प्रियंका सिंह, मुंबई। ‘दंगल’, ‘उंगली’ और ‘काबिल’ जैसी फिल्मों के अभिनेता गिरीश कुलकर्णी किसी किरदार को अपनाने से पहले उसकी पृष्ठभूमि पर गहन चिंतन करते हैं। अपने काम की तारीफ को पुरस्कारों से ज्यादा मानने वाले गिरीश ने साझा किए अपने दिल के जज्बात...

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में काम करने वाले ज्यादातर कलाकार मुंबई में ही रहते हैं। वहीं राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित अभिनेता, लेखक और निर्माता -निर्देशक गिरीश कुलकर्णी पुणे में रहना ज्यादा पसंद करते हैं। ‘दंगल’, ‘उंगली’ और ‘काबिल’ जैसी फिल्मों के अभिनेता गिरीश इस बाबत कहते हैं, ‘मेरी गुरु सुमित्रा भावे जी ने मुझे कहा था कि आप जिस शहर में रहें, वह आपको रास भी आना चाहिए। अगर आपको सिर्फ नाम और पैसा कमाना है, तो उसके लिए अपनी जगह छोड़कर दूसरी जगह जाना होगा, लेकिन अगर आपको किसी चीज का निर्माण करना है, तो वह काम वहां बेहतर होता है, जिस माहौल में आप हमेशा से रहे हैं। मुझे पुणे का माहौल शांतिदायक लगता है। मैं मराठी फिल्मों में ज्यादा काम करता हूं, तो उसके मुताबिक भी यहां का माहौल सही है। बचपन से ही पुणे में रहा हूं, इसलिए यह शहर छूटता नहीं है। काम के लिए मुंबई अच्छी जगह है तो मुंबई में काम करके यहां वापस आ जाता हूं।’

एक-दूजे के वास्ते

अपने शहर के प्राकृतिक वातावरण को बनाए रखने के उद्देश्य के बारे में गिरीश आगे कहते हैं, ‘दरअसल, पुणे की हरियाली और पहाड़ शहर की सजावट की तरह हैं। हालांकि अब उस पर भी असर पड़ रहा है। मैं उन लोगों के साथ जुड़ा हूं, जो यहां की हरियाली और पहाड़ों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। दरअसल, हमें जो शिक्षा स्कूल में मिलती है, उसमें अपने शहर को बचाने के बारे में बहुत कम सिखाया जाता है। हम जिस शहर में रहते हैं, उसका खयाल भी हमें ही रखना चाहिए। कोरोना वायरस को लेकर पुणे में स्थिति अब बेहतर है। यहां कोरोना की पहली लहर के दौरान ही एक अनूठा प्रयोग किया गया था, जिसके तहत कई इंडस्ट्रीज, जिला प्रशासन, जिले के लगभग सभी अस्पतालों और एनजीओ संस्थाओं को एक साथ जोड़ा गया था। इसके तहत कोरोना से जूझ रहे लोगों की जरूरतों को पूरा किया गया। कोरोना की दूसरी लहर में भी हमने आक्सीजन कंसंट्रेटर से लेकर वेंटिलेटर तक हर चीज की व्यवस्था की थी।’

शंका आज भी है बरकरार

मराठी सिनेमा में काम करने के दौरान जब गिरीश को हिंदी सिनेमा में काम करने का ऑफर मिला था, तो वह झिझक रहे थे। इस बारे में गिरीश कहते हैं, ‘वह झिझक इसलिए थी, क्योंकि हिंदी सिनेमा का अपना एक तरीका है, यहां आर्थिक जरूरतों के तहत काम होता है। मैं यहां अपनी दिलचस्पी काम में बनाए रख पाऊंगा या नहीं, उसको लेकर मन में एक शंका थी। वैसे देखा जाए तो वह शंका आज भी है। यहां मैंने एक चीज नोटिस की, कि अगर मैंने एक बार पुलिस वाले का किरदार निभा लिया, तो उसके बाद वैसे ही 30-40 ऑफर आ जाते हैं। दूसरा कोई कलाकार होता तो शायद वह वैसे किरदार निभाकर आर्थिक स्थिरता पा लेता, लेकिन मैं इस इंडस्ट्री में सिर्फ पैसा और नाम कमाने के लिए नहीं आया हूं। मुझे कुछ तलाशना है, कुछ करना है। अनुराग कश्यप ने वह मौका मुझे ‘उंगली’ फिल्म में दिया। मैं थोड़ा चूजी हूं, लेकिन मैं किसी भी भाषा का सिनेमा करने के लिए तैयार हूं, जहां मुझे खुद में से कुछ नया निकालने का अवसर मिले।’

बदल जाता है पूरा पैटर्न

अपनी अभिनय प्रक्रिया के बारे में गिरीश बताते हैं, ‘मुझे लोगों में बहुत रुचि है। मैं उनकी कहानी सुनना चाहता हूं क्योंकि उन कहानियों में बहुत कुछ निकलता है। जब मैं कोई किरदार करता हूं, तो खुद से सवाल पूछता हूं कि इस किरदार की कहानी क्या होगी? फिर उसके विचारों में खुद को ढाल लेता हूं। मैं लगातार सोचता रहता हूं कि जो किरदार कर रहा हूं, वह कैसे रहता होगा, कैसे खाता होगा, वह फलां सिचुएशन में कैसे रिएक्ट करेगा। यह सब जान लेने पर आपका पूरा पैटर्न, बॉडी लैंग्वेज बदल जाती है। उसके बाद जब आप कैमरे के सामने आते हैं, तब तक दिमाग की ट्रेनिंग हो चुकी होती है। उसके बाद स्क्रिप्ट, लेखक के विचार, निर्देशक का विजन, किरदार का लुक, कॉस्ट्यूम्स सब अपना योगदान देते हैं। कई बार आपका अपना व्यक्तित्व भी किरदार में झलक जाता है। जैसे जी5 की वेब सीरीज ‘सनफ्लावर’ में मेरे किरदार में हल्की सी कॉमेडी भी नजर आएगी, क्योंकि मैं वास्तविक जीवन में काफी मजाकिया हूं। अब तक मैंने जो भी किरदार निभाए हैं, वह मेरे अनुभवों और कल्पनाओं का निचोड़ है।’

काम में है असली मजा

मराठी फिल्म ‘देऊल’ में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और स्क्रीनप्ले के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित गिरीश कहते हैं, ‘मैं मटीरियलिस्टिक चीजों में ज्यादा यकीन नहीं करता। मुझे काम करने की प्रेरणा किसी अवॉर्ड से नहीं मिलती है। असली मजा काम करने की प्रक्रिया में होता है। उस आनंद को लेने के बाद जो भी मिल रहा है, वह बोनस है। चार लोग अगर कह दें कि आपका काम अच्छा लगा, तो उतना ही काफी है। किसी भी तरह के अवॉर्ड्स उत्साह देते हैं। यह बताते हैं कि आप जिस राह पर चल रहे हैं, वह ठीक है और आगे भी उस पर चलते रहें। कोई फिल्म या कविता तभी बनती है, जब उसमें कहने वाली कोई बात हो। खुद के अंदर एक बवाल मचाने वाला अनुभव होना चाहिए, जिसे आप दूसरों से बेताबी से कहना चाहें। ऐसी कहानी अपने आप दिलों को छू लेती है।’

Edited By: Pratiksha Ranawat