दृष्टि से बेहतर थे जबकि अब्दाली की पैदल सेना बेहतर थी। इतिहासकारों के मुताबिक मराठा सेना के पास ठंड से बचने के लिए पर्याप्त गरम कपड़े भी नहीं थे जबकि अब्दाली के सैनिकों के पास चमड़े के कोट थे।

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    Image Source: Film Panipat Poster on social media

    स्मिता श्रीवास्तव,मुंबई। भारतीय इतिहास की धारा बदलने वाला पानीपत का तीसरा युद्ध 14 जनवरी, 1761 को अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली की फौज और सदाशिव राव भाऊ के नेतृत्व में मराठों के बीच लड़ा गया। इस युद्ध में भले ही मराठों को पराजय मिली, लेकिन उनकी बहादुरी का लोहा अब्दाली ने भी माना। उस युद्ध पर वर्ष 2019 में फिल्म ‘पानीपत’ का निर्माण करने वाले आशुतोष गोवारिकर मानते हैं कि स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के मौके पर उन वीर सपूतों को नमन करने के साथ ही भारतीय इतिहास की ऐसी शौर्यगाथाओं को सिनेमा के जरिए उकेरना आवश्यक है...

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    मराठे हार गए थे युद्ध

    इतिहास में पानीपत युद्ध स्थल के रूप में विख्यात है। यहां लड़़े गए तीन युद्ध भारतीय राजनीति और शासन तंत्र में आमूलचूल बदलाव का कारण बने। इनमें से पानीपत का तीसरा युद्ध भारतीय इतिहास की अहम घटना मानी जाती है। यह युद्ध 14 जनवरी, 1761 को अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली की सेना और सदाशिव राव भाऊ के नेतृत्व में मराठों के बीच लड़ा गया। इसमें अवध के नवाब शुजाउद्दौला और उत्तर भारत के दोआब क्षेत्र के रोहिला सरदार नजीबुद्दौला भी ने अहमद शाह अब्दाली का साथ दिया था। कुछ देसी शासकों के विश्वासघात, कुछ रणनीतिक गलतियों और रसद तथा दूसरे संसाधनों की कमी के कारण मराठों को इस युद्ध में हार का सामना करना पड़ा।

    अब्दाली भी हुआ माराठों की वीरता का कायल

    युद्ध में मराठों की कुल सेना 45 हजार थी और अब्दाली के पास करीब 65 हजार सैनिक थे। मराठे अश्वसेना और तोपखाने की दृष्टि से बेहतर थे, जबकि अब्दाली की पैदल सेना बेहतर थी। इतिहासकारों के मुताबिक मराठा सेना के पास ठंड से बचने के लिए पर्याप्त गरम कपड़े भी नहीं थे, जबकि अब्दाली के सैनिकों के पास चमड़े के कोट थे। पानीपत हमेशा से दिल्ली का प्रवेश द्वार था। उत्तर-पश्चिम से कोई भी आक्रामणकारी जो दिल्ली पर कब्जा करना चाहता था उसे खैबर दर्रे और फिर पंजाब से होकर आना पड़ता था। युद्ध में भले ही मराठा हार गए, लेकिन उनके अदम्य साहस का कायल अहमद शाह अब्दाली भी हुआ। उसने अपने साथियों को लिखे पत्र में मराठा सैनिकों की वीरता का जिक्र किया था।

    फिल्म 1761 के युद्ध की झलक

    उसने लिखा था कि मराठा सैनिकों ने शानदार पराक्रम दिखाया। उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी। वो अपनी मातृभूमि से दूर थे, उनके पास खाने की कमी थी, लेकिन उनके शौर्य में कमी नहीं आई। फिल्म ‘पानीपत’ में अर्जुन कपूर ने सदाशिवराव भाऊ व कृति सैनन ने उनकी पत्नी पार्वतीबाई का किरदार निभाया था। अर्जुन कपूर के अनुसार, बतौर दर्शक पानीपत की लड़ाई हुई थी यह मुझे पता था, लेकिन इसके बीच में क्या हुआ था यह नहीं पता था। हमको सिर्फ नतीजा और जंग दिखती है, लेकिन उसके सफर के बारे में नहीं पता होता। इस फिल्म के जरिए बहुत से लोगों को पता चला होगा कि हिंदुस्तान के नक्शे को बरकरार रखने में मराठा साम्राज्य की कितनी अहमियत थी।

