'म्यूजिकल हिट' में आबरू लुटने का दर्द; दिलचस्प है 'पाकीजा' के इस गाने का इतिहास, कई बार बना तवाइफों का ये गीत
हिंदी सिनेमा में एक दौर था, जब गानों के बनने के पीछे भी कई कहानियां छिपी होती थीं। फिल्म 'पाकीजा' ...और पढ़ें

तवायफों की दर्दभरी दास्तां को बयां करता एक गीत...

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एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। मायानगरी... मतलब बड़ी चमक-धमक वाली दुनिया। सजे-धजे सितारे, अच्छे कपड़े, मेकअप और ऊपर से लेकर नीचे तक, एकदम टिप-टॉप...मानो जो दिख रहा है वही सब सही है और यही हकीकत भी है, पर क्या आप जानते हैं कि, सिनेमा की चकाचौंध अक्सर गहरी हकीकतों पर पर्दा डाल देती है।
अक्सर पर्दे पर नजर आईं कहानियां और गीत हमें खूब लुभाते हैं लेकिन उनके पीछे के दर्द की दास्तां दिल को कचोट देने वाली होती है। आज हम आपको एक ऐसे गाने की दास्तां सुनाएंगे, जिसमें छुपा है तवायफों का दर्द...
एक गाने में छुपी तवायफों के दर्द की कहानी
अक्सर फिल्मों में गाने अक्सर उनकी कहानी को बयां करते हैं, लेकिन एक गाना था, जिसने समाज के साथ-साथ उन तवायफों के दर्द को भी उजागर किया, जिसे हम आप और आम समझते हैं।
जिस गाने की हम बात कर रहे हैं उस गाने का नाम 'पाकीजा' है इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मेरा (Inhi Logon ne le leenha Dupatta mera)। ये गाना सुनने में भले ही बाकी गानों की तरह आम लगे पर इसकी कहानी दर्दभरी है। इस गाने के पीछे का इतिहास महज उस दुपट्टे के खो जाने जितना सीधा नहीं है बल्कि इसका अर्थ सीधे तौर पर उन तवायफों की कहानी से है, जो दर्द में रहने के बाद भी किसी को बता नहीं सकती थीं।
क्या था इस गाने का मतलब?
साल 1972 में आई 'पाकीजा' (Paakeezah)उन फिल्मों में शुमार है, जिसे सिनेमा का शानदार उदाहरण कहा जाता है। इसी फिल्म के एक गाने में 'इन्हीं लोगों ने...इन्हीं लोगों ने...इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मेरा...हां जी हां दुपट्टा मोरा' में मीना कुमारी की अदायगी मानो जादू से भरी थी। गाने में दुपट्टे शब्द को भले ही रोमांटिक अंदाज में दिखाया गया हो, लेकिन पुराने दौर में इसका मतलब बहुत अलग था।
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कहा जाता है कि कोठों पर जब कोई रसूखदार इंसान या महफिल में आया कोई शख्स किसी तवायफ की आबरू लूट लेता था या उसके साथ जबरदस्ती करता था, तो वो सीधे तौर पर शिकायत नहीं कर पाती थी। ऐसे में वो 'दुपट्टे' शब्द का इस्तेमाल अपनी 'इज्जत' और 'आबरू' के समान करती थीं और उनकी 'इज्जत' का प्रतीक तब यह दुपट्टा ही हुआ करता था।
इस गाने में 'दुपट्टा छीनने' का मतलब भी 'शोषण' और उनकी इज्जत पर हाथ लगाने के बराबर है, जो एक तरह कोड वर्ड है। इसीलिए पुराने दौर में तवायफें इस गाने को तब गाती थीं, जब महफिल के बीच उनकी आबरू की नीलामी होती थी और फिर तवायफें इसी तरह से अपने दर्द को समाज के सामने बयां करती थीं।
लता मंगेशकर से पहले कई लोगों ने गाया था गाना
कहा जाता है कि इस गाने की नींव 1956 में ही लिखी जा चुकी थी। मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे इस मुजरे को फिल्मकार कमाल अमरोही ने अपने कैमरे में बड़े ही शाही अंदाज में पर्दे पर पेश किया था। इस गाने को फिर लता मंगेशकर ने आवाज दी थी।
हालांकि ये पहली बार नहीं था जब लता मंगेशकर ने इसे आवाज दी हो, इससे पहले 1941 में शमशाद बेगम ने इस गाने को फिल्म हिम्मत के लिए एक अलग अंदाज में रिकॉर्ड किया था। शमशाद बेगम के बाद इस गाने को 1943 में फिल्म आबरू में रीक्रिएट किया गया और गाने को सिंगर याकूब ने अपनी आवाज दी, जो फिल्म में लीड किरदार में भी दिखे।

गाने का संगीत पंडित गोविंद राम ने तैयार किया था। कई बार लोगों को लगता है कि इस गाने के ओरिजिनल म्यूजिक कंपोजर्स गुलम मोहम्मद और नौशाद अली हैं, जबकि ऐसा नहीं है। इस गाने के ओरिजिनल कंपोजर्स पंडित गोविंद राम हैं।
पाकीजा में कुछ बदलाव के साथ रिलीज हुआ गाना
फिल्म पाकीजा में जब ये गाना आया तो इसमें कुछ बदलाव किए गए। फिल्म को बनाने वाले कमाल अमरोही ने संगीतकार गुलाम मोहम्मद से गाने में कुछ बदलाव तो कराए, लेकिन गाने के शब्दों में इस्तेमाल हुई बंदिशें वही रखीं। फिल्म के लिरिक्स थोड़े सॉफ्ट किए गए ताकि गाने का फील वही रहे।
वहीं गाने को लिखने वाले मजरूह सुल्तानपुरी ने इसमें कुछ लाइनें भी जोड़ीं, जैसे "हमरी न मानो बजजवा से पूछो..." जैसे अंतरे इसमें जोड़े गए। मीना कुमारी ने अपनी अदाओं से गाने को अलग अंदाज में पेश किया, हाथों की कलाएं और आंखों में दर्द को दिखातीं मीना इस गाने को अमर कर गईं। हालांकि गाने की लाइनों में जो तवायफों का दर्द है, वो शायद जरूर छिप गया।
इस गाने में तीन लोगों का जिक्र आता है जिसमें, बजजवा (कपड़ा बेचने वाला), रंगरेजवा (रंगने वाला) और सिपहिया (सिपाही/पुलिस)। इसका मतलब ये है कि समाज के किसी भी वर्ग का कोई भी शख्स रहा हो, सबने तवायफों की 'इज्जत' नीलाम करने की कोशिश की है और यही शिकायत इस गाने में की गई है।
ये गाना जिस्म के सौदागरों के खिलाफ एक खामोश विरोध था, जो सालों-साल तवायफें करती रहीं। हालांकि नतीजा इसका कुछ नहीं हुआ और फिर आखिरकार इसे सुरों की शक्ल देकर पर्दे पर पेश किया गया, जो हमें इन गानों के जरिए ये सुनाई दिया, जिसके सही अर्थ से शायद आज भी कई लोग अनजान हैं।
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