नई दिल्ली, जेएनएन। बागी होकर प्यार करने और अपनी मोहब्बत के लिए कुछ भी कर गुजरने का नाम है 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे'। 25 साल (20 अक्टूबर, 1995) पहले रिलीज हुई यह फिल्म आज भी प्यार करने वालों के लिए उतनी ही ताजी है। इसकी कहानी, किरदारों का अंदाज और गीत-संगीत सब एक बार इसकी ओर पलटने पर कर देते हैं मजबूर...

प्यार करना आसान है, मगर प्यार को सही अंजाम तक ले जाने में कितनी मुश्किलें आती हैं और प्यार की जीत होने के आखिरी वक्त तक रोमांच में बीतने वाला हर लम्हा दर्शाती फिल्म है 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे'। इसके किरदारों के डायलॉग और अदाकारी जितनी रियलिस्टिक थी उतना ही दिलअजीज था इसका गीत-संगीत। 24 साल की उम्र में 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' जैसी सफल फिल्म का निर्देशन करने वाले आदित्य चोपड़ा भली-भांति जानते थे कि उन्हें किस तरह का संगीत चाहिए। फिल्म के संगीत में उनका भी बहुत योगदान रहा था। आनंद बख्शी द्वारा लिखे गानों को संगीतकार जतिन-ललित की जोड़ी ने संगीतबद्ध किया था।

इस फिल्म के संगीतमय सफर की यादों को ताजा करते हुए ललित पंडित कहते हैं, 'आशा भोंसले जी ने यश चोपड़ा जी से हमारे नाम की सिफारिश की थी। हमने यश जी के घर पर म्यूजिक सेशन रखा। उस सेशन में यश जी के साथ उनकी पत्नी पामेला चोपड़ा, बेटे आदित्य और उदय चोपड़ा भी मौजूद थे। हमें पता नहीं था कि आदित्य के लिए किसी फिल्म की योजना बन रही है। बहुत लंबी बैठक हुई। हमने अलग-अलग धुनें सुनाईं। वहां हमने 'मेंहदी लगा के रखना' और 'मेरे ख्वाबों में जो आए' की धुनें बजाई थीं। इस बैठक के बाद उनका कोई फीडबैक नहीं आया था। हम फिल्म 'खामोशी' का गाना रिकॉर्ड कर रहे थे, तभी आदित्य चोपड़ा ने फोन करके मिलने के लिए बुलाया। हम यश जी के ऑफिस गए वहां आदित्य ने इस फिल्म की योजना के बारे में बताया जिसमें वे बतौर निर्देशक पहली फिल्म करेंगे। हम खुश हो गए। बैठक में हमारी धुनों के बारे में भी उन्होंने विस्तार से बात की और वहां से हमारा फिल्म से जुड़ना हुआ। फिर तय हुआ कि काजोल के सारे गाने लता जी गाएंगी और आनंद बख्शी गीतकार होंगे। उस जमाने में लता जी के साथ गाने का मौका एक ही बार मिल सकता था। तो हम अपनी पूरी कोशिश में जुट गए थे।'

यादगार हैं वो पल

फिल्म का गीत 'मेंहदी लगा के रखना' के बारे में वे बताते हैं, 'यह गीत महेंद्र देहलवी ने लिखा था मगर उन्होंने जो मुखड़ा दिया था वह यूं था कि 'मेंहदी लगाकर चलना, पायल बजाकर चलना, आशिकों से अपना दामन बचाकर चलना।' बाद में आनंद बख्शी साहब ने अंतरे पर बहुत काम किया था। मुझे याद है कि इस फिल्म के समय वह एक डायरी लेकर आते थे। हमने पहले भी उनके साथ काम किया था मगर डायरी लाते कभी नहीं देखा। इस गाने के लिए उन्होंने 25 अंतरे लिखे थे। वह सब इतने अच्छे थे कि आखिर में हमने उनसे कहा कि आप ही कोई दो अंतरे चुनें।'

शिद्दत से मिली सफलता

कहते हैं प्यार की राह आसान नहीं होती। ठीक वैसे ही प्यार के कई रंगों से सजी इस फिल्म के गीत भी अपनी अलग कठिनाइयों से गुजरे थे। इस बारे में ललित बताते हैं, 'इस फिल्म का गीत 'हो गया है तुझको तो प्यार सजना' थोड़ा कठिन था। दरअसल, रोमांटिक गाना होने के बावजूद उसमें दो लोगों की भावनाएं जाहिर होती हैं। उस अंतरे में आदित्य को ऐसा डिवीजन चाहिए था जिसमें वे कभी शाह रुख का शॉट ले सकें तो कभी काजोल का। आप देखें तो पाएंगे कि इसके 'न जाने मेरे दिल को क्या हो गया' का रिदम वेस्टर्न स्ट्रक्चर पर है और जब 'हो गया है तुझको' आता है तो उसमें इंडियन टच है। वह बहुत अहम प्रयोग था। सबसे अहम गानों में लता की आवाज रही जो गाने को चमक और ऊंचाई देती है। बहरहाल, फिल्म के गाने को लेकर लंबी बैठकें होती थीं। आदित्य अपनी राय और विचार रखते थे। सबकी सहमति के बाद पूरी थीम फाइनल होती थी। गाना रिकॉर्ड होने से पहले यश जी का पूरा परिवार उसे सुनता था। उदित नारायण, कुमार शानू और अभिजीत गानों की रिहर्सल करते थे। बहुत शिद्दत से संगीत पर काम हुआ तब जाकर फिल्म का इतना सफल एलबम बना।' ( स्मिता श्रीवास्तव से बातचीत के आधार पर)

 

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