    पीरियड फिल्मों के लिए चाहिए धौर्य

    साल 1761 में अफगानों को रोकने के लिए एक संयुक्त और विराट सेना खड़ी हुई थी। हर युद्ध ने हमारा इतिहास बदला है। हमारे पास हमारी रक्षा करने वाले योद्धा थे। यह प्रयास आज भी जारी है। कई मामलों में मैं पानीपत की लड़ाई को आज के परिदृश्य से जोड़कर देखता हूं, क्योंकि आज भी हमारे ऊपर दबाव बना रहता है। हमें चौकन्ना रहना पड़ता है। हिंदुस्तान लोगों की नजर में हमेशा रहता है। फिल्म के निर्देशक आशुतोष गोवारिकर इस संबंध में कहते हैं कि बतौर दर्शक मेरे लिए मनोरंजन अहम है। उसमें मिली सीख घर जाने पर भी याद रह गई तो वह यादगार फिल्म बनती है। मुझे लगता है कि मनोरंजन के साथ कुछ सीख भी होनी चाहिए। उसके लिए वैसी कहानी भी चाहिए। अगर मैं इतिहास पर फिल्म बना रहा होता हूं तो पैशन और धैर्य की जरूरत होती है।

    पर्दे पर दिखाई हार की कहानी 

    मुझे तीन साल लगते हैं इस तरह की एक फिल्म बनाने में। इसमें आप जिस तरह से निर्णय लेते हैं और पैशन के साथ आप सोचते हैं वैसी ही टीम होनी चाहिए। सिनेमेटोग्राफर, आर्ट डायरेक्टर, कोरियोग्राफर से लेकर एक्टर ऐसे चुनने पड़ते हैं जिनमें आप जैसा जुनून हो। हम जानते हैं कि वो दुनिया रही होगी। उसे पर्दे पर रीक्रिएट करने का अपना ही मजा है। पानीपत के तीसरे युद्ध में हार के बावजूद इस पर फिल्म बनाने में जोखिम की बात से आशुतोष इन्कार करते हैं। उनके मुताबिक, इस युद्ध के बाद अब्दाली हिंदुस्तान कभी वापस नहीं आया। मराठा साम्राज्य ने बाद में इसका बदला लिया और उत्तर भारत में प्रभुत्व स्थापित किया। मैंने यह नहीं सोचा कि हार की कहानी है। मुझे लगा कि यह शौर्यगाथा है इसे दर्शाना बेहद जरूरी है।

    कई मायनों में अनूठा युद्ध

    आशुतोष गोवारिकर कहते हैं कि पानीपत की तीसरा युद्ध अनूठा था। मराठा सैनिक एक हजार किमी तक उत्तर की ओर आए आक्रमणकारियों को रोकने के लिए। उनकी सेना करीब चालीस हजार थी। योजना थी कि राजाओं से समर्थन लेते हुए इतनी बड़ी सेना खड़ी कर देंगे कि दुश्मन डर जाएंगे। यमुना के इर्दगिर्द किस तरह से लुकाछुपी

    हुई, फिर कैसे पानीपत में भिड़े? सदाशिव राव भाऊ की पत्नी पार्वतीबाई कैसे युद्ध भूमि में उनके साथ गईं? सदाशिव राव भाऊ किस तरह के सेनापति थे। सौ साल से ज्यादा सिनेमा हो गया है, पर इस युद्ध पर फिल्म नहीं बनी, मुझे लगा कि मराठाओं के शौर्य की यह कहानी पर्दे पर लानी चाहिए।