प्रियंका सिंह । फिल्म 1971 ने रिलीज के समय भले ही बॉक्स ऑफिस पर उतनी सफलता न देखी हो, लेकिन विषय और कंटेंट की वजह से इसने राष्ट्रीय पुरस्कार जीता था। लॉकडाउन के बाद जब फिल्म के निर्देशक अमृत सागर ने इसे यूट्यूब पर अपलोड किया, तब इस फिल्म को काफी देखा और सराहा गया। उन्होंने फिल्म से जुड़े किस्सों को साझा किया...

अमृत सागर ने कहा, 'मैं जब अमेरिका में फिल्म स्कूल में पढ़ रहा था, तब पिताजी मोती सागर ने मुझे एक शॉर्ट स्टोरी पढने के लिए दी थी, जिसका शीर्षक था 'छह कैदी'। कहानी पढ़ते वक्त फिल्म का क्लाइमेक्स मेरे जेहन में था कि मेरा हीरो बर्फ में भागता हुआ हिंदुस्तान के बॉर्डर की ओर बढ़ रहा है। जब मैं पढ़ाई खत्म करके भारत आया तो दादा जी रामानंद सागर जिन्हें मैं पापाजी कहता था, उनके साथ प्रोडक्शन कंपनी खोली। बतौर डायरेक्टर मैंने कई शोज बनाए।'

अमृत सागर ने आगे कहा, 'एक दिन पिताजी से कहा कि अब मुझे फिल्म बनानी है। आपकी शॉर्ट स्टोरी पर फिल्म बनाने के बारे में सोच रहा हूं। पहले यह हिंदी फिल्म की कहानी जैसी थी, जिसमें गाने और हीरोइन थी। कई बड़े एक्टर्स को कहानी सुनाई, सबने मना कर दिया। फिर मैंने एक सीरियल किलर की कहानी मनोज बाजपेयी के लिए लिखी। मनोज ने कहा कि अभी 'अक्स' फिल्म की है, इसलिए सीरियल किलर वाली फिल्म नहीं करना चाहता हूं। कुछ दिन बाद फोन आया कि तुम दिलचस्प इंसान हो, साथ में कोई फिल्म करते हैं।'

उन्होंने आगे बताया, 'मनोज बाजपेयी ने पूछा कि किसी और फिल्म का आइडिया है? मैंने उन्हें '1971' की स्क्रिप्ट दिखाई। उन्होंने कहा कि यही फिल्म बनाओ, मैं लेखक लाकर देता हूं। तब पीयूष मिश्रा आए और हमने साथ में कहानी पर दोबारा काम किया। हीरोइन, गाना सब फिल्म से निकाल दिया। हमने पापाजी को कहानी सुनाई। उन्होंने कहा कि तुम लोग फिल्म बनाओ, मैं सपोर्ट करूंगा। रवि किशन उस वक्त भोजपुरी के बड़े स्टार थे। उनको पता नहीं कैसे इस फिल्म के बारे में पता चला। वह ऑडिशन के लिए आए। उनकी बेहतरीन एक्टिंग देखकर हम हतप्रभ रह गए थे। मानव कौल की एक्टिंग भी बेहतरीन थी। हालांकि उनकी जगह पहले जिमी शेरगिल को साइन किया गया था, लेकिन  मनाली में बर्फबारी की वजह से जिमी की डेट्स चली गई थीं।

अमृत सागर ने कहा, 'पिताजी ने कहा कि मनाली की बजाय वड़ोदरा के स्टूडियो में शूट कर लो। मैंने कहा कि मनाली में ही शूटिंग करूंगा। हमारा बजट ढाई करोड़ था। एक्शन डायरेक्टर श्याम कौशल ने कहा कि मेरा क्रू बड़ा होता है, सबकी फ्लाइट टिकट महंगी पड़ जाएगी। मैं वैसे भी 'कृष' की शूटिंग के लिए मनाली जा रहा हूं, वहां रुक जाऊंगा, वापसी की टिकट तुम करा देना। मैं तैयार हो गया। क्लाइमेक्स के लिए चार दिन का वक्त रखा गया था, लेकिन खराब मौसम की वजह से दस दिन निकल गए थे। सफेद बर्फ के लिए हमें कई हजार फीट की ऊंचाई पर शूटिंग करनी पड़ी थी। मेरे साथ वडोदरा के आर्ट डायरेक्टर और वर्कर्स थे। उन्होंने जेसीबी मशीन से बर्फ को हटा कर जेल वाला सेट बनाया था, लेकिन जब तक बर्फ हटाई जाती, मैंने मनाली में अपने होटल के पीछे की जगह पर इंटीरियर का सेट अलग से बनवा लिया था, ताकि जेल के अंदर वाले शॉट लिए जा सकें।

 

फिल्म 1971 के निर्देशक अमृत सागर

निर्देशक ने आगे कहा, 'हमारे पास जेल वाले घर बनाने के लिए लकड़ी कम थी। छत वाली लकड़ी को कभी जमीन, तो कभी जमीन की लकड़ी को छत पर लगाना पड़ता था। पहाड़ों पर जाकर लाइटिंग करना चुनौतीपूर्ण था। स्नो फॉल के दौरान बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन ने काफी मदद की थी। सबसे चुनौतीपूर्ण था, मनाली में पाकिस्तान का सेट लगाना। एक गांव में हमारी लड़ाई हो गई थी। गांव वालों ने कहा कि हमारे गांव को आप पाकिस्तान नहीं दिखा सकते हैं। बैठकर उन्हें समझाना पड़ा कि फौजियों की कहानी है। फिर कई गांव वालों ने उसमें साइड रोल्स भी किए। क्लाइमेक्स सीन के लिए हमें हेलिकाप्टर की जरूरत थी। पायलट को समझाना मुश्किल था कि उसके डेढ़ करोड़ के हेलिकॉप्टर को हम अब पाकिस्तान के हेलिकॉप्टर की तरह पेंट करेंगे। हमारे साथ आए आर्ट प्रोफेसर ने बताया कि एक वाटर कलर जैसा पेंट होता है, जो आसानी से साफ हो जाता है।'

अमृत सागर ने आगे कहा, 'हेलिकॉप्टर की कॉस्ट प्रति घंटे के लिए एक लाख रुपये थी। निर्माता ने पांच घंटे के लिए ही हेलिकॉप्टर का इंतजाम करवाया था। पांच घंटे में मुझे अपना ड्रीम शॉट लेना था जिसमें हीरो बर्फीली पहाड़ी में दौड़कर हिंदुस्तान के बॉर्डर तक पहुंचता है। ठंड की वजह से मनोज के घुटनों में दर्द था। होटल में मैंने मनोज से कहा कि मुझे पता है कि तुम्हें दर्द है, लेकिन वह मेरा ड्रीम शॉट है। उन्होंने कहा कि मैं करूंगा, तुम बस कैमरा रोल पर रखना। हमने तीन कैमरा सेटअप लगाया। जिस तरह से मनोज दर्द में भी भागे हैं, वह कमाल का शॉट था। एक नई कंपनी ने फिल्म को रिलीज किया था। उन्हें फिल्म को सही तरीके से रिलीज करना नहीं आया। हालांकि फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अपनी लागत वसूल कर ली थी। साल 2008 में मनोज के कहने पर मैंने फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए भेजा। जब पुरस्कार की घोषणा हुई, तब मैं सो रहा था, मेरे फोन पर 30-40 मिस्ड कॉल थे। मनोज को फोन किया तो पता चला फिल्म ने राष्ट्रीय पुरस्कार जीत लिया है।'  

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