मुंबई, जेएनएनl आजादी के अमृत महोत्सव के मौके पर मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्योछावर करने का जज्बा रखने वाले वायुसेना के बहादुरों की गौरवगाथाओं को फिल्मों के जरिए बताना बेहद जरूरी मानते हैं फिल्मकार। ‘नभ: स्पर्शं दीप्तम्’ श्रीमद्भगवद्गीता के 11वें अध्याय से लिए गए भारतीय वायुसेना के इस आदर्श वाक्य का अर्थ है कि गर्व के साथ आसमान को छूना। आजादी के बाद हमारी वायुसेना ने कई लड़ाइयां लड़ींऔर दुश्मन को कदमों पर ला दिया। भारतीय वायुसेना के इसी शौर्य का चित्रण करती हैं हमारी फिल्में। पिछली सदी में आई फिल्म ‘विजेता’ से लेकर पिछले दिनों रिलीज ‘भुज- द प्राइड आफ इंडिया’ में 1971 के भारत-पाक युद्ध में साहस व सूझ-बूझ की मिसाल पेश करते भारतीय फाइटर पायलट्स की दास्तां हो या कारगिल गर्ल गुंजन सक्सेना की दिलेरी की कहानी, वायुसेना के बहादुरों का पर्दे पर चित्रण देशभक्ति व जोश से भर देता है। इन फिल्मों के निर्माण की चुनौतियों पर स्मिता श्रीवास्तव व दीपेश पांडेय का आलेख...

सिनेमा मनोरंजन के साथ ही उत्प्रेरक का भी कार्य करता है। जब देशप्रेम में पगी कहानियां पर्दे पर आती हैं तो भावविभोर कर देती हैं और पुख्ता होता है देशभक्ति का जज्बा। विश्व की चौथी सबसे ताकतवर भारतीय वायुसेना के असल नायकों का शौर्य जब पर्दे पर दिखता है तो रोमांच के साथ ही युवाओं में उनकी तरह बनने की ललक पैदा होती है। मनोरंजन और सरोकार का यही मेल वायुसेना की पृष्ठभूमि में कहानियां गढ़ने के लिए फिल्मकारों को आकर्षित करता है। साल 1972 में रामानंद सागर ने धर्मेंद्र, राजेंद्र कुमार और माला सिन्हा के साथ फिल्म ‘ललकार’ बनाई। उसके बाद साल 1973 में रिलीज हुई राज कुमार अभिनीत फिल्म ‘हिंदुस्तान की कसम’ और साल 1982 में रिलीज हुई कुणाल कपूर अभिनीत फिल्म ‘विजेता’ को काफी सराहना मिली। फिल्म ‘बार्डर’ (1997), ‘वीर जारा’ (2004), ‘अग्निपंख’ (2004), ‘मौसम’ (2011) फिल्मों में भी वायुसेना से जुड़े अलग-अलग पहलू दिखाए गए। वैसे भारतीय वायुसेना की पृष्ठभूमि पर अभी तक बनी ज्यादातर फिल्में किसी न किसी वास्तविक घटना से प्रेरित होकर और उसमें कुछ क्रिएटिव लिबर्टी लेकर बनाई गई हैं। पिछले साल रिलीज हुई फिल्म ‘गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल’ कारगिल युद्ध क्षेत्र में हेलिकाप्टर उड़ाने वाली पहली महिला पायलट गुंजन सक्सेना की बायोपिक थी। हालिया रिलीज फिल्म ‘भुज- द प्राइड आफ इंडिया’ साल 1971 में हुए युद्ध पर आधारित थी, उनमें भी काफी क्रिएटिव लिबर्टी ली गई।

उत्सुकता बढ़ाते जज्बात: वायुसेना और उसकी कार्यप्रणाली के बारे में आम लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं होती। लोगों की यही उत्सुकता फिल्मकारों को वायुसेना की पृष्ठभूमि पर फिल्में बनाने के लिए प्रेरित करती है। इस बारे में फिल्म ‘भुज- द प्राइड आफ इंडिया’ के निर्देशक अभिषेक दुधैया कहते हैं, ‘एयरफोर्स की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों में एक अलग किस्म का रोमांच होता है। हर फिल्मकार दर्शकों को कुछ नया दिखाना चाहता है, इसलिए वे फिल्मों में क्रिएटिव लिबर्टी लेते हैं। बचपन में भी बच्चा खिलौने में या तो कार लेता है या फिर प्लेन। ये दोनों चीजें हमारे मन से जुड़ी होती हैं। उन्हें लेकर हमारे अंदर उत्सुकता होती है। कार के बारे में तो बड़े होने के बाद काफी चीजें जानने लगते हैं, लेकिन प्लेन जिज्ञासा का विषय बना रहता है। खासतौर पर वायुसेना के जहाज, जो आम लोगों की पहुंच से दूर रहते हैं। इन फिल्मों को लार्जर दैन लाइफ फिल्माया जाता है, वह बात भी लोगों को आकर्षित करती है।’

