स्मिता श्रीवास्तव,मुंबई ब्यूरो। आज ही के दिन वर्ष 1922 में अंग्रेजी शासन के जुल्म के विरुद्ध उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी चौरा गांव में आम लोग एकजुट होकर मुखर हुए थे। उनकी तीक्ष्ण प्रतिक्रिया को चौरी चौरा कांड के रूप में उल्लेखित किया गया, जबकि इतिहासकारों का मत है कि वह दलित, पिछड़े और गरीब किसानों की क्रांतिकारी बगावत थी। इस घटना पर आधारित फिल्म ‘1922 प्रतिकार चौरी चौरा’ का निर्देशन अभिक भानु ने किया है। फिल्म में रवि किशन मुख्य भूमिका में हैं...

चौरी चौरा की घटना के सौ साल पूरे होने पर फिल्म बनाने को लेकर अभिक भानु बताते हैं कि लखनऊ में एक दिन बातचीत के दौरान भारतेंदु नाट्य अकादमी के अध्यक्ष ने कहा कि आप अलग तरह की फिल्में बनाते हैं। आप चौरी चौरा घटना पर फिल्म क्यों नहीं बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस घटना में बहुत सारे तथ्यों को छुपाया गया है। फिर हमने गहन रिसर्च की। रिसर्च के दौरान बहुत सारे दस्तावेज मेरे हाथ लगे। उनमें कई अनसुने और दिलचस्प तथ्य सामने आए। इस घटना पर शाहिद अमीन ने अपनी किताब ‘इवेंट, मेटाफर, मेमोरी चौरी चौरा 1922-1992’ में घटना के पीछे आमजन में स्थानीय जमींदारों और ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ असंतोष-आक्रोश को रेखांकित करने की कोशिश की है।

इस अविस्मरणीय घटना पर दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग के प्रमुख प्रो. हिमांशु चतुर्वेदी ने ‘चौरी चौरा- एक पुनरावलोकन, राष्ट्रीय आयाम की स्थानीय घटना’ किताब लिखी है। सुभाष चंद्र कुशवाहा की किताब ‘चौरी चौरा- विद्रोह और स्वाधीनता आंदोलन’ भी इसी घटना को रेखांकित करती है। हमने शाहिद अमीन की किताब का रेफरेंस लेने के साथ अपनी रिसर्च पर इसे आधारित किया है। उस समय इस घटना को कांड कहा गया। इस वजह से स्वतंत्रता संग्राम दब गया था। हमने फिल्म के ट्रेलर में भी कहा है कि कांड नहीं संग्राम। यह क्रांति थी। घटना से तीन दिन पहले एक फरवरी को स्वयंसेवक भगवान अहीर को चौरी चौरा के दारोगा गुप्तेश्वर सिंह ने पीट दिया था, जो बाजार में मांस की बिक्री का विरोध कर रहे थे। यह मूल रूप से गांधी जी के आह्वान पर चौरी चौरा में असहयोग आंदोलन का एक रूप था। चार फरवरी, 1922 को स्वयंसेवकों के दल ने भगवान अहीर की पिटाई के खिलाफ थाने तक जुलूस निकाला। इस आंदोलन का नेतृत्व डुमरी खुर्द निवासी नजर अली, चौरा निवासी लाल मुहम्मद, भगवान अहीर, चुड़िहार टोले के अब्दुल्ला और रामनगर के श्याम सुंदर मिश्र ने किया।

जुलूस में स्वयंसेवक न ही किसी को मारने की योजना से गए थे और न ही थाना जलाने। निहत्थों पर प्रशासन ने पहले लाठीचार्ज किया, फिर गोलीबारी। यह गोलीबारी तब तक हुई जब तक उनकी गोलियां खत्म नहीं हो गईं। इसके बाद जनमानस उत्तेजित हुआ और उसने तीक्ष्ण प्रतिक्रिया दी। बाद में उस पर कांग्रेस संगठन और समाचार पत्रों की प्रतिक्रिया सामने आई। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने चौरी चौरा के समाचार को जलियांवाला बाग से कहीं अधिक स्थान दिया। इन सब बातों ने एक ओर जहां चौरी चौरा की घटना को हत्याकांड के तौर पर निरूपित किया, वहीं दूसरी ओर इस घटना से गुस्साई अंग्रेज सरकार ने बेगुनाह लोगों पर जुल्म ढाना शुरू कर दिया। ब्रिटिश सरकार ने कथित अभियुक्तों पर आक्रामक तरीके से मुकदमा चलाया। सत्र अदालत ने 225 अभियुक्तों में से 172 को फांसी की सजा सुनाई। यह अत्याचार देखकर पूर्वांचल के गांधी कहे जाने वाले देवरिया के संत बाबा राघव दास ने जाने-माने अधिवक्ता पंडित मदनमोहन मालवीय से क्रांतिकारियों का मुकदमा लड़ने की अपील की।

मदनमोहन मालवीय ने क्रांतिकारियों का केस लड़ा। मालवीय जी की पैरवी की वजह से 172 की जगह सिर्फ 19 क्रांतिकारियों को फांसी हुई, क्योंकि उन्होंने डंके की चोट पर आगजनी की बात स्वीकार की थी। भगवान अहीर सहित 19 क्रांतिकारियों को दो जुलाई, 1923 को विभिन्न जेलों में फांसी पर लटकाया गया था। फिल्म में हमने मालवीय जी के योगदान को भी समुचित रूप से दर्शाया है। फिल्म को मार्च में सिनेमाघरों में रिलीज करने की योजना है। इसे शिकागो और कनाडा में भी रिलीज करने पर हम विचार कर रहे हैं।

महात्मा गांधी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक अगस्त, 1920 को असहयोग आंदोलन शुरू किया था। इसके तहत हर शनिवार को विदेशी वस्त्रों और सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार करने के लिए प्रदर्शन होता था। चौरी चौरा में बहिष्कार के दौरान पुलिस ने फायरिंग कर दी थी। इसमें तीन सत्याग्रही शहीद व कई घायल हो गए थे। गुस्साई भीड़ ने चौरी चौरा थाना फूंक दिया। जिसमें 23 पुलिसकर्मियों व तीन नागरिकों की भी मौत हो गई थी। इस हिंसा के बाद महात्मा गांधी ने 12 फरवरी, 1922 को असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था। महामना मालवीय जी का योगदान चौरी चौरा की घटना के बाद अहसयोग आंदोलन वापस लेने के गांधी जी के फैसले से क्रांतिकारियों का एक दल नाराज हो गया। दूसरी ओर अंग्रेजी हुकूमत भी आगबबूला हो गई थी।

228 क्रांतिकारियों पर मुकदमा चलाया गया। इनमें 172 को फांसी की सजा सुनाई गई। तब महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने 16 महीने तक मुकदमा लड़ा और 153 सत्याग्रहियों को फांसी से बचा लिया। केवल 19 को फांसी दी गई थी। 16 फरवरी 1922 को गांधी जी ने अपने लेख चौरी चौरा का अपराध में एक ओर जहां पुलिसकर्मियों को जिम्मेदार ठहराया, क्योंकि उनके उकसाने पर भीड़ ने ऐसा कदम उठाया था, वहीं दूसरी ओर घटना में शामिल लोगों को अपने आपको पुलिस के हवाले करने को कहा, क्योंकि उन्होंने अपराध किया था। इसके बाद गांधी जी पर राजद्रोह का मुकदमा चला था। उन्हें मार्च 1922 में गिरफ्तार कर लिया गया था।

Edited By: Ruchi Vajpayee

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