प्रशिक्षण अहम हिस्सा: वायुसेना के जवानों का किरदार निभाने के लिए कलाकारों को बाकायदा प्रशिक्षित किया जाता है। शूटिंग के वक्त वह सचमुच एयरक्राफ्ट या हेलिकाप्टर तो नहीं उड़ाते, लेकिन शारीरिक हाव-भाव दिखाने के लिए कलाकारों की बाकायदा ट्रेनिंग होती है। फिल्म ‘गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल’ के क्लाइमेक्स में हेलिकाप्टर वाला सीन जार्जिया में शूट हुआ था। उनके साथ ‘मिशन इंपासिबल’ जैसी हालीवुड फिल्म में काम कर चुके अनुभवी अमेरिकी हेलिकाप्टर पायलट मार्क वाल्फ थे। वहीं फिल्म ‘अग्निपंख’ में पायलट का किरदार निभाने वाले अभिनेता राहुल देव बताते हैं, ‘हमारी फिल्म करीब 15 साल पहले बनी थी। शूटिंग दौरान हमारे साथ एक एयरफोर्स के आफिसर रहते थे। इस फिल्म में हमें मिग-21 उड़ाना था तो निर्माताओं ने परमिशन लेकर हमें वास्तविक जहाज के काकपिट में बैठाकर शूटिंग की थी। मेरे भाई मुकुल देव अभिनेता होने के साथ ही कमर्शियल पायलट की योग्यता रखते हैं तो उनसे काफी जानकारी मिली। इसके अलावा हमने करीब दस दिनों तक सिम्युलेटर ट्रेनिंग भी की थी ताकि उस प्रक्रिया और माहौल को समझ सकें।’

प्रामाणिकता जरूरी: पिछली सदी में ‘आराधना’ और ‘सिलसिला’ जैसी कुछ फिल्मों में दिखाया गया था कि एयरफोर्स का पायलट क्रैश या लड़ाई में मारा जाता है। ये बातें नकारात्मक नजरिया पैदा करती हैं कि एयर फोर्स का पायलट है तो लड़ाई या क्रैश में मारा ही जाएगा। इस बारे में ‘मौसम’ और ‘भुज- द प्राइड आफ इंडिया’ फिल्मों के लिए मार्गदर्शन करने वाले रक्षा मंत्रालय के पूर्व प्रवक्ता रिटायर्ड ग्रुप कैप्टन तरुण कुमार सिंघा बताते हैं, ‘साल 1982 में जब भारतीय वायुसेना गोल्डन जुबली मना रही थी तो फिल्म ‘विजेता’ का प्रस्ताव आया। तब वायुसेना की तरफ से शर्त रखी गई थी कि फिल्म में पायलट को बेवजह मरता नहीं दिखाना है। धीरे-धीरे वायुसेना की तरफ से फिल्मों को लेकर दिशानिर्देश जारी किए गए। ऐसे में फिल्मकारों को एक तय प्रक्रिया का पालन करते हुए हेडक्वार्टर और रक्षा मंत्रालय की अनुमति लेनी पड़ती है। फिल्म किसी ऐतिहासिक विषय पर आधारित है और उससे सेना की छवि निखरती है तो उसके लिए इंसेंटिव और कई प्रकार की आर्थिक छूट दी जाती है। फिल्म बनने के हर चरण पर हेडक्वार्टर और रक्षा मंत्रालय द्वारा फिल्म रिव्यू की जाती है। स्क्रीनिंग से पहले रक्षा मंत्रालय द्वारा फिल्म को अंतिम क्लीयरेंस दिया जाता है। उसके बाद सेंसर बोर्ड सर्टिफिकेशन देता है।’

खर्चीला है निर्माण: आम फिल्मों की तुलना में वायुसेना पर बनी फिल्मों का निर्माण काफी खर्चीला होता है। इन फिल्मों के लिए विमानों की रेप्लिका (प्रतिरूप) तैयार करना और भारी वीएफएक्स समेत कई अतिरिक्त खर्च जुड़ जाते हैं। इस बारे में अभिषेक दुधैया कहते हैं, ‘ओरिजिनल एयरक्राफ्ट को तो सिर्फ दूर से ही शूट करने की अनुमति होती है। बाकी शूटिंग के लिए एयक्राफ्ट की रेप्लिका तैयार करनी पड़ती है। फाइटर प्लेन की लड़ाई वाले दृश्यों में ज्यादातर वीएफएक्स का इस्तेमाल किया जाता है। ‘भुज- द प्राइड आफ इंडिया’ की शूटिंग के लिए गुजरात सरकार द्वारा हमें एक ऐसा रनवे मिला था, जहां सप्ताह में एक-दो प्लेन उतरते थे। प्रोडक्शन से लेकर प्रशिक्षण और वीएफएक्स तक हर जगह इन फिल्मों का बजट आम फिल्मों की तुलना में चार गुना बढ़ जाता है।’

कैमरे में फिल्माना आसान नहीं: तेज रफ्तार के साथ हवा में उड़ान भरते और नीचे लैंड करते एयरक्राफ्ट्स को फिल्माना आसान नहीं होता। इसके लिए सिनेमेटोग्राफर को काफी अनुभव की आवश्यकता पड़ती है। फिल्म ‘विजेता’ (1982) के निर्देशक गोविंद निहलानी स्वयं एक अनुभवी सिनेमेटोग्राफर रहे हैं। वर्तमान में सुरक्षा कारणों से जहाज के काकपिट में शूट करने की अनुमति नहीं मिलती, लेकिन गोविंद निहलानी ने विजेता में काकपिट को बहुत अच्छी तरह से फिल्माया था। उन्होंने खुद ट्रेनिंग एयरक्राफ्ट किरण की काकपिट में बैठकर ‘विजेता’ फिल्म की शूटिंग की थी। फिल्मांकन की चुनौतियों के बारे में फिल्म ‘मौसम’ के सिनेमेटोग्राफर बिनोद प्रधान कहते हैं, ‘तेज रफ्तार से आसमान में उड़ते हुए फाइटर एयक्राफ्ट्स के बीच लड़ाई को वास्तविकता में शूट कर पाना लगभग असंभव होता है। इसके लिए वीएफएक्स का इस्तेमाल किया जाता है। प्लेन के टेक आफ करने के सीन वास्तव में शूट किए जाते हैं। इसके लिए लेंसेस, कैमरा एंगल और कैमरे की अच्छी समझ होना बहुत जरूरी है।'

युवाओं के लिए प्रेरणा: पूर्व वायुसेना प्रमुख बी एस धनोआ और कारगिल युद्ध में उनके शौर्य प्रदर्शन पर फिल्म ‘गोल्डेन ऐरोज’ बना रहे हैं फिल्मकार कुशल श्रीवास्तव। वह कहते हैं, ‘ऐसी फिल्में सेना का मनोबल बढ़ाने के साथ युवाओं को सेना से जुड़ने के लिए प्रेरित भी करती हैं। परमिशन लेने की मुश्किलों या कुछ और वजहों से पिछली सदी में कुछ फिल्में बनाने के बाद फिल्मकारों ने इस पर विराम लगा दिया था। अब यह सिलसिला फिर से शुरू हुआ है। हमारी फिल्म के लिए हमें असली हवाई जहाज के साथ शूट करने की अनुमति मिली है। वायुसेना के शौर्य को दर्शाती कहानियां पर्दे पर आनी चाहिए।’

ये फिल्में हैं कतार में ’ फिल्म ‘तेजस’ में कंगना रनोट पायलट की भूमिका में हैं। ’ हंसल मेहता निर्देशित ‘कैप्टन इंडिया’ में कार्तिक आर्यन मुख्य भूमिका में होंगे। यह एक्शन-ड्रामा फिल्म एक युद्धग्रस्त देश से भारत के सबसे बड़े और सफल बचाव अभियानों से प्रेरित है। आर्यन फिल्म में पायलट का किरदार निभाएंगे। ’ कुशल श्रीवास्तव पूर्व चीफ आफ एयर स्टाफ बी एस धनोआ की जिंदगानी पर फिल्म ‘गोल्डेन ऐरोज’ बना रहे हैं। ’ सतीश कौशिक भी वायुसेना की पृष्ठभूमि पर बनी एक तेलुगु फिल्म की हिंदी रीमेक के अधिकार खरीद चुके हैं। ’ अभिनेता विवेक ओबेराय बालाकोट एयर स्ट्राइक के हीरो अभिनंदन वर्धमान के जीवन पर फिल्म बनाने की घोषणा कर चुके हैं। 30 लाख रुपये के आसपास लागत आती है वायुयान की रेप्लिका तैयार करने में। शूटिंग में इस्तेमाल होने वाले इस डमी वायुयान की सीट से लेकर काकपिट तक हर चीज बिल्कुल ओरिजिनल प्लेन की तरह होती है, बस यह उड़ नहीं सकता। 45 दिनों की ट्रेनिंग ली थी फिल्म ‘गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल’ की अभिनेत्री जाह्नवी कपूर ने फिल्म के लिए। 195 देश हैं पूरी दुनिया में और इन सभी में चौथी सर्वाधिक सशक्त वायुसेना है भारत की।